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सारे जहाँ में ढूँढ़ा उसको,
पाया है खुद के ही सर पे,
देखो कैसे पड़ा हुआ है,
दरवाजे पे बाहर घर के,
आँखें गीली करे सन्देसा,
फरियादी सा खड़ा है दर पे,
बोला मुझसे गिड़गिड़या के,
मेरे हाथ और पैर पकड़ के,
क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ,
पढ़ा लिखा सा लगता हूँ...
6-6 दिन का सफर काट के,
रातों में जगता था सारी,
2-2 बार पकड़ लेते थे,
सारे-सारे, बारी-बारी,
सब से सब सुख-दुख कहता था,
याद दिलाता नातेदारी,
अब सब मुझको भूल गए हैं,
घुसे फोन में झूल गए हैं,
सब की किस्मत हो गई चौड़ी,
मेरी फूट गई बेचारी,
मेरे हाथ में है लाचारी,
घड़ी ने कैसी पलटी मारी,
मैं बदहाल पड़ा मुश्किल में,
क्या तुमको बतला सकता हूँ,
क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ,
पढ़ा लिखा सा लगता हूँ...
जेबों में रहता था सबकी,
चलता सबकी बातों में,
तकिये के नीचे रहता था,
सोता सबके साथों में,
चूम-चूम लेते थे सारे,
पकड़ के अपने हाथों में,
और अब रंगत उल्टी उड़ गई,
ज़ंग लग गई दाँतों में,
बड़ी जलालत महसूसी जब,
खत ने हाल बताया है,
हम भी भूल चुके थे लेकिन,
अब पानी भर आया है,
ऐसा फंस गया दिवास्वप्न में,
होश मुझे तब आया है,
जब भाई मेरा चिल्लाया है,
मेरे घर खत आया है,
मेरे घर खत आया है,
मेरे घर खत आया है...
आँखें मिच गईं घरवालों की,
जब खत ने एक बात बताई,
लड़के की सरकारी लग गई,
अब तो कर दो मूँ मिठलाई,
मेरी आँख के आँसू मर गए,
हाय दुहाई राम दुहाई,
छोटे ने पूछा अम्मा से,
अम्मा जा कैसी चतुराई,
जो मीठा सन्देसा लाया,
उसकी किस्मत क्यों मिरचाई,
तब मैं खत से बोला भइया,
पार करा दूँ बनूँ खिवईया,
दिल्ली तक संगत है मेरी,
क्या कोई काम मैं आ सकता हूँ,
खत बोला मैं प्यार का भूखा,
क्या मैं खाना खा सकता हूँ,
क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ,
पढ़ा लिखा सा लगता हूँ...