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तुम्हारे जाने के बाद

सबसे पहले
घर की आवाज़ बदल गई।

सब कुछ अपनी जगह पर था—
दीवारें,
खिड़कियाँ,
अलमारी में करीने से रखी किताबें,
यहाँ तक कि सुबह की धूप भी
हर रोज़ उसी तरह
फ़र्श पर उतरती रही।

बदला था तो बस इतना,
कि अब उस रोशनी में
कोई तुम्हारा इंतज़ार नहीं करता था।

तभी जाना,
अनुपस्थिति भी
किसी जीवित व्यक्ति की तरह
घर में रहने लगती है।

वह दिखाई नहीं देती,
फिर भी
हर कमरे में उसका होना महसूस होता है।

वह कुर्सियों पर बैठती है,
तकियों की सिलवटों में ठहर जाती है,
पुरानी किताब खोलो,
तो पन्नों के बीच से
धीरे से निकल आती है।

और रात...

रात तो जैसे
उसी की हो जाती है।

लोग कहते हैं,
समय सब ठीक कर देता है।

शायद करता होगा।

लेकिन कुछ लोग
समय से बाहर चले जाते हैं।

वे स्मृति में नहीं रहते,
वे हमारी आदत बन जाते हैं।

फिर एक दिन

हम अचानक महसूस करते हैं
कि हम अकेले नहीं जी रहे—

हम उनके साथ जी रहे हैं
जो अब हमारे साथ नहीं हैं।

मैंने तुम्हें
कभी उस तरह देखा ही नहीं,
जिस तरह अब देखता हूँ।

जब कोई रोज़ हमारे पास होता है,
हम उसके होने को
जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मान लेते हैं।

हवा की तरह।

उसकी मौजूदगी
तब तक महसूस नहीं होती,
जब तक वह
एक दिन चुपचाप
हमसे दूर न चली जाए।

अब याद आती हैं
वे बातें
जो उस समय
बहुत छोटी लगती थीं।

तुम्हारा
बिना कुछ कहे
मेरे सामने चाय रख देना।

मेरी अधूरी बात
मुस्कुराकर पूरी कर देना।

मेरे अनावश्यक क्रोध के बीच
अपनी शांत आँखों से
मुझे देखना।

तब लगा था,
ये सब तो रोज़ की बातें हैं।

आज लगता है—

जीवन
इन्हीं रोज़ की बातों से बनता है।

प्रेम
बड़े वादों में नहीं रहता।
वह रसोई से आती
चाय की भाप में रहता है।

किसी का
दरवाज़े तक छोड़ने आना।

भीड़ में
अनायास हाथ पकड़ लेना।

बिना पूछे
थाली में
एक रोटी और रख देना।

मैंने तुम्हें
सबसे ज़्यादा
तुम्हारे जाने के बाद समझा।

और शायद
यही प्रेम की सबसे बड़ी विडम्बना है।

जब तक वह हमारे पास होता है,
हम उसके अर्थ को
टालते रहते हैं।

जब वह चला जाता है,
हम पूरी उम्र
उसी अर्थ को पढ़ते रहते हैं।

मुझे
अपने कहे हुए कुछ शब्द
आज भी याद हैं।

वे उस समय
साधारण वाक्य थे।

अब
वे मेरी स्मृति में
पत्थरों की तरह पड़े हैं।

दूसरों की कही हुई बातें
समय के साथ धुँधली पड़ जाती है।

अपनी कही हुई बातें
अक्सर जीवन भर
सुनाई देती रहती हैं।

यदि कभी
तुम सचमुच लौट सको,
तो मैं
तुमसे क्षमा भी नहीं माँगूँगा।

क्षमा
शायद बहुत छोटा शब्द है।

मैं बस
तुम्हारे पास बैठना चाहूँगा।

बिना किसी सफ़ाई के।

बिना किसी शिकायत के।

जैसे दो लोग
बहुत लंबी यात्रा के बाद
एक ही पेड़ की छाँव में
कुछ देर विश्राम कर रहे हों।

अब जब भी
किसी वृद्ध दम्पति को
धीरे-धीरे साथ चलते देखता हूँ,

जब कोई
अपने हिस्से का आख़िरी कौर
दूसरे की थाली में रख देता है,


जब किसी की आँखों में
अपने से पहले
किसी और की चिंता दिखाई देती है,

मैं तुम्हें याद नहीं करता—
मैं तुम्हें
वहाँ मौजूद पाता हूँ।

तुम
एक व्यक्ति से
धीरे-धीरे
एक संवेदना बन गई हो।

और शायद
प्रेम का अंतिम रूप
यही होता है।

वह किसी एक चेहरे में नहीं रहता।

वह हमारे देखने का ढंग बदल देता है।

मैं अब भी
उसी हवा में साँस लेता हूँ।

फ़र्क बस इतना है—
पहले
उस हवा में
तुम साथ थीं।

अब
तुम्हारी स्मृति है।

और कई बार,

स्मृतियाँ भी
साँस लेने के लिए
काफ़ी होती हैं।

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