हमने कभी प्यार सोचा नहीं था,
अचानक हुआ, अब किया भी क्या जाए,
मेरी ख़ुशबुओं में तबाह हो गया वो,
ज़माने के पत्थर भी सीने पे खाए,
ज़ख़्म भर न पाएं, वो फिर खुल-खुल जाएं,
दवा के हकीम-ओ-नफीसा बुलाए,
मैं बेआबरू, उसकी इज़्ज़त लुटी है,
तड़पन के कीड़े बड़े बिलबिलाए,
दम साध रखी है जीने के खातिर,
ये बैरी इश्क़ अब मज़हब बन गए हैं,
मैं रो रही हूँ,
वो रो रहा है,
रोना हमारे सबब बन गए हैं!
मन्दिर का हर आसरा है ख़त्म सा,
मसीतों से सबने है बाहर निकाला,
हमें मिल रही बेमुरुव्वत की रोटी,
मुश्किल में है उसका हर इक निवाला,
खिड़की से जब-जब दिखे हाल उसका,
सब उस पे हँसते, मेरे मुँह पे ताला,
क्या ख़ूब अंतर है, सबने उछाला,
मेरी जात गोरी, वो है रंग काला,
मेरी जात गोरी, वो है रंग काला,
सब लोग आ-आ के थूकर रहे हैं,
घावों में सुइयों से खूँकर रहे हैं,
है आँखों में चोटें, नशा हो रहा है,
ज़ख़्म सब शराब-ओ-शरब बन गए हैं,
मैं रो रही हूँ,
वो रो रहा है,
रोना हमारे सबब बन गए हैं!
मेरी शक्ल ख़त बन गई उसके खातिर,
आसमान उसकी नई छत बनी है,
महल्ले की नाली में मुँह धो रहा है,
लगता है जैसे कि पनघट बनी है,
कुत्ते सब अगल-ओ-बगल ही खड़े हैं,
क्या ख़ूब राजे की ख़िदमत बनी है,
जा सकता है वो अगर चाहे वापस,
मगर कैसे मेरी महक लत बनी है,
मेरी कदर उसकी अस्मत बनी है,
क्या ख़ूब बन्दे की दरुगत बनी है,
वाह-वाह लबालब मज़ा आ रहा है,
ज़माने, तू दिखला दे और ज़ुल्म कर के,
हारेंगे ना, लड़ के हारेंगे मर के,
हर इक नज़र उसका खूँ दिख रहा है,
देखो मेरा दूल्हा है आया सँवर के,
नज़र न लगे मेरे हमदम को मेरी,
अब और भी लाजवाब बन गए हैं,
मैं रो रही हूँ,
वो रो रहा है,
रोना हमारे सबब बन गए हैं!