कौन चाहता है पत्थर बनना?
हर दिल तो बस धड़कना चाहता है,
प्यार करना चाहता है,
किसी का अपना बनना चाहता है।
लेकिन जब हर मोड़ पर
अपने ही दर्द दे जाएँ,
जब भरोसे बार-बार टूटें,
तो दिल भी कब तक संभल पाए?
कितनी बार अपने ज़ख्म
हँसकर दुनिया से छुपाओगे?
कितनी रातें
तकिए में चेहरा छिपाकर रोओगे?
जिसे अपना समझा,
वही सबसे दूर चला गया।
जिस पर सबसे ज़्यादा भरोसा था,
वही भरोसा तोड़ गया।
धीरे-धीरे
उम्मीद का हर दिया बुझने लगा,
और भीतर रहने वाला
मासूम इंसान चुप होने लगा।
फिर एक दिन ऐसा आता है,
जब आँसू भी बहना छोड़ देते हैं।
होंठ दुनिया के लिए मुस्कुरा देते हैं,
लेकिन दिल...
कुछ भी महसूस करना छोड़ देता है।
तब लोग कहते हैं—
"तुम बहुत बदल गए हो।"
काश,
कोई उनसे पूछे कि
क्या किसी ने यूँ ही बदलना चाहा था?
जो दिल कभी
मोम की तरह पिघल जाता था,
वही अब चट्टान-सा शांत हो जाता है।
क्योंकि हर टूटा हुआ भरोसा,
इंसान के भीतर
थोड़ा-थोड़ा पत्थर छोड़ जाता है।
और फिर...
न कोई शिकायत बचती है,
न कोई सवाल।
न किसी से उम्मीद,
न किसी बात का मलाल।
बस चेहरे पर
एक ख़ामोश मुस्कान रह जाती है,
और भीतर...
एक पूरा समंदर
बिना लहरों के,
बिल्कुल ख़ामोश हो जाता है।