Chapter 1: वह चेहरा जो सपनों से उतर आया
रात फिर वही सपना लेकर आई थी।
नींद और जागने के बीच की उस धुंधली-सी अवस्था में, जहाँ समय ठहर जाता है और मन सच–झूठ का फ़र्क़ भूल जाता है, वह चेहरा एक बार फिर सामने था। साफ़ नहीं, पूरा नहीं—बस आँखें। गहरी, शांत, और अजीब तरह से परिचित। जैसे उन्हें देखने के लिए आँखों ने बरसों इंतज़ार किया हो।
स्वाति नींद से हड़बड़ा कर उठ बैठी। कमरे में अँधेरा था, लेकिन दिल तेज़ धड़क रहा था। पंखा धीमी आवाज़ में घूम रहा था, जैसे रात को भी थकान हो। उसने अपने माथे पर उभरी नमी को पोंछा और गहरी साँस ली। यह सपना नया नहीं था। पिछले कई महीनों से वही चेहरा, वही आँखें, वही अनकहा एहसास—हर बार किसी नए रूप में लौट आता।
"कौन हो तुम?" वह अक्सर खुद से पूछती, लेकिन जवाब कभी नहीं मिलता।
मोबाइल घड़ी में सुबह के चार बज रहे थे। नींद दोबारा आने वाली नहीं थी। वह बिस्तर से उठी, खिड़की के पास जाकर परदा हटाया। बाहर सन्नाटा था। सड़क की लाइट पीली रोशनी में नहाई हुई थी और कहीं दूर किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आ रही थी।
स्वाति की ज़िंदगी बाहर से बहुत साधारण लगती थी—एक सामान्य-सी लड़की, नौकरी की तलाश में लगी, परिवार की उम्मीदों और समाज के सवालों के बीच फँसी हुई। लेकिन उसके भीतर एक ऐसा कोना था, जिसे कोई नहीं जानता था। एक ऐसा खालीपन, जिसे न दोस्त भर पाए, न परिवार, न ही समय।
वह अक्सर सोचती—क्या हर इंसान के भीतर कोई अधूरी कहानी होती है? या यह खालीपन सिर्फ़ उसी का है? सुबह होने में अभी समय था, फिर भी वह रसोई में चली गई। गैस जलाकर चाय रखी। चाय बनाते हुए भी उसका मन उसी चेहरे में उलझा रहा। उसने कितनी बार कोशिश की थी कि इन सब बातों को तर्क से समझे—"यह बस दिमाग़ का खेल है", "अकेलापन है", "ज़्यादा सोचने की आदत है"—लेकिन दिल हर बार इन दलीलों को नकार देता।
चाय का कप हाथ में लेकर वह बालकनी में बैठ गई। हल्की-हल्की हवा चल रही थी। आकाश में तारे अब भी चमक रहे थे। उसने आँखें बंद कीं तो वही एहसास फिर लौट आया—जैसे कोई बहुत अपना, बहुत क़रीबी, लेकिन अनदेखा-सा, उसके आसपास मौजूद हो।
उसकी माँ अक्सर कहती थीं, "इतना मत सोचा कर। ज़िंदगी जितनी सीधी होती है, उतनी ही बेहतर।"
लेकिन स्वाति जानती थी—कुछ ज़िंदगियाँ सीधी नहीं होतीं। कुछ रिश्ते नाम माँगते हैं, लेकिन मिल नहीं पाते। और कुछ एहसास ऐसे होते हैं, जिनका कोई वर्तमान नहीं होता, फिर भी वे भीतर पूरी ताक़त से ज़िंदा रहते हैं।
दिन चढ़ने लगा था। घर के बाकी लोग उठने लगे। रोज़मर्रा की आवाज़ें—बर्तन, दरवाज़े, बातचीत—सब कुछ सामान्य था। लेकिन स्वाति के लिए आज का दिन अलग था, बिना किसी साफ़ वजह के।
दोपहर में वह लाइब्रेरी गई। किताबें हमेशा उसे सुकून देती थीं। वहाँ इतिहास, दर्शन और आध्यात्म पर उसकी ख़ास रुचि थी। जैसे-जैसे वह पन्ने पलटती, उसे लगता कि वह किसी उत्तर के क़रीब पहुँच रही है।
एक पुरानी-सी किताब उसकी नज़र में आई—"कर्म और पुनर्जन्म"। उसने बिना ज़्यादा सोचे किताब उठा ली।
किताब के पहले पन्ने पर लिखा था:
"कुछ मुलाक़ातें इस जन्म की नहीं होतीं। वे समय की सीमा से परे होती हैं।"
स्वाति का दिल एक पल को रुक-सा गया। क्या यह महज़ इत्तेफ़ाक़ था?
वह किताब लेकर कोने में बैठ गई। पढ़ते-पढ़ते उसके मन में कई सवाल उठने लगे। अगर आत्मा सच में बार-बार जन्म लेती है, तो क्या अधूरे रिश्ते भी साथ चलते हैं? क्या कोई ऐसा हो सकता है, जो इस जीवन में अजनबी हो, लेकिन आत्मा के स्तर पर अपना?
शाम ढलने लगी थी जब वह लाइब्रेरी से बाहर निकली। रास्ते में भीड़ थी, लोग थे, आवाज़ें थीं—लेकिन अचानक, उसी भीड़ में…
उसकी नज़र किसी पर टिक गई।
वही आँखें।
|सपनों वाली आँखें।
एक पल के लिए दुनिया थम गई। साँसें भारी हो गईं। वह व्यक्ति कुछ दूर खड़ा था, किसी से बात कर रहा था। चेहरा पूरा दिख रहा था—साधारण, शांत, लेकिन उसकी आँखों में वही गहराई थी, जिसे वह महीनों से सपनों में देख रही थी।
वह कुछ कह नहीं पाई। पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए हों। उसने नज़रें हटाईं, फिर दोबारा देखी—वह वहाँ था। सच में। मन में एक ही सवाल गूँज रहा था:
"क्या यह वही है… या मेरा मन मुझे धोखा दे रहा है?"
भीड़ के साथ वह व्यक्ति आगे बढ़ गया और देखते-देखते ओझल हो गया। स्वाति वहीं खड़ी रह गई—हैरान, काँपती हुई, और एक अजीब-सी शांति से भरी। उसे नहीं पता था कि यह मुलाक़ात उसकी ज़िंदगी की दिशा बदलने वाली है। उसे यह भी नहीं पता था कि यह कहानी सिर्फ़ इस जन्म की नहीं थी।
लेकिन एक बात वह साफ़ महसूस कर रही थी—
कहीं न कहीं, कोई अधूरा वादा फिर से जाग चुका था।
उस शाम के बाद से स्वाति की ज़िंदगी में कुछ भी वैसा नहीं रहा जैसा पहले था।
लाइब्रेरी से लौटते समय जो चेहरा भीड़ में कहीं खो गया था, वह अब भी उसके भीतर साफ़ दिखाई दे रहा था। आँखें बंद करती तो वही आँखें सामने आ जातीं। खुली आँखों में भी वही गहराई पीछा करती। जैसे किसी ने उसके मन के भीतर कोई दरवाज़ा खोल दिया हो—और अब वह दरवाज़ा बंद होने का नाम नहीं ले रहा था।
घर पहुँचते-पहुँचते अँधेरा हो चुका था। माँ ने दरवाज़ा खोला तो स्वाति को देखते ही पूछ बैठीं, “इतनी देर क्यों हो गई? मोबाइल भी नहीं उठाया।”
स्वाति मुस्कराने की कोशिश करती हुई अंदर चली गई। “लाइब्रेरी में किताब मिल गई थी… पढ़ते-पढ़ते समय का पता नहीं चला।”
यह आधा सच था। किताब तो मिली थी, लेकिन असली उलझन किताब के बाहर खड़ी थी—भीड़ में, सपनों में, और अब उसकी धड़कनों में।
रात का खाना खाते समय भी उसका ध्यान प्लेट में कम और अपने भीतर ज़्यादा था। पिता अख़बार पढ़ रहे थे, छोटी बहन किसी धारावाहिक में डूबी थी, और माँ रसोई में अगले दिन की तैयारी कर रही थीं। सब कुछ सामान्य था। सिर्फ़ स्वाति असामान्य हो चुकी थी।
उस रात उसे नींद देर से आई। जब आई, तो सपना पहले से ज़्यादा स्पष्ट था। वही चेहरा—अब धुँधला नहीं था। वह सामने खड़ा था। पास। बहुत पास।
“इतनी देर लगा दी तुमने,” उस आवाज़ में शिकायत नहीं, इंतज़ार था।
स्वाति ने घबराकर पूछा, “हम… क्या जानते हैं एक-दूसरे को?” वह मुस्कराया। “तुम्हारी आत्मा जानती है। तुम्हारा मन अभी सीख रहा है।”
नींद टूट गई। दिल ज़ोर से धड़क रहा था। उसने तकिए के नीचे रखा मोबाइल निकाला—सुबह के पाँच बज रहे थे।
अब यह सिर्फ़ सपना नहीं रह गया था। यह कोई संकेत था।
अगले कुछ दिन स्वाति ने ख़ुद को व्यस्त रखने की पूरी कोशिश की। नौकरी के लिए आवेदन, इंटरव्यू की तैयारी, घर के काम—सब कुछ। लेकिन हर रास्ता, हर खिड़की, हर भीड़ उसे उसी दिशा में खींच रही थी।
वह फिर लाइब्रेरी गई। इस बार जानबूझकर।
उसे पता नहीं था कि वह क्या ढूँढ रही है—शायद वही किताब, शायद वही चेहरा।
लाइब्रेरी में वही शांति थी। वही लकड़ी की अलमारियाँ, वही पुरानी किताबों की गंध। उसने “कर्म और पुनर्जन्म” वाली किताब ढूँढी। वह अपनी जगह पर नहीं थी।
“क्या मैं आपकी मदद कर सकता हूँ?”
यह आवाज़…
स्वाति ने पलटकर देखा।
वह वहीं था। वही व्यक्ति। वही आँखें। सपनों से निकलकर, अब बिल्कुल सामने।
कुछ पल दोनों चुप रहे। जैसे शब्दों को भी समझ नहीं आ रहा हो कि शुरुआत कहाँ से करें। स्वाति ने खुद को सँभालते हुए कहा, “मैं… एक किताब ढूँढ रही थी।”
वह हल्का-सा मुस्कराया। “कर्म और पुनर्जन्म?”
स्वाति चौंक गई। “आपको कैसे पता?”
“क्योंकि वही किताब मेरे हाथ में है,” उसने पास की मेज़ की ओर इशारा किया।
वहाँ वही किताब रखी थी। स्वाति ने पहली बार उसे ध्यान से देखा। साधारण कपड़े, शांत चेहरा, लेकिन आँखों में कुछ ऐसा था जो साधारण नहीं था।
“मेरा नाम आरव है,” उसने कहा।
नाम सुनते ही स्वाति के भीतर कुछ काँप गया। जैसे यह नाम उसने पहले भी सुना हो। बहुत पहले।
“स्वाति,” उसने जवाब दिया।
नामों का यह आदान-प्रदान छोटा था, लेकिन असर गहरा। दोनों पास की कुर्सियों पर बैठ गए। किताब उनके बीच रखी थी, लेकिन बातचीत किताब से बहुत आगे निकल चुकी थी।
“आप… इन बातों में विश्वास करती हैं?” आरव ने पूछा।
“किस बातों में?”
“पिछले जन्म, कर्म, आत्मा का सफ़र।”
स्वाति ने कुछ पल सोचा। “पहले नहीं करती थी। लेकिन अब… शायद करने लगी हूँ।”
आरव ने उसकी ओर देखा। “कभी-कभी विश्वास से पहले अनुभव आता है।”
उस वाक्य ने स्वाति को भीतर तक छू लिया। दिन बीतने लगे। लाइब्रेरी अब उनका मिलन-स्थल बन चुकी थी। कभी किताबों के बहाने, कभी चाय के बहाने। बातें धीरे-धीरे गहरी होती गईं।
आरव ने बताया कि वह एक शोधकर्ता है—दर्शन और चेतना पर काम करता है। स्वाति को यह सुनकर हैरानी नहीं हुई। उसे लगा जैसे वह हमेशा से यही करता आया हो।
“तुम्हें कभी ऐसा लगता है,” आरव ने एक दिन पूछा, “कि कुछ लोग ज़िंदगी में अचानक नहीं आते?”
स्वाति ने सिर हिलाया। “जैसे वे पहले से तय होते हैं।”
“हाँ,” आरव ने धीरे से कहा, “जैसे आत्मा उन्हें पहचान लेती है।”
उस पल स्वाति को एहसास हुआ—वह डर नहीं रही थी। न उलझन थी, न संदेह। बस एक गहरी-सी शांति थी। लेकिन हर शांति के पीछे कोई न कोई तूफ़ान छिपा होता है। एक शाम आरव ने उसे एक पुराने मंदिर चलने को कहा। शहर से थोड़ा दूर, जंगल के पास।
“वहाँ कुछ ऐसा है,” उसने कहा, “जो शायद तुम्हें समझने में मदद करेगा।”
स्वाति ने हिचकिचाते हुए हाँ कहा। मंदिर छोटा था, लेकिन वातावरण में गहराई थी। हवा में धूप और अगरबत्ती की मिली-जुली खुशबू थी।
आरव ने आँखें बंद कर लीं। स्वाति ने भी वैसा ही किया।
कुछ क्षण बाद—
स्वाति की आँखों के सामने दृश्य बदलने लगे। वह खुद को किसी और समय में देख रही थी। किसी और शरीर में। सामने वही आरव—लेकिन अलग कपड़ों में, अलग युग में।
आँखों से आँसू बहने लगे।
“तुम्हें भी दिख रहा है, है न?” आरव की आवाज़ धीमी थी।
स्वाति ने सिर हिलाया। वह बोल नहीं पा रही थी।
“हम अधूरे रह गए थे,” आरव ने कहा। “किसी वादे पर।”
स्वाति के भीतर सब कुछ हिल गया। घर लौटते समय वह चुप थी। सवाल बहुत थे, लेकिन जवाबों से ज़्यादा डर। क्या यह सच था? या मन का भ्रम? लेकिन एक बात साफ़ थी—यह रिश्ता साधारण नहीं था। उस रात स्वाति ने डायरी खोली और पहली बार लिखा:
“अगर यह झूठ है, तो भी यह मेरा सबसे सच्चा एहसास है।”
उसे नहीं पता था कि आने वाले अध्यायों में यह एहसास उसकी सबसे बड़ी परीक्षा बनने वाला है।
क्योंकि जहाँ आत्माएँ जुड़ती हैं,
वहाँ संसार अक्सर विरोध करता है।
कुछ मुलाक़ातें जीवन में सुकून नहीं, उथल-पुथल लेकर आती हैं। वे मन को शांत नहीं करतीं, बल्कि भीतर जमी हुई परतों को हिला देती हैं। आरव से मिलने के बाद स्वाति की स्थिति भी कुछ ऐसी ही हो चुकी थी।
मंदिर वाली शाम के बाद से वह भीतर-ही-भीतर बदलने लगी थी। बाहर से वही स्वाति—घर, परिवार, ज़िम्मेदारियाँ—लेकिन भीतर कोई और जाग चुका था। कोई ऐसा, जो सवाल पूछता था, तर्क करता था, और कभी-कभी विद्रोह भी।
उस रात उसे नींद नहीं आई। वह बार-बार करवट बदलती रही। आँखें बंद करती तो मंदिर का दृश्य लौट आता—अगरबत्ती की खुशबू, हवा की सरसराहट, और आरव की वह आवाज़—“हम अधूरे रह गए थे।”
अधूरे…
यह शब्द उसके मन में काँटे की तरह चुभ रहा था। सुबह जब माँ ने आवाज़ दी, “स्वाति, उठ जा… देर हो रही है,” तो वह जैसे किसी और दुनिया से लौटकर आई हो।
“आ रही हूँ,” उसने जवाब दिया, लेकिन उसकी आवाज़ में वह स्पष्टता नहीं थी जो रोज़ होती थी।
दिन की शुरुआत सामान्य थी, लेकिन मन असामान्य। चाय का स्वाद फीका लग रहा था। अख़बार की सुर्खियाँ अर्थहीन। छोटी बहन की बातें दूर की आवाज़ जैसी।
माँ ने उसे ध्यान से देखा। “सब ठीक है न?”
स्वाति ने सिर हिलाया। “हाँ।”
यह ‘हाँ’ सच नहीं था, लेकिन झूठ भी नहीं। यह बस एक टालना था।
दोपहर में उसे आरव का संदेश आया—
“अगर चाहो तो आज मिल सकते हैं। बातें अधूरी रह गई थीं।”
स्वाति ने मोबाइल को देर तक देखा। मन में डर भी था और खिंचाव भी।
अधूरी बातें…
उसने अंततः जवाब दिया—“शाम को।”
वे शहर के पुराने हिस्से में एक छोटी-सी कैफ़े में मिले। वहाँ ज़्यादा भीड़ नहीं थी। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें टंगी थीं—जैसे समय खुद वहाँ बैठकर आराम कर रहा हो।
आरव पहले से मौजूद था। उसे देखते ही स्वाति के भीतर कुछ स्थिर-सा हो गया।
“तुम ठीक हो?” उसने पूछा।
“नहीं पता,” स्वाति ने ईमानदारी से कहा।
आरव मुस्कराया। “अच्छा है। इसका मतलब तुम सच से भाग नहीं रही।”
स्वाति ने उसकी ओर देखा। “तुम्हें डर नहीं लगता? जो हम महसूस कर रहे हैं, वह… सामान्य नहीं है।”
आरव ने चाय का घूँट लिया। “सामान्य अक्सर अधूरा होता है।”
कुछ पल दोनों चुप रहे। फिर स्वाति ने पूछा, “अगर यह सब सच है… तो हमें याद क्यों नहीं? पिछले जन्म, वह वादा—सब?”
आरव ने गहरी साँस ली। “क्योंकि यादें बोझ बन जाती हैं। आत्मा सिर्फ़ एहसास बचाकर रखती है।”
यह जवाब तसल्ली देने वाला नहीं था, लेकिन सच्चा लग रहा था।
शाम ढलते-ढलते बातचीत गहरी होती गई। आरव ने बताया कि उसके जीवन में भी यह बेचैनी हमेशा से रही है। बिना वजह उदासी, बिना वजह तलाश।
“मैंने रिश्ते बनाए,” उसने कहा, “लेकिन कहीं टिक नहीं पाया। जैसे मैं किसी और का इंतज़ार कर रहा था, बिना जाने कि वह कौन है।”
स्वाति की आँखें भर आईं।
“और अब?” उसने पूछा।
आरव ने उसकी ओर देखा। “अब सवाल यह नहीं है कि हम क्या चाहते हैं। सवाल यह है कि कर्म हमें कहाँ तक साथ चलने देंगे।”
यह पहली बार था जब किसी ने ‘कर्म’ को डर की तरह पेश किया।
अगले कुछ हफ्तों में हालात बदलने लगे।
घर में माँ ने रिश्ते की बात छेड़ दी। “अब तुम्हारी उम्र हो रही है। हम लड़का देख रहे हैं।”
स्वाति के हाथ से प्लेट छूटते-छूटते बची। “अभी?”
“तो कब?” माँ की आवाज़ में चिंता थी, दबाव नहीं।
स्वाति कुछ बोल नहीं पाई। उस रात उसने बहुत देर तक छत को देखा। आरव का चेहरा सामने आ गया। क्या वह इस सच को माँ-पापा को बता सकती थी?
नहीं।
उधर आरव भी अपने संघर्ष में था। उसके परिवार ने उसके लिए पहले ही रिश्ता तय कर रखा था।
“मैं भाग नहीं सकता,” उसने एक दिन स्वाति से कहा। “लेकिन मैं झूठ भी नहीं जी सकता।”
स्वाति ने महसूस किया—यह कहानी प्रेम की नहीं, परीक्षा की थी।
एक रात स्वाति को फिर सपना आया।
इस बार वह किसी पुराने गाँव में थी। मिट्टी के घर, दीपक की रोशनी। सामने वही आरव—लेकिन इस बार वह रो रहा था।
“वादा मत तोड़ना,” उसने कहा।
स्वाति की नींद टूट गई। आँखें भीगी हुई थीं।
उसी पल उसे एहसास हुआ—
यह रिश्ता उसे सब कुछ दे सकता है, और सब कुछ छीन भी सकता है।
उसने अगली सुबह निर्णय लिया—वह भागेगी नहीं। न भावनाओं से, न सच्चाई से।
उसने आरव को संदेश भेजा—
“जो भी हो, हमें सच का सामना करना होगा।”
आरव का जवाब आया—
“सच अक्सर त्याग माँगता है। तैयार हो?”
स्वाति ने आँखें बंद कीं।
हाँ… शायद अब वह तैयार हो रही थी।
क्योंकि प्रेम जब कर्म से टकराता है,
तो जन्म लेता है संघर्ष।
कुछ फैसले ऐसे होते हैं, जिनसे पहले इंसान बहुत कुछ सोचता है—और लेने के बाद कुछ भी नहीं सोच पाता। बस भीतर एक खालीपन रह जाता है, जो धीरे-धीरे दर्द में बदल जाता है। स्वाति के जीवन में भी वही दौर शुरू हो चुका था।
अध्याय तीन के बाद जैसे समय ने रफ़्तार पकड़ ली थी। घर में रिश्तों की बात अब सिर्फ़ इशारों में नहीं, खुलकर होने लगी थी। माँ की आँखों में चिंता थी, पिता की चुप्पी में अपेक्षा।
“लड़का अच्छा है,” माँ ने एक दिन कहा, “सरकारी नौकरी है, परिवार भी ठीक है।”
स्वाति ने सिर झुका लिया। वह ‘ना’ नहीं कह पा रही थी, और ‘हाँ’ कहने की ताक़त भी नहीं थी।
उस रात उसने आरव को फोन किया। आवाज़ काँप रही थी।
“माँ-पापा… रिश्ता तय करना चाहते हैं।”
फोन के उस पार कुछ पल की खामोशी थी। फिर आरव की धीमी आवाज़ आई, “तो अब क्या सोच रही हो?”
स्वाति ने आँखें बंद कर लीं। “कुछ समझ नहीं आ रहा।”
“शायद यही कसौटी है,” आरव ने कहा। “जहाँ आत्मा और संसार आमने-सामने खड़े हो जाते हैं।”
अगले दिन स्वाति उस मंदिर में अकेले गई, जहाँ उसने पहली बार उस पुराने जन्म की झलक देखी थी। मंदिर शांत था। न पुजारी, न भीड़। बस दीपक की लौ और अगरबत्ती की खुशबू। उसने आँखें बंद कीं। इस बार कोई दृश्य नहीं आया। न आरव, न पिछला जन्म। सिर्फ़ एक सवाल—
क्या प्रेम को चुनना स्वार्थ है?
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“अगर यह रिश्ता इतना पवित्र है,” उसने मन ही मन कहा, “तो इतना दर्द क्यों?”
जवाब में सिर्फ़ खामोशी थी। उधर आरव भी टूट रहा था। उसका रिश्ता लगभग तय हो चुका था। परिवार में खुशियाँ थीं, मिठाइयाँ बाँटी जा रही थीं।
“तू खुश नहीं लग रहा,” उसके बड़े भाई ने कहा।
आरव मुस्कराने की कोशिश करता रहा। “बस काम का दबाव है।”
लेकिन सच यह था—वह हर साँस के साथ स्वाति को खो रहा था। वे फिर मिले। इस बार बिना किसी योजना के। वही कैफ़े, वही कोना। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और समझ गए—आज कुछ टूटने वाला है।
“अगर हम अलग हो गए,” स्वाति ने धीरे से कहा, “तो क्या यह वादा फिर अधूरा रह जाएगा?”
आरव की आँखें नम हो गईं। “शायद… या शायद यही पूरा होना हो।”
स्वाति ने चौंककर उसकी ओर देखा।
“कभी-कभी,” आरव ने कहा, “कर्म पूरा करने के लिए मिलन नहीं, त्याग चाहिए।”
ये शब्द स्वाति के भीतर गहरे उतर गए।
उस रात स्वाति को सबसे स्पष्ट सपना आया।
वह उसी पुराने जन्म में थी। आरव सामने खड़ा था। चारों ओर आग, युद्ध और अफ़रा-तफ़री।
“इस बार मत रुकना,” उसने कहा। “इस बार हमें अलग होना होगा।”
“क्यों?” स्वाति चीखी।
“ताकि अगला जन्म मुक्त हो,” आरव ने कहा।
नींद टूट गई। स्वाति का पूरा शरीर काँप रहा था।
अगले दिन उसने माँ से कहा, “मैं इस रिश्ते के लिए तैयार हूँ।”
माँ की आँखों में राहत थी।
उसी दिन आरव ने भी अपने परिवार को ‘हाँ’ कह दी।
किसी ने नहीं देखा—उस ‘हाँ’ के पीछे कितना ख़ून बहा।
शादी की तारीख़ तय हो गई। दोनों की। अलग-अलग।
शहर वही था, समय वही—बस क़िस्मत की दिशाएँ बदल गई थीं।
स्वाति और आरव ने आख़िरी बार फोन पर बात की।
“शायद हम कमज़ोर थे,” स्वाति ने कहा।
“नहीं,” आरव ने जवाब दिया, “हम सबसे मज़बूत थे। क्योंकि हमने छोड़ना चुना।”
फोन कट गया।
स्वाति ने अपनी डायरी में आख़िरी पंक्ति लिखी:
“अगर प्रेम सच है, तो वह मुझे बाँधेगा नहीं—मुक्त करेगा।”
उसे नहीं पता था कि यह त्याग वास्तव में अंत है या किसी और अध्याय की शुरुआत।
लेकिन इतना तय था—
यह अध्याय प्रेम का नहीं, बलिदान का था।
शादी के बाद ज़िंदगी बदल जाती है—यह बात स्वाति ने सुनी थी, देखी थी, लेकिन अब वह उसे जी रही थी। बदलना हमेशा रंगीन नहीं होता। कभी-कभी वह सिर्फ़ भारी हो जाता है।
सुबह की रोशनी खिड़की से अंदर आ रही थी। कमरा सजा हुआ था—नई चादरें, दीवार पर टँगी तस्वीरें, अलमारी में करीने से रखे कपड़े। सब कुछ नया था। बस स्वाति के भीतर जो था, वह बहुत पुराना और बहुत थका हुआ था।
वह बिस्तर पर बैठी खिड़की के बाहर देख रही थी। सामने की सड़क पर लोग अपने-अपने काम में लगे थे। किसी के चेहरे पर चिंता थी, किसी पर जल्दी, किसी पर मुस्कान। ज़िंदगी चल रही थी।
लेकिन स्वाति को लग रहा था जैसे वह कहीं पीछे छूट गई है।
उसके पति—रोहित—तैयार होकर ऑफिस जाने की जल्दी में थे। अच्छे इंसान थे। शालीन, ज़िम्मेदार, समझदार। उनमें कोई कमी नहीं थी। और शायद यही सबसे बड़ी समस्या थी।
“मैं निकल रहा हूँ,” रोहित ने कहा।
“ठीक है,” स्वाति ने जवाब दिया।
बस इतना ही। न शिकायत, न सवाल।
दरवाज़ा बंद हुआ तो कमरे में एक अजीब-सी ख़ामोशी फैल गई। यह शांति नहीं थी। यह खालीपन था।
उधर आरव भी नई ज़िंदगी में क़दम रख चुका था। उसकी पत्नी—नैना—संवेदनशील थी, समझने वाली थी। उसने कभी ज़्यादा सवाल नहीं किए।
लेकिन आरव के भीतर जो तूफ़ान था, उसे वह कैसे समझ पाती?
ऑफिस में बैठा आरव फ़ाइलों को देख रहा था, लेकिन शब्द धुँधले हो रहे थे। कभी-कभी अचानक उसे लगता, जैसे कोई उसे पुकार रहा हो।
स्वाति।
वह नाम उसने कभी ज़ोर से नहीं लिया, लेकिन हर साँस में बसा था।
दिन बीतने लगे। महीने।
स्वाति ने अपनी नई ज़िम्मेदारियाँ सीख लीं। घर, रिश्ते, त्यौहार, मेहमान। वह सब कुछ ठीक से निभा रही थी। हर कोई कहता, “बहुत समझदार बहू है।”
वह मुस्करा देती।
लेकिन रात में, जब सब सो जाते, वह अपनी डायरी खोलती।
“मैंने सब कुछ पा लिया है,” वह लिखती, “फिर भी खुद को खो दिया है।”
कभी-कभी उसे ग़ुस्सा आता—आरव पर, खुद पर, उस वादे पर।
अगर छोड़ना ही था, तो मिलना क्यों हुआ?
आरव की हालत भी अलग नहीं थी। नैना उसके पास बैठकर बातें करती, भविष्य की योजनाएँ बनाती। वह सुनता, सिर हिलाता, लेकिन भीतर कहीं और होता।
एक रात नैना ने धीरे से पूछा, “क्या तुम खुश हो?”
आरव चुप रह गया।
वह झूठ नहीं बोल सकता था। सच भी नहीं कह सकता था।
“मैं कोशिश कर रहा हूँ,” उसने कहा।
नैना ने कुछ नहीं कहा, बस उसकी चुप्पी को समझने की कोशिश की।
समय के साथ स्वाति और आरव दोनों ने महसूस किया—त्याग का दर्द खत्म नहीं होता। वह बस रूप बदल लेता है।
एक दिन स्वाति को अचानक चक्कर आया। डॉक्टर ने कहा, “तनाव ज़्यादा है। अपने लिए समय निकालिए।”
अपने लिए?
ह शब्द उसे अजीब लगा।
उस रात उसे सपना आया।
वह किसी नदी के किनारे खड़ी थी। सामने आरव था। दोनों के बीच पानी बह रहा था—गहरा, तेज़।
“हम सही थे या ग़लत?” स्वाति ने पूछा।
आरव ने जवाब नहीं दिया। उसने बस नदी की ओर देखा।
नींद खुली तो तकिया गीला था।
इसी बीच, क़िस्मत ने एक और खेल खेला।
एक सामाजिक कार्यक्रम में—जहाँ दोनों परिवार आमंत्रित थे—स्वाति और आरव आमने-सामने आ गए।
कई महीनों बाद।
पहली नज़र में ही सब कुछ लौट आया—दर्द, अपनापन, मौन।
लोग हँस रहे थे, बातें कर रहे थे, लेकिन उनके लिए वह कमरा सिमट गया था।
“कैसी हो?” आरव ने औपचारिक स्वर में पूछा।
“ठीक हूँ,” स्वाति ने कहा।
दोनों जानते थे—यह ‘ठीक’ सच नहीं था।
कुछ पल बाद वे अलग-अलग दिशाओं में चले गए।
लेकिन उस एक मुलाक़ात ने सब कुछ फिर हिला दिया।
उस रात स्वाति बहुत रोई। यह रोना तेज़ नहीं था। यह भीतर का रोना था—खामोश, थकाने वाला।
उसने पहली बार स्वीकार किया—
त्याग करने से प्रेम मरता नहीं है।
आरव ने भी उस रात एक सच माना—
कर्म निभाया जा सकता है, लेकिन भावनाओं को मिटाया नहीं जा सकता।
दोनों की ज़िंदगियाँ चल रही थीं। लेकिन अब सवाल बदल चुका था।
पहले सवाल था—मिलना सही है या नहीं?
अब सवाल था—इस अकेलेपन के साथ कैसे जिया जाए?
क्योंकि वे साथ नहीं थे,
और फिर भी
कभी अलग भी नहीं हो पाए थे।
कुछ पीड़ाएँ ऐसी होती हैं जो इंसान को तोड़ती नहीं, बल्कि उसे भीतर से बदल देती हैं। वे शोर नहीं करतीं, लेकिन आत्मा के दरवाज़े खटखटाती रहती हैं—जब तक कोई जाग न जाए। स्वाति और आरव अब उसी मोड़ पर थे, जहाँ दर्द से भागना संभव नहीं था।
शादी के बाद बीते महीनों ने स्वाति को बाहर से शांत और भीतर से रिक्त बना दिया था। वह सब कुछ कर रही थी—घर संभालना, रिश्ते निभाना, मुस्कुराना—लेकिन यह सब जैसे किसी और की ज़िंदगी थी। कई बार आईने में खुद को देखती तो लगता, यह चेहरा उसका है, पर आँखों की चमक कहीं खो गई है।
एक सुबह वह रसोई में काम कर रही थी, तभी अचानक हाथ काँपने लगे। कटोरी गिरकर टूट गई। आवाज़ सुनकर रोहित दौड़कर आया।
“क्या हुआ? ठीक हो?”
स्वाति ने सिर हिलाया। “पता नहीं… बस चक्कर आ रहा है।”
रोहित उसे डॉक्टर के पास ले गया। जाँच के बाद डॉक्टर ने कहा, “शारीरिक रूप से सब ठीक है। लेकिन मानसिक तनाव बहुत ज़्यादा है। अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया, तो यह डिप्रेशन में बदल सकता है।”
डिप्रेशन।
यह शब्द स्वाति के लिए नया नहीं था, लेकिन अब वह उससे जुड़ गया था।
उस रात वह देर तक जागती रही। पहली बार उसने खुद से एक ईमानदार सवाल किया—
क्या मैं सच में जी रही हूँ, या सिर्फ़ निभा रही हूँ?
उधर आरव भी एक अजीब-सी बेचैनी से गुजर रहा था। नैना उसके लिए सब कुछ करने की कोशिश करती—प्यार, समझ, धैर्य—लेकिन आरव जानता था कि उसकी खामोशी उसे चोट पहुँचा रही है।
एक रात नैना ने साफ़ कहा, “मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, आरव। अगर तुम्हारे भीतर कुछ है जो तुम्हें खा रहा है, तो मुझे जानने का हक़ है।”
आरव देर तक चुप रहा। फिर बोला, “अगर मैं सच बोल दूँ, तो क्या तुम मुझे माफ़ कर पाओगी?”
नैना की आँखें भर आईं। “सच हमेशा माफ़ी से ज़्यादा ज़रूरी होता है।”
आरव ने उस रात सब कुछ नहीं बताया, लेकिन इतना ज़रूर कहा—“मेरे भीतर एक अधूरा अध्याय है, जो इस जन्म का नहीं है।”
नैना कुछ नहीं बोली। लेकिन उस पल उसने समझ लिया—यह लड़ाई किसी तीसरे इंसान से नहीं, किसी और ही स्तर पर है। कुछ ही दिनों बाद स्वाति की हालत और बिगड़ने लगी। उसे बार-बार वही सपना आने लगा—नदी, आग, युद्ध, और एक आवाज़:
“अब समझने का समय आ गया है।”
एक रात वह नींद में बड़बड़ाने लगी। रोहित घबरा गया। उसने उसकी माँ को फोन किया।
अगले दिन स्वाति को उसके मायके ले जाया गया। माँ ने बेटी को देखकर तुरंत पहचान लिया—यह साधारण थकान नहीं थी।
“तू अंदर से बहुत थक गई है,” माँ ने उसका सिर सहलाते हुए कहा।
उस दिन पहली बार स्वाति रोई—बिल्कुल खुलकर। उसने सब कुछ नहीं बताया, लेकिन इतना कह दिया—“मैं खुद को नहीं समझ पा रही हूँ।”
माँ ने एक निर्णय लिया। “हम एक जगह चलेंगे।”
“कहाँ?” स्वाति ने पूछा।
“एक साधक हैं,” माँ ने कहा। “कभी-कभी जवाब दवाइयों में नहीं, मौन में मिलते हैं।”
स्वाति ने विरोध नहीं किया। अब उसके पास खोने को कुछ नहीं था।
उसी समय, अजीब संयोग से, आरव भी उसी शहर में आया हुआ था—काम के सिलसिले में। रात को उसे एक संदेश मिला, एक अनजान नंबर से:
“यदि आत्मा बेचैन है, तो सत्य से मिलना होगा। कल प्रातः आश्रम आइए।”
आरव हैरान हुआ। लेकिन भीतर से कोई उसे वहाँ जाने के लिए खींच रहा था।
अगली सुबह आश्रम में गहरी शांति थी। पेड़ों की छाया, पक्षियों की आवाज़, और हवा में ठहराव।
स्वाति अपनी माँ के साथ पहुँची। आरव अकेला।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा—आश्चर्य नहीं, बल्कि स्वीकार। जैसे आत्माएँ पहले से जानती थीं कि यहाँ मिलना तय है।
साधक ने दोनों को ध्यान में बैठाया।
“आँखें बंद करो,” उनकी आवाज़ गहरी थी। “और जो दिखे, उससे मत डरो।”
ध्यान के दौरान स्वाति ने खुद को किसी और जीवन में पाया। वह एक युवती थी—स्वतंत्र, साहसी। आरव वहाँ एक योद्धा था। दोनों एक ही उद्देश्य के लिए लड़ रहे थे। लेकिन उस जीवन में उन्होंने प्रेम को पूरा नहीं किया—उन्होंने उसे त्याग दिया था, किसी बड़े उद्देश्य के लिए।
आरव भी वही दृश्य देख रहा था।
साधक की आवाज़ गूँजी—“जो अधूरा था, वह प्रेम नहीं था। वह निर्णय था। और वह निर्णय इस जन्म में समझने आया है।”
स्वाति की आँखों से आँसू बहने लगे।
“तो हमें क्या करना होगा?” उसने पूछा।
“स्वीकार,” साधक ने कहा। “न मिलन, न विरह—सिर्फ़ स्वीकार।”
ध्यान के बाद दोनों बहुत देर तक चुप बैठे रहे।
“अब समझ आया,” आरव ने धीरे से कहा। “हम एक-दूसरे के लिए नहीं, एक-दूसरे के ज़रिए आए थे।”
स्वाति ने सिर हिलाया। “शायद हमें मुक्त होना था।”
यह पहला पल था जब दर्द कम लगा।
आश्रम से लौटते समय कोई वादा नहीं हुआ। कोई साथ रहने की बात नहीं।
बस एक शांति थी—कठिन, लेकिन सच्ची।
स्वाति ने रोहित को सब कुछ नहीं बताया, लेकिन उसके व्यवहार में बदलाव आने लगा। वह अब निभा नहीं रही थी—वह धीरे-धीरे जीने की कोशिश कर रही थी।
आरव ने भी नैना से कहा, “मैं तुम्हारे साथ ईमानदार रहूँगा—पूरे मन से।”
कुछ रिश्ते मिलन से नहीं, समझ से पूरे होते हैं।
और कुछ प्रेम—
छोड़ देने पर ही पूर्ण होते हैं।
आश्रम से लौटने के बाद भी स्वाति के भीतर शांति पूरी तरह स्थिर नहीं हुई थी। यह ऐसी शांति थी, जिसमें प्रश्न अभी भी साँस ले रहे थे, लेकिन अब वे उसे डराते नहीं थे। वे बस याद दिलाते थे कि वह जीवित है।
मायके में रहते हुए उसने कई सुबहें बिना किसी योजना के बिताईं। कभी छत पर बैठकर उगते सूरज को देखती, कभी पुराने एल्बम पलटती। हर तस्वीर में वह खुद को पहचानती—लेकिन साथ ही यह भी देख पाती कि कब उसकी मुस्कान सच थी और कब निभाई हुई।
एक दिन माँ ने पूछा, “अब कैसा लग रहा है?”
स्वाति ने सोचा, फिर बोली, “दुख है… लेकिन साफ़ है। पहले धुंध था।”
माँ ने कुछ नहीं कहा, बस उसका हाथ थाम लिया। कभी-कभी समझ शब्दों से नहीं, साथ से मिलती है।
उधर आरव के लिए भी हालात बदल रहे थे। आश्रम से लौटने के बाद उसने पहली बार अपने भीतर की बेचैनी को दबाने की कोशिश नहीं की। वह देर रात तक जागता, लिखता, ध्यान करता। उसने अपने शोध के नोट्स फिर से खोले—अब दर्शन उसके लिए विषय नहीं, अनुभव बन चुका था।
नैना यह बदलाव महसूस कर रही थी। आरव अब पहले से ज़्यादा मौजूद था—शांत, लेकिन सच्चा।
एक शाम नैना ने कहा, “तुम बदले हुए लग रहे हो।”
आरव ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “शायद पहली बार खुद के क़रीब आया हूँ।”
नैना ने कुछ नहीं पूछा। उस मौन में भी भरोसा था।
कुछ हफ्तों बाद स्वाति अपने ससुराल लौटी। रोहित ने उसे ध्यान से देखा।
“अब बेहतर लग रही हो,” उसने कहा।
स्वाति ने सिर हिलाया। “मैं कोशिश कर रही हूँ—छुपने की नहीं।”'
रोहित ने उस वाक्य का अर्थ पूरी तरह नहीं समझा, लेकिन उसने महसूस किया—यह स्त्री अब टूटने के कगार पर नहीं है।
धीरे-धीरे स्वाति ने अपने भीतर की आवाज़ को जगह देना शुरू किया। उसने लिखना शुरू किया—अपने लिए। बिना यह सोचे कि कोई पढ़ेगा या नहीं।
उसकी डायरी अब दर्द का बोझ नहीं थी, बल्कि संवाद बन चुकी थी।
एक रात उसे फिर सपना आया। लेकिन इस बार न युद्ध था, न आग।
वह और आरव एक खुले मैदान में खड़े थे। दोनों शांत।
“अब जाना होगा,” आरव ने कहा।
स्वाति ने मुस्कराकर सिर हिलाया। इस बार आँसू नहीं थे।
नींद खुली तो दिल हल्का था।उसने उसी दिन आख़िरी बार आरव को संदेश भेजा:
“अब समझ में आया—तुम मेरे जीवन का उत्तर नहीं थे, तुम प्रश्न थे…
जिसने मुझे खुद तक पहुँचाया।”
कुछ देर बाद उत्तर आया—
“और तुम वह मौन थीं, जिसमें मुझे सच सुनाई दिया।”
इसके बाद कोई संदेश नहीं आया। और इस बार—यह खालीपन नहीं था।
स्वाति ने महसूस किया—मुक्ति का मतलब भूल जाना नहीं होता।
मुक्ति का मतलब होता है—याद के साथ जी पाना।
यही जागरण था।
यही सत्य।
कुछ अंत ऐसे होते हैं जो शोर नहीं करते। न आँसू माँगते हैं, न वादे। वे बस धीरे से भीतर बैठ जाते हैं— और जीवन को पहले से थोड़ा हल्का कर देते हैं। स्वाति अब यह समझ चुकी थी। आश्रम से लौटे हुए लगभग एक वर्ष हो चुका था। इस एक साल में बाहरी दुनिया बहुत नहीं बदली थी—वही घर, वही लोग, वही ज़िम्मेदारियाँ। लेकिन भीतर…
भीतर सब कुछ नया था। अब वह सुबह उठते ही अपने मन से लड़ती नहीं थी। उदासी आती, तो वह उसे आने देती। खुशी आती, तो उसे पकड़कर रखने की कोशिश नहीं करती। उसे समझ में आ गया था—
भावनाएँ मौसम की तरह होती हैं। कोई भी मौसम स्थायी नहीं होता। स्वातिने लिखना जारी रखा था। इस बार लिखना इलाज नहीं था—
यह अभिव्यक्ति थी। वह अपने दर्द को सुंदर बनाकर नहीं लिखती थी। वह सच लिखती थी।
उसकी कहानियों में प्रेम था, लेकिन वह प्रेम पाने की ज़िद नहीं करता था। वह प्रेम जो बदल देता है, और चुपचाप चला जाता है।
रोहित यह सब देख रहा था। उसके और स्वाति के रिश्ते में अचानक कोई परीकथा नहीं आई थी। लेकिन एक नई ईमानदारी जन्म ले चुकी थी। एक शाम चाय पीते हुए स्वाति ने कहा,
“मैं लंबे समय तक किसी और जगह अटकी रही… शरीर यहाँ था, मन नहीं।”
रोहित ने पहली बार कोई शिकायत नहीं की। वह बस बोला,
“और अब?”
स्वाति ने गहरी साँस ली।
“अब मैं यहीं हूँ।”
रोहित ने सिर हिलाया। कभी-कभी किसी रिश्ते को बचाने के लिए प्रेम नहीं, सच चाहिए होता है। उधर आरव भी बदल चुका था। अब वह अतीत को मिटाने की कोशिश नहीं करता था। वह उसे समझ चुका था। उसने दर्शन पर लिखना शुरू किया था—
लेकिन किताबों की भाषा में नहीं। वह जीवन की भाषा में लिखता था। नैना उसके साथ थी।
वह जानती थी कि आरव के भीतर जो युद्ध था, वह अब समाप्त हो चुका है। एक दिन नैना ने पूछा,
“क्या तुम्हें लगता है कि वह रिश्ता व्यर्थ था?”
आरव ने मुस्कुराकर कहा,
“नहीं। अगर वह न होता, तो मैं खुद से कभी न मिलता।”
नैना ने कुछ नहीं कहा। कुछ उत्तर शब्दों से बड़े होते हैं। कई महीनों बाद स्वाति को एक साहित्यिक मंच पर बुलाया गया। उसकी कहानी—जो प्रेम की नहीं, मुक्ति की थी—लोगों को छू रही थी।
मंच पर खड़ी स्वाति काँप नहीं रही थी। वह भाग नहीं रही थी। उसने पढ़ा:
“कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में इसलिए नहीं आते कि वे हमारे साथ रहें,
बल्कि इसलिए आते हैं ताकि हम खुद के साथ रहना सीख सकें।”
सभागार में सन्नाटा था। वह सन्नाटा खाली नहीं था— वह भरा हुआ था।
कार्यक्रम के बाद किसी ने पूछा,
“क्या यह आपकी निजी कहानी है?”
स्वाति मुस्कुराई।
“यह मेरी यात्रा है। और शायद आपकी भी।”
उसी सभागार के पीछे की पंक्ति में आरव बैठा था। वह उसे पहचान गया।
और स्वाति भी। न कोई हैरानी। न कोई घबराहट। उनकी नज़रें मिलीं— और वहीं रुक गईं। आरव ने सिर झुकाया। सम्मान में। स्वीकृति में। स्वाति ने भी। न कोई बात हुई। न कोई शिकायत। न कोई सवाल। और यही सबसे सुंदर उत्तर था। घर लौटकर स्वाति ने खिड़की खोली। रात की हवा अंदर आई। उसने आँखें बंद कीं और उस लड़की को याद किया जो कभी किसी एक नाम में अपनी पूरी पहचान खोजती थी। अब वह लड़की बड़ी हो चुकी थी। उसने मन ही मन कहा—
“धन्यवाद।”
किसे? यह ज़रूरी नहीं था। समय आगे बढ़ता गया। कुछ रिश्ते साथ रहे,
कुछ छूट गए। लेकिन अब कोई खालीपन नहीं था। क्योंकि स्वाति जान चुकी थी—
प्रेम का सबसे ऊँचा रूप किसी को पकड़ना नहीं, मुक्त करना होता है। और कभी-कभी…खुद को। कहानी यहीं समाप्त होती है। लेकिन जीवन नहीं। क्योंकि जो समझ मिल जाती है,
वह अंत नहीं होती— वह शुरुआत होती है। और प्रेम… वह हमेशा किसी को पाने का नाम नहीं होता। कभी-कभी वह खुद तक पहुँचने का रास्ता होता है