Source: Markus Spiske on pexels.com तो मेरे शब्दों से नहीं,
उन खामोशियों से मिलो
जिन्होंने उन्हें जन्म दिया है।
मेरे भीतर आने से पहले
उन उजड़ी हुई लाइब्रेरियों से होकर गुजरना,
जहाँ धूल सिर्फ़ किताबों पर नहीं,
अधूरे सपनों पर भी जमी होती है।
वहाँ कुछ पन्ने मिलेंगे
जिन्हें किसी ने कभी पूरा नहीं लिखा,
कुछ प्रेम
जिन्हें समय ने बीच वाक्य में छोड़ दिया,
और कुछ नाम,
जो अब केवल स्मृति की रोशनी में पढ़े जा सकते हैं।
एक शाम
किसी पुराने कमरे में बैठना,
जहाँ पीली रोशनी
दीवारों से कम,
अतीत पर गिरती हो।
घड़ी की टिक-टिक सुनने की कोशिश मत करना।
कुछ घरों में
समय,
घड़ियों से नहीं,
यादों से चलता है।
यदि कभी
किसी किताब के बीच
सूखा हुआ गुलाब मिल जाए,
तो उसे फूल मत समझना।
वह किसी का
रुक गया मौसम है।
यदि कोई अधजला ख़त मिले,
तो उसे पढ़ने की जल्दी मत करना।
कुछ शब्द
जल जाने के बाद
और अधिक सच हो जाते हैं।
प्रेम को समझना हो
तो उसे मिलन में मत ढूँढ़ना।
प्रेम अक्सर
वहाँ सबसे अधिक जीवित होता है,
जहाँ लोग
एक-दूसरे तक पहुँच नहीं पाते।
किसी माँ को देखना,
जो पूरी रात जागकर
अपने बच्चों की नींद की रखवाली करती है।
किसी बूढ़े पिता को देखना,
जो अपने हिस्से की दवा छोड़कर
बेटे की फीस भर देता है।
किसी स्त्री को देखना,
जो अपने सारे दुःख
रसोई के धुएँ में छिपा देती है,
ताकि घर में
रोटी के साथ मुस्कान भी परोसी जा सकती है।
वहीं कहीं
प्रेम मिलेगा।
शोर में नहीं।
त्याग की उस धीमी आवाज़ में,
जिसे संसार
अक्सर सुन ही नहीं पाता।
फिर किसी ऐसे आदमी से मिलना
जिसने जीवन भर
सबको क्षमा किया,
पर स्वयं को कभी क्षमा नहीं कर पाया।
तुम जानोगे—
मनुष्य का सबसे गहरा घाव
दूसरों द्वारा दिया गया नहीं होता।
वह होता है
जिसे वह वर्षों तक
अपने भीतर ढोता रहता है।
यदि किसी रात
अचानक तुम्हें
किसी पुराने नाम की याद आ जाए,
तो उसे भूलने की कोशिश मत करना।
कुछ लोग
हमारी स्मृति में नहीं रहते—
वे हमारी आत्मा की बनावट का हिस्सा बन जाते हैं।
और जब
एक दिन
तुम्हें यह महसूस होने लगे
कि हर मिलने वाला मनुष्य
अपने भीतर
एक अदृश्य शोक लेकर चलता है,
कि हर मुस्कान के पीछे
कोई अनकहा वाक्य छिपा है,
कि हर कठोर आदमी
कभी बहुत कोमल रहा होगा,
और हर विदाई
अपने भीतर
एक अधूरी प्रार्थना बचाकर रखती है—
तब शायद
तुम मुझे
थोड़ा-सा समझ सकोगे।
क्योंकि मैं
प्रेम को
सिर्फ़ हृदय की अनुभूति नहीं मानता।
मेरे लिए प्रेम
मनुष्य होने की अंतिम जिम्मेदारी है।
और यदि कभी
हम अलग भी हो जाएँ,
तो मेरी स्मृति को
अपने जीवन का बोझ मत बनाना।
उसे
उस दीपक की तरह रखना
जो किसी बंद कमरे में नहीं,
रास्ता भटक जाने पर
मनुष्य के भीतर जलता है।
क्योंकि अंततः
हम किसी के साथ
पूरी उम्र नहीं रहते।
हम केवल
एक-दूसरे के भीतर
थोड़ी-सी रोशनी छोड़ जाते हैं।
शायद...
मनुष्य का यही हिस्सा
मृत्यु से भी बच जाता है।
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