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बचपन से मैंने लोगों को यह कहते सुना था कि घर से दूर जाकर हॉस्टल में रहना जितना कठिन होता है, उससे कहीं अधिक कठिन होता है हॉस्टल के मेस का खाना खाना। लोग बड़े विश्वास से बताते थे कि वहाँ की दाल में दाल ढूँढ़नी पड़ती है। कटोरे में हल्दी और मिर्च का पानी तैरता रहता है और स्वाद के नाम पर थोड़ा सा नमक डाल दिया जाता है, ताकि छात्र अपनी कल्पना के सहारे उसे दाल मानकर खा सकें।

मैंने भी ऐसी बातें बहुत सुनी थीं, पर कभी अनुभव नहीं किया था। मैं पहली बार घर से दूर पढ़ने निकली थी। संयोग से मेरा प्रवेश एक ऐसे संस्थान में हुआ, जहाँ पढ़ने का सपना न जाने कितने माता-पिता और बच्चों की आँखों में पलता है। जी हाँ, मैं IIT की बात कर रही हूँ। मेरा प्रवेश IIT Hyderabad में हुआ था।

घर से निकलने से पहले मैं बड़े विश्वास से सबको कहा करती थी, "IIT है, वहाँ का खाना भी अच्छा ही होगा। रोज़ कुछ नया मिलता होगा।"

आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है कि किसी जगह को देखे बिना उसके बारे में बहुत ऊँची कल्पनाएँ नहीं बाँधनी चाहिए। क्योंकि जब वास्तविकता सामने आती है, तब सबसे पहले अपनी ही बातें कुछ अधिक लगने लगती हैं।

खैर, यह कहानी किसी शिकायत की नहीं, बल्कि मेरे और मेस के खाने के बीच बने एक अनोखे रिश्ते की है।

IIT आए मुझे एक वर्ष हो चुका है। इतने दिनों में मैंने खाने को लेकर अलग-अलग तरह के लोगों से मुलाकात की। कुछ ऐसे थे जो पहले ऐसे हॉस्टलों में रह चुके थे जहाँ का खाना सचमुच बहुत खराब था। वे लोग हमारे मेस की तारीफ करते नहीं थकते थे। उनके लिए यह भोजन किसी वरदान से कम नहीं था।

दूसरे वे लोग थे जो सीधे अपने घरों से आए थे। वे मेस के खाने को न बहुत अच्छा कहते थे, न बहुत बुरा। उनके लिए वह बस "ठीक-ठाक" था।

लेकिन मुझे अपने जैसा कोई नहीं मिला।
मैं उन लोगों में थी जो मेस के लगभग हर खाने की तारीफ कर सकते थे, सिवाय एक चीज़ के रोटी।

अब आप सोच रहे होंगे कि यह कैसी लड़की है। जहाँ लोग पूरे खाने को कोसते हैं, वहाँ इसे सिर्फ रोटी से शिकायत है।

दरअसल, मैं राजस्थान से हूँ।

राजस्थान में रोटी केवल भोजन नहीं होती, जीवन का हिस्सा होती है। हमारे यहाँ चावल पर निर्भरता वैसी नहीं है जैसी देश के कई अन्य हिस्सों में देखने को मिलती है। इसका एक कारण यह भी है कि राजस्थान के अधिकांश क्षेत्रों में चावल की खेती परंपरागत रूप से नहीं होती। इसलिए बचपन से हमारे भोजन का आधार रोटियाँ ही रही हैं।

चावल घरों में बनते तो हैं, पर रोज़मर्रा के भोजन का मुख्य हिस्सा नहीं होते। कई बार वे त्योहारों, विशेष अवसरों या मन होने पर ही बनते हैं। मुझे आज भी मीठे चावल याद हैं, जिनमें चीनी डालकर खाए जाते थे।

इसलिए जब मैं मेस पहुँची तो मेरा भरोसा चावलों पर नहीं, रोटियों पर था। मैंने सोचा था कि चाहे कुछ भी हो, रोटी तो मेरा साथ निभाएगी।

लेकिन रोटी के भी अपने इरादे थे।
राजस्थान के लोगों के बारे में एक बात अक्सर कही जाती है कि उन्हें घी से विशेष प्रेम होता है। मैं भी उन्हीं में से एक हूँ। मैं ऐसे घर से आई हूँ जहाँ बिना घी की रोटी खाने की कल्पना भी नहीं की जाती।

मेस में पहली बार जब बिना घी की रोटी मिली, तब मेरे भीतर का राजस्थानी मन कुछ क्षणों के लिए मौन हो गया। फिर मैंने खुद को समझाया कि चलो, घी नहीं है तो भी खा लेंगे।

लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई।
कुछ समय बाद मुझे नए मेस में जाना पड़ा। वहाँ जाकर पता चला कि रोटियों में नमक भी नहीं होता।

पहले दिन जब मैंने वह रोटी खाई, तब मेरे भीतर का इंसान सचमुच रो पड़ा।
मैं सोच रही थी, "यार, एक ही चीज़ तो खाती हूँ। उसे भी इतना फीका क्यों बना दिया?"
मैंने यह बात अपने दोस्तों से कही। तब मुझे जीवन का एक नया सत्य पता चला।

उत्तर प्रदेश से आए मेरे कुछ मित्रों ने बिल्कुल सामान्य भाव से कहा, "रोटी में नमक कौन डालता है?"

उस क्षण मैं स्तब्ध थी।
मेरे मन में केवल एक ही प्रश्न था, "बिना नमक की रोटी कौन खाता है?"

उस दिन मुझे सचमुच एहसास हुआ कि भारत विविधताओं का देश क्यों कहलाता है। जिस बात को मैं बिल्कुल स्वाभाविक मानती थी, वही किसी दूसरे के लिए असामान्य थी।

फिर क्या था। मैंने पूरे एक महीने तक बिना नमक और बिना घी की रोटियाँ खाईं। पहले-पहल हर निवाले के साथ घर याद आता था, लेकिन धीरे-धीरे आदत पड़ गई।

आखिर इंसान परिस्थितियों से लड़ते-लड़ते उनसे दोस्ती करना सीख ही लेता है।
अब आते हैं मेरी दूसरी पीड़ा पर।
चाय।

राजस्थान में चाय केवल एक पेय नहीं होती, कई लोगों के लिए भावनात्मक सहारा होती है। मैं भी उन्हीं लोगों में से हूँ।

जिस दिन मैंने मेस की चाय पहली बार पी, उसी दिन मैंने तय कर लिया कि अगली बार चाय लेने से पहले गिलास में चीनी डालूँगी।

कारण आप समझ ही गए होंगे।
कुछ दिनों तक मैंने अपने दोस्तों के साथ बैठकर मेस की चाय की आलोचना की। फिर एक दिन मन में विचार आया कि शायद दक्षिण भारत के लोगों की चाय का स्वाद अलग होता होगा। यह सोचकर मैंने स्वयं को समझा लिया।

धीरे-धीरे मैंने उस चाय से भी समझौता कर लिया।
सच कहूँ तो मुझे मेस के खाने से कोई विशेष शिकायत नहीं है। दाल अच्छी लगती है, सब्जियाँ भी ठीक लगती हैं, कई बार तो खाना अपेक्षा से बेहतर भी होता है।

मेरी शिकायत बस दो चीज़ों से रही है।
एक, बिना घी और बिना नमक की रोटियाँ।
दूसरी, मेरी पसंद से कम मीठी चाय।

अब मैं आज तक यह तय नहीं कर पाई हूँ कि मैं किस श्रेणी में आती हूँ। उन लोगों में जो मेस के खाने को बुरा बताते हैं, या उन लोगों में जो उसकी तारीफ करते हैं।

शायद मैं दोनों में से किसी में नहीं आती।
शायद मैं उन लोगों में हूँ जो घर का स्वाद अपने साथ लेकर आते हैं और फिर धीरे-धीरे एक नए स्वाद के साथ जीना सीख लेते हैं।

और फिर, मैं गणित की विद्यार्थी भी तो हूँ।
गणित ने मुझे एक बात सिखाई है कि कई बार किसी प्रश्न को हल करने के लिए कुछ मान लेना पड़ता है। जब रोटियों में मुझे घी और नमक नहीं मिला, तो मैंने मान लिया कि वे वहाँ हैं। जब चाय में मेरी पसंद भर चीनी और स्वाद नहीं मिला, तो उसे भी मैंने अपनी कल्पना में जोड़ लिया।

आखिर गणित में भी तो हम कई बार कुछ मानकर चलते हैं और फिर पूरा प्रश्न हल कर लेते हैं।

तो मैंने भी मान लिया कि रोटी में नमक और घी है, चाय में भरपूर चीनी है और स्वाद भी वैसा ही है जैसा मुझे पसंद है।

अब यह मत पूछिए कि मेरा यह मानना कितना सही है।
मैं बस इतना जानती हूँ कि इस मान्यता के सहारे मेरा एक साल आराम से निकल गया।
तो यह थी मेरे IIT Hyderabad के मेस की कथा।

न किसी बड़ी शिकायत की कहानी।
न किसी बड़ी प्रशंसा की।

बस एक राजस्थानी लड़की, नमक की रोटियाँ, फीकी चाय, थोड़ा सा गणित और घर से दूर रहने की छोटी-छोटी सीखों की कहानी।

और शायद यही छात्रावास जीवन की सबसे बड़ी खूबसूरती भी है। हम घर से अपने स्वाद, अपनी आदतें और अपनी जिदें लेकर निकलते हैं, लेकिन लौटते समय अपने साथ पूरे भारत के कुछ नए स्वाद, कुछ नई आदतें और कुछ नई कहानियाँ भी ले जाते हैं।

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