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"हम अक्सर सोचते हैं कि हम अपनी कथा के सूत्रधार हैं; किंतु कदाचित् हम केवल उस अज्ञात रचनाकार की स्याही हैं, जो समय के पृष्ठों पर अपना आख्यान उकेर रहा है।"

1. दिनचर्या के पिंजरे में एक साधारण जीवन

अशोक भटनागर की आयु अड़सठ वर्ष हो चुकी थी। भारत सरकार के रक्षा लेखा विभाग (Defense Accounts Department) में सीनियर अकाउंट्स ऑफिसर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उनका जीवन शांति और एकरसता के एक नीरस चक्र में बँध गया था। प्रातः छह बजे उठना, कड़क चाय की चुस्कियों के साथ दैनिक समाचार पत्र के पृष्ठ पलटना, निकटस्थ पार्क में गिने-चुने कदम टहलना और तत्पश्चात् बालकनी में बैठकर बहती हुई दुनिया को मूक दर्शक बनकर देखना—यही उनकी संपूर्ण दिनचर्या थी।

उनकी पत्नी मंजू कभी-कभी चिंतित होकर उलाहना देतीं कि वे आवश्यकता से अधिक मौन रहने लगे हैं। अशोक बस एक मद्धिम-सी मुस्कान बिखेर देते। उनका मानना था कि अवस्था के परिपक्व होने के साथ मनुष्य को व्यर्थ के शब्दों से विश्राम ले लेना चाहिए और विचारों के गहन अतल में उतरना सीखना चाहिए।

किंतु एक सोमवार की अलसायी भोर में एक ऐसी विचित्र घटना घटी, जिसने उनके गणितीय चिंतन और जीवन-दर्शन की नींव हिला दी।

वे स्नानघर से निकलकर तौलिया ढूँढ़ ही रहे थे कि एकाएक उनके कानों में एक शांत, नपी-तुली, गंभीर स्त्री-ध्वनि गूँज उठी—

“अशोक भटनागर ने आज भी वही किया, जो वे पिछले चालीस वर्षों से करते आ रहे थे। उन्होंने अपनी पत्नी के चेहरे की उद्विग्नता को अनदेखा कर दिया। वे अपनी चिरपरिचित धारणा के वशीभूत थे कि मौन साध लेने से किसी के हृदय का बोझ कम किया जा सकता है।”

अशोक के कदम जहाँ के तहाँ ठिठक गए।

कमरे में सन्नाटा तैर रहा था। पत्नी रसोईघर में सब्ज़ियाँ काटने में व्यस्त थीं। टेलीविज़न बंद था। खिड़की के पार बिजली के तार पर बैठा कौआ पंख फड़फड़ा रहा था।

उन्होंने सशंकित होकर चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। “कौन है वहाँ?”

कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला।

उन्होंने इसे ढलती उम्र का भ्रम, मस्तिष्कीय थकान या रक्तचाप का उतार-चढ़ाव मानकर स्वयं को सांत्वना दी और बात टाल दी। किंतु उसी संध्या, जब वे पार्क की एकांत बेंच पर बैठे ढलते सूर्य को देख रहे थे, वही रहस्यमयी ध्वनि हवा में पुनः तिरने लगी—

“अशोक भटनागर इस बात से पूर्णतः अनभिज्ञ हैं कि आज संध्याकाल की यह साधारण-सी सैर उनके जीवन को एक ऐसे चौराहे पर ले जाकर खड़ा कर देगी, जहाँ से लौटना संभव न होगा।”

अशोक ने घबराकर चारों ओर देखा। पास की बेंच पर एक वृद्ध चश्मा ठीक करते हुए अख़बार पढ़ रहे थे। कुछ बालक गेंद के पीछे भाग रहे थे। एक नवयुवक फोन पर तल्लीनता से बातचीत कर रहा था।

वह आवाज़ किसी हाड़-मांस के पुतले की नहीं थी। वह उनके अंतर्मन की उपज भी नहीं थी। वह तो मानो दिक्-काल के अंतराल (space-time) से छनकर आती हुई एक अदृश्य लेखक की कमेंट्री थी।

2. पूर्व-लिखित जीवन और विवशता की प्रतिध्वनि

अगली सुबह अशोक ने इस रहस्य की सत्यता परखने के लिए एक सूक्ष्म प्रयोग करने का विचार किया।

बिस्तर छोड़ते ही उन्होंने मन ही मन दृढ़ संकल्प किया, *“आज मैं प्रातःकालीन चाय का पूर्णतः त्याग करूँगा।”*

उसी क्षण वह अदृश्य ध्वनि अंतरिक्ष से कौंधी—

“अशोक भटनागर ने स्वयं को स्वतंत्र सिद्ध करने के लिए चाय न पीने का निष्फल संकल्प लिया। किंतु रसोई से आती अदरक और इलायची की सोंधी सुगंध उनके कृत्रिम निर्णय को क्षण भर में परास्त कर देगी।”

अशोक के माथे पर त्योरियाँ चढ़ गईं। उन्होंने रोष में भरकर चाय का कप उठाया और उसे सिंक में उड़ेल दिया।

“देखता हूँ, अब तुम मेरी नियति को कैसे पन्नों पर उतारती हो!” वे बुदबुदाए।

कुछ क्षणों का भारी सन्नाटा छाया रहा। तत्पश्चात् वह ध्वनि एक हल्की-सी दार्शनिक मुस्कान के भाव के साथ पुनः गूँजी—

“अशोक भटनागर को क्षणिक भ्रम हुआ कि वे अपनी लिखी हुई नियति को बदलने में सफल रहे हैं। किंतु वे इस अकाट्य सत्य से अनभिज्ञ थे कि चाय का कप सिंक में बहाने का उनका यह विद्रोह भी उसी आख्यान का एक पूर्वनिर्धारित अंश था।”

अशोक के चेहरे की विजय-श्री लुप्त हो गई। उनका हाथ काँपने लगा।

उस रात्रि वे सो न सके। छत की ओर ताकते हुए वे यही सोचते रहे—क्या वे अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं? क्या यह schizophrenia जैसी किसी गंभीर मानसिक व्याधि का लक्षण है? अथवा संपूर्ण सृष्टि ही किसी महान अदृश्य नाटककार का एक रंगमंच है, जहाँ वे केवल एक कठपुतली मात्र हैं?

उनके तर्कसंगत, गणितीय मस्तिष्क के सामने एक ऐसा यक्ष-प्रश्न खड़ा था, जिसका कोई स्थापित सूत्र या नियम नहीं था।

आने वाले दिनों में वह पार्श्व-ध्वनि (voice-over) उनके जीवन के प्रत्येक सूक्ष्म क्षण का सजीव वर्णन करने लगी—

“वे अलमारी के निचले रैक से धूल-धूसरित पुराने पत्रों को निकालेंगे और अतीत की गलियों में भटकेंगे।”

“वे अपने दूरस्थ नगर में रह रहे पुत्र को दूरभाष करने की चेष्टा करेंगे, किंतु अपनी अंतर्निहित झिझक के कारण हैंडसेट वापस रख देंगे।”

“वे मंजू से कहेंगे कि सब कुछ सामान्य है, जबकि उनके भीतर एक महासागर हिलोरें ले रहा होगा।”

प्रत्येक भविष्यवाणी शत-प्रतिशत सटीक सिद्ध हो रही थी। किंतु सबसे संतापजनक बात यह नहीं थी कि वह आवाज़ केवल बाह्य घटनाओं को जानती थी; भयानक यह था कि वह उन गूढ़ भावनाओं और रहस्यों से भी भली-भाँति परिचित थी, जिन्हें अशोक ने जीवन भर अपने अंतस्तल की सबसे गहरी परतों में छिपाकर रखा था—

  1. शासकीय सेवा के दौरान लिया गया एक ऐसा अनचाहा निर्णय, जिसका अपराधबोध आज भी उन्हें कचोटता था।
  2. समय के साथ बेटे से बढ़ती हुई अलगाव की अदृश्य दीवार का मूक संताप।
  3. पत्नी मंजू के प्रति अगाध निष्ठा और प्रेम, जिसे वे कभी मुखरता से अभिव्यक्त नहीं कर सके और जो पारिवारिक उत्तरदायित्वों की नीरसता में कहीं दबकर रह गया था।
  4. और वह अप्रकाशित, पीली पड़ चुकी कविता, जिसे उन्होंने चालीस वर्ष पूर्व अपनी नवविवाहित पत्नी के लिए लिखा था, किंतु संकोचवश कभी उनके सम्मुख पढ़ा नहीं था।

3. 'शब्द संसार' और आधी-अधूरी पांडुलिपि

अशोक भटनागर ने निष्कर्ष निकाला कि यदि कोई सत्ता उनकी जीवन-गाथा लिख रही है, तो उस आख्यान का कोई-न-कोई मूल स्रोत या साक्ष्य इस भौतिक जगत में अवश्य विद्यमान होना चाहिए।

वे नगर की प्राचीन, विस्मृत गलियों में पुरानी पुस्तकों की दुकानों की खाक छानने लगे। अंततः, एक अत्यंत संकरी और सीलन भरी गली के छोर पर उन्हें एक जीर्ण-शीर्ण दुकान दिखाई दी, जिस पर धुँधले अक्षरों में लिखा था—**'शब्द संसार'**।

दुकान के भीतर पुस्तकों के विशाल साम्राज्य में धूल और पुराने काग़ज़ों की विशिष्ट महक रची-बसी थी। काउंटर के पीछे साठ-पैंसठ वर्ष की एक सौम्य, गंभीर महिला बैठी हुई थीं, जिनकी आँखों में एक अगाध ठहराव था।

“मुझे एक लेखक की खोज है,” अशोक ने अत्यंत क्षीण स्वर में कहा।

महिला ने अपनी आँखों से मोटा चश्मा उतारा और उन्हें आद्यंत देखा। “लेखक का नाम?”

“अज्ञात।”

“पुस्तकालय अथवा पुस्तक का शीर्षक?”

“वह भी मुझे ज्ञात नहीं।”

“फिर इस विशाल शब्द-सागर में उस लेखक को किस आधार पर खोजेंगे?”

अशोक कुछ क्षण स्तब्ध खड़े रहे। फिर स्वर को संयत करते हुए बोले, “क्योंकि वह लेखक मेरी ही साक्षात् ज़िंदगी को पन्नों पर उकेर रहा है।”

महिला के चेहरे पर कोई आश्चर्य या उपहास का भाव नहीं आया। वे तनिक गंभीर हो गईं।

“प्रायः लोग,” महिला ने कहा, “दूसरों की लिखी किताबों में अपनी पहचान ढूँढ़ते हैं। किंतु कुछ विरले ऐसे होते हैं, जो इस भय से काँपते हैं कि उनका संपूर्ण अस्तित्व किसी ऐसे आख्यान में दर्ज है, जिसे उन्होंने स्वयं कभी पढ़ा ही नहीं।”

अशोक की देह में एक सिहरन दौड़ गई। “आप कौन हैं, देवीजी?”

“मीरा... कभी कहानियाँ रचा करती थी।”

“'कभी' क्यों?”

“जब तक मुझे यह बोध नहीं हुआ था कि शब्दों से दुनिया रचना तो अत्यंत सुगम है, किंतु अपने पात्रों की वेदना और नियति का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर वहन करना अत्यंत दुष्कर है,” मीरा ने एक लंबी साँस खींचते हुए कहा।

अशोक ने बिना किसी संकोच के अपनी आपबीती और उस रहस्यमयी पार्श्व-ध्वनि की कथा मीरा के समक्ष खोलकर रख दी।

मीरा नीरव होकर सुनती रहीं। फिर वे उठीं और दुकान के सबसे भीतरी कोने से हाथ से सिली हुई, बिना जिल्द की एक प्राचीन पांडुलिपि निकाल लाईं।

प्रथम पृष्ठ पर हस्तलेख में उकेरा गया था—

‘एक साधारण मनुष्य, जो आजीवन स्वयं को अपनी नियति का स्वामी समझता रहा।’

नीचे किसी रचनाकार का नाम नहीं था।

अशोक ने स्पंदित उँगलियों से पन्ने पलटना प्रारंभ किया। वहाँ उनकी भोर की चाय की भाप थी। उनके कार्यालय के लेखा-जोखा के बोझिल रजिस्टर थे। मंजू की उदास आँखें थीं। बेटे से हुआ अंतिम विवाद था। और यहाँ तक कि उनकी वृद्धा माता के अंतिम क्षणों का वह दृश्य भी अंकित था, जब वे ग्लानि के क्षणों में सही शब्द नहीं बोल पाए थे।

“यह आलेख किसने रचा है?” अशोक का गला रूँध गया।

“संसार में कुछ प्रश्नों के उत्तर न होना ही उनके सत्य होने का प्रमाण है,” मीरा ने धीमे से कहा।

“किंतु यह तो मेरा साक्षात् जीवन है! मेरी आत्मा का पारदर्शी दर्पण है!”

“हो सकता है, भटनागर जी। किंतु यदि कोई आपके अतीत और वर्तमान से भली-भाँति परिचित है, तो क्या इसका यह अर्थ निकाल लेना न्यायसंगत है कि उसने आपके भविष्य के ऊपर से आपकी स्वतंत्रता का अधिकार छीन लिया है?”

यह प्रश्न अशोक के दार्शनिक अस्तित्व की गहराइयों तक उतर गया।

4. वह रिक्त पृष्ठ और संकल्प का जागरण

पांडुलिपि के अंतिम परिच्छेद के पश्चात् एक पृष्ठ पूर्णतः कोरा और खाली था।

अशोक ने काँपते स्वर में पूछा, “इस मौन के आगे क्या लिखा है?”

मीरा ने पांडुलिपि पर हाथ रखते हुए कहा, “शायद कथाकार ने अभी आगे की पंक्तियाँ रची ही नहीं हैं... अथवा वह देखना चाहता है कि उसका पात्र अपने विवेक से क्या चुनता है।”

“और यदि मैं कुछ ऐसा आचरण करूँ, जो इस नियति के विधान में कहीं अंकित न हो?”

“तो निर्भीक होकर कीजिए।”

“और यदि मेरी वह विद्रोह-यात्रा भी पहले से ही यहाँ किसी अदृश्य मसीही द्वारा लिखी जा चुकी हो, तो?”

मीरा के होंठों पर एक आत्मीय मुस्कान तैर गई। “तब भी कम-से-कम आपके पास इस बात का संतोष होगा कि आपने एक निर्जीव पात्र की भाँति जीने के बजाय एक जीवित मनुष्य की भाँति प्रयास करने का साहस तो किया।”

अशोक उस संध्या जब घर लौटे, तो उनके भीतर का द्वंद्व एक नवीन चेतना में ढल चुका था।

उस रात्रि भोजन के पश्चात् उन्होंने वर्षों के मौन को तोड़ते हुए अपनी पत्नी की आँखों में आँखें डालकर पूछा—

“मंजू... क्या तुम इस जीवन से, मेरे साथ से प्रसन्न हो?”

मंजू ने पहले तो चकित होकर उन्हें देखा, जैसे कोई स्वप्न देख रही हो। फिर उनकी पलकों के कोर भीग गए।

“अशोक... तुमने विगत कई दशकों में पहली बार मुझसे मेरे मन का हाल पूछा है।”

अशोक ने आगे बढ़कर मंजू के झुर्रियों भरे हाथों को अपने हाथों में थाम लिया। उस एक आत्मीय स्पर्श ने उनके मध्य वर्षों से जमी बर्फ की मोटी परत को एक ही क्षण में पिघला दिया।

अगली भोर उन्होंने स्वयं पहल करके अपने पुत्र को दूरभाष किया। इस बार संवाद केवल औपचारिक हाल-चाल या उपदेशात्मक निर्देशों तक सीमित नहीं रहा। अशोक ने अपनी बात थोपने के बजाय पहली बार एक पिता के रूप में अपने पुत्र की आकांक्षाओं और उसके संघर्षों को चुपचाप सुना।

तत्पश्चात् वे अपनी पुरानी अध्ययन मेज़ पर गए। दराज के सबसे निचले हिस्से से उन्होंने वह चालीस वर्ष पुरानी कविता निकाली। काग़ज़ पीला पड़ चुका था और अक्षर धुँधले हो रहे थे।

उन्होंने जब उस कविता का वाचन किया, तो पाया कि उसमें एक ऐसे हताश व्यक्ति की व्यथा अंकित थी, जो संपूर्ण जीवन परिपक्व समय, सही अवसर और अनुकूल परिस्थितियों की प्रतीक्षा में ही गँवा देता है—और इस प्रतीक्षा के फेर में जीना ही भूल जाता है।

अशोक ने उस पीले काग़ज़ को दीर्घकाल तक निहारा। फिर उन्होंने एक नवीन फ़ाउंटेन पेन उठाया और काग़ज़ के निचले हिस्से पर एक नया विचार अंकित किया—

“मानव जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि मृत्यु एक अटल सत्य है; अपितु त्रासदी यह है कि हम जीवित रहते हुए भी अपने भीतर के संवेदनशील मनुष्य और अपनी मौलिक इच्छाओं को तिल-तिल मारकर दफ़न कर देते हैं।”

उन्हें आभास हुआ कि वही अदृश्य पार्श्व-ध्वनि पुनः उनके कंधे के पीछे खड़ी होकर इस नए वाक्य को सुन रही है। किंतु उस दिन वायु में कोई आवाज़ नहीं गूँजी। केवल एक गहरा, पवित्र सन्नाटा व्याप्त था।

5. अंतिम परिच्छेद और चेतना की मुक्ति

कुछ सप्ताह व्यतीत हो गए। अशोक के जीवन में अब एक अद्भुत सहजता और जीवंतता आ चुकी थी। वे पुनः ‘शब्द संसार’ की उस जीर्ण गली में पहुँचे।

संध्या का समय था। मीरा दुकान के कपाट बंद कर रही थीं।

“मुझे उस पांडुलिपि के अंतिम पृष्ठ को एक अंतिम बार देखना है,” अशोक ने विनीत स्वर में कहा।

मीरा ने बिना कोई प्रश्न किए पांडुलिपि निकालकर उनके हाथ में थमा दी।

अशोक ने अत्यंत आतुरता से अंतिम पृष्ठ पलटा। वह पृष्ठ, जो पूर्व में पूर्णतः रिक्त था, अब उस पर ताज़ी स्याही से कुछ पंक्तियाँ अंकित थीं—

“अशोक भटनागर ने अंततः इस शाश्वत सत्य का साक्षात्कार कर लिया कि मनुष्य अपनी जीवन-लीला का रचयिता है या केवल एक माध्यम, यह प्रश्न गौण है। मुख्य और सार्थक बात केवल यह है कि वह अपने हिस्से में आए सीमित जीवन के क्षणों को कितनी आत्मीयता और चेतना के साथ जीता है।”

और उसी पृष्ठ के निचले भाग में एक अंतिम वाक्य उकेरा गया था—

“कल की नवीन भोर में अशोक भटनागर एक ऐसा निर्णय लेंगे, जो केवल उनका अपना होगा।”

अशोक ने पांडुलिपि को बंद कर दिया। “क्या आप बता सकती हैं कि यह अंतिम पृष्ठ किसने लिखा?”

मीरा ने केवल एक मंद मुस्कान से उत्तर दिया, कोई शब्द नहीं कहा।

अशोक उस पांडुलिपि को वहीं छोड़कर दुकान से बाहर निकल आए।

बाहर मूसलाधार वर्षा प्रारंभ हो चुकी थी। मार्ग पर लोग आश्रय की खोज में भाग रहे थे। एक छोटा बालक निर्भीक होकर पानी के बहाव में काग़ज़ की नौकाएँ तैरा रहा था। पास ही एक वृद्ध सज्जन बिना छतरी के वर्षा में पूरी तरह भीग रहे थे।

अशोक शांत कदमों से उस वृद्ध के समीप गए और अपनी छतरी उनके सिर पर तान दी। फिर वे स्वयं छतरी से बाहर निकल आए और भीगते हुए सड़क पर चलने लगे।

अब उनके मस्तिष्क में कोई अनजानी पार्श्व-ध्वनि गूँज नहीं रही थी।

वहाँ केवल वर्षा की बूँदों की मधुर सरसराहट थी।

और उस वर्षा में भीगते हुए उनके भीतर एक असीम, अगाध स्वतंत्रता का बोध हो रहा था।

अगली प्रातः उन्होंने अपनी व्यक्तिगत डायरी खोली और उसके श्वेत पृष्ठ पर लिखा—

“यदि मेरी जीवन-गाथा किसी अदृश्य विधाता द्वारा पूर्व-लिखित भी है, तब भी मैं इस बात से अनभिज्ञ हूँ कि आने वाला पृष्ठ क्या संदेश लेकर आएगा। और जब तक मैं अपने कल से अनजान हूँ, तब तक मेरे पास इस जीवन को पूर्ण सघनता से जीने का एक अनंत कारण विद्यमान है।”

उन्होंने कलम नीचे रखी। फिर क्षण भर ठहरकर, अपनी आत्मा की संपूर्ण शक्ति को समेटते हुए पुनः कलम उठाई और पृष्ठ के अंत में अंकित किया—

“हे अदृश्य कथाकार! यदि तुम कहीं अस्तित्व में हो, तो आज मुझे अपने जीवन का अध्याय अपनी स्याही से लिखने दो

उस प्रभात के पश्चात् अशोक भटनागर को वह रहस्यमयी आवाज़ कभी सुनाई नहीं दी।

अथवा संभव है कि वह आवाज़ अब भी आकाशांगण में गूँजती रही हो, किंतु अशोक ने उस कोलाहल के बीच पहली बार अपने अंतरात्मा की मौलिक पुकार को सुनना और जीना सीख लिया था।

उपसंहार

नियति बनाम स्वतंत्र इच्छा (Fate vs. Free Will): क्या हमारा भावी जीवन पूर्व-निर्धारित है या हमारे जागरूक निर्णय उसे नया रूप देते हैं? कहानी यह प्रतिपादित करती है कि भले ही परिस्थितियाँ पूर्व-लिखित हों, किंतु उन परिस्थितियों के प्रति हमारा दृष्टिकोण और मानवीय संवेदना पूरी तरह हमारी अपनी पसंद (Choice) होती है।

भारतीय मध्यवर्ग का अंतर्द्वंद्व: मध्यमवर्गीय जीवन में कर्तव्यों, दिनचर्या और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाते-निभाते व्यक्ति अपने अस्तित्व, कला और दबी हुई भावनाओं को भूल जाता है। जीवन का वास्तविक विद्रोह अपनी उन्हीं दबी हुई संवेदनाओं को पुनः जीवित करना है।

जीवन की सार्थकता: स्वतंत्रता का अर्थ भविष्य को पूरी तरह नियंत्रित करना नहीं, बल्कि अनिश्चितताओं से भरे भविष्य के सामने समर्पण करने के बजाय आज के क्षण में एक अर्थपूर्ण और साहसी कदम उठाना है।

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