Source: Sourov Sarker on Pexels.com

इतना न रूठ कि मैं लौट ही न सकूँ,
इतना न दूर जा
कि पुकार भी मेरी
तुझ तक पहुँच न सके।

तेरी दी हुई सज़ा
कहीं तेरे ही हिस्से का अभिशाप न बन जाए,
मुझे जलाने की कोशिश में
कहीं तू ही भीतर से राख न हो जाए।

मैंने बहुत सोचा—
तुझे दोष दूँ,
तुझे बद्दुआ दूँ,
या तेरी हर चोट का हिसाब माँगूँ;
फिर मन ने कहा—
जिसे कभी अपना माना हो,
उसके लिए नफ़रत भी
अपने ही हृदय को जलाती है।

इसलिए मैं तुझे क्षमा करता हूँ—
तेरी हर भूल को नहीं,
बल्कि अपने भीतर बचे हुए
उस प्रेम की खातिर
जो नफ़रत बनना नहीं चाहता।

लेकिन मेरी क्षमा को
मेरी कमजोरी मत समझना।
मैंने माफ़ किया है,
खुद को मिटाया नहीं।

मैं तेरे लिए
अपने आँसू फिर नहीं बहाऊँगा,
अपनी गरिमा फिर नहीं खोऊँगा,
और उस दरवाज़े पर
बार-बार दस्तक नहीं दूँगा
जहाँ मेरे सम्मान के लिए
कोई जगह नहीं थी।

मैंने सीखा है—
प्रेम में झुकना सुंदर है,
पर स्वयं को तोड़ देना प्रेम नहीं।
क्षमा करना महान है,
पर बार-बार उसी घाव को
सहते रहना
अपने प्रति अन्याय है।

तू अपनी राह चुन,
मैं अपनी राह चलूँगा।
तेरे प्रति मेरे मन में
अब कोई विष नहीं,
लेकिन अपने जीवन के प्रति
मेरी ज़िम्मेदारी अभी बाकी है।

यदि कभी तुझे
मेरी याद आए,
तो मुझे उस व्यक्ति की तरह याद करना
जिसने तुझे सच्चे मन से चाहा था,
जिसने तुझे क्षमा भी किया,
मगर अंततः
अपने आत्मसम्मान को भी
गले लगाया।

मैं तुझसे बदला नहीं चाहता,
बस इतना चाहता हूँ
कि तू एक दिन समझ सके—
किसी को खो देना
हमेशा उसकी हार नहीं होती,
कभी-कभी वह
उसका स्वयं को बचा लेना होता है।

और यदि कभी
हमारी राहें फिर मिलें,
तो न कोई शिकायत होगी,
न कोई हिसाब,
न पुराने घाव कुरेदने की इच्छा।

बस दो शांत आँखें होंगी,
जो एक-दूसरे से कहेंगी—
“जो हुआ, वह बहुत दुखद था,
पर हमने उससे कुछ सीखा भी।”

मैं तुझे क्षमा करके
अपने अतीत को मुक्त करता हूँ,
और स्वयं को सम्मान देकर
अपने भविष्य को।

अब न तेरे लिए बद्दुआ है,
न लौटने की कोई ज़िद—
बस एक सच्ची-सी दुआ है:

तू सुखी रहे,
मैं भी मुस्कुराना सीखूँ,
और हमारी अधूरी कहानी
नफ़रत में नहीं,
समझदारी में पूरी हो।

क्योंकि प्रेम की सबसे सुंदर परिणति
हमेशा साथ रहना नहीं होती—
कभी-कभी
एक-दूसरे को क्षमा करके,
सम्मान के साथ दूर हो जाना भी
प्रेम का ही एक रूप होता है।

.    .    .