Source: Swagoto Mondal on Pexels.com धरा के माथे पर चिंता की रेखाएँ गहरी हैं, बाज़ारों की धड़कन अब स्थिर नहीं, बहरी है। सोने के भाव में डर की झिलमिल छाया है, रोटी की कीमत ने जीवन को झुकाया है।
महलों में बैठी दुनिया लाभ गिनती रहती है,
गलियों में भूख चुपचाप आँसू सहती है।
कागज़ की संपत्ति आसमान छू आती है,
मज़दूर की मेहनत फिर भी मिट्टी कहलाती है।
डॉलर की चाल में सत्ता का संगीत है,
पर गाँव की थाली में अब भी अनीति है।
ऋण के जाल में राष्ट्र उलझते जाते हैं,
विकास के वादे बस शब्द बन रह जाते हैं।
शेयरों की चढ़ती सीढ़ी पर खुशियाँ बिकती हैं,
पर खेतों की पगडंडी पर आशाएँ सिसकती हैं।
किसान के सपनों पर मौसम का पहरा है,
शहर के शोर में उसका दर्द ही ठहरा है।
सच यह है—
धन कुछ हाथों में सिमटता जाता है,
और समय गरीबों को और गरीब बनाता है।
नीति की किताबों में न्याय सजाया जाता है,
पर जीवन की सड़कों पर सच दबाया जाता है।
फिर भी—
उम्मीद की किरण कहीं बुझी नहीं है,
मानवता की लौ अभी थमी नहीं है।
जब हाथ से हाथ मिलेंगे, दीवारें गिरेंगी,
तभी इस अर्थव्यवस्था की जंजीरें टूटेंगी।
क्योंकि अंत में—
न बाज़ार, न मुद्रा, न सत्ता का अभिमान रहेगा,
सिर्फ इंसान का इंसान से पहचान रहेगा।
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