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मैंने तुम में निज-बल भरकर,
बल प्रयोग सिखलाया,
पय-धर-रस तुमने न जाना,
निज-स्व छीर पिलाया,
त्यागे जो सुख, तजी जो सुविधा,
तुमको न बतलाया,
शिल्प अनंत तक किया था तुममें,
मानव को महा बनाया,

अ-संचालित, मैं पत्थर-सा,
निश्चल, आज पुरातन,
जैसा भी हूँ, जो हो जाऊँ,
करना न संवेदन,
हाल भयावह मेरा होगा,
कठिन अनागत जीवन,
वृद्ध, करालकाय, आजारी, 
व्याधित, अचल, अचेतन,

या मृत हो जाऊँ मैं लेकिन तुम,
किंचित मत घबराना,
मुझसे मिलने मत आना,
मुझसे मिलने मत आना...

मैं भयभीत रहूँ भय में,
भय से, भयशालाओं से,
या श्रृंगार रचे मेरा,
सर्पों की मालाओं से,
विष संचालन भले चले,
अति-नील बने, हर शिरा गले,
मेरी अध-मृत देह जले,
ज्वर से या ज्वालाओं से,

आह-कराहें चलें निरंतर,
अंतिम श्वासें घड़ी-घड़ी,
और गिद्धों की आँखें मेरा,
अंत समय हों तके खड़ी,
कीड़े काटें-खाएँ, संहारें,
काया कर दूर-काया डारें,
या कौवों की काल कतारें,
नोचें-चोंचें बड़ी-बड़ी,

नृत्य देखना मेरी मृत्यु का,
मन मंद-मंद मुस्काना,
मुझसे मिलने मत आना,
मुझसे मिलने मत आना...

जलता हूंगा मैं प्रकोप में,
सामाजिक दावानल में,
बलहीनों-सा बल के लोप में,
बलवानों की अनल में,
अस्मत खिंचती रहे अबल की,
तड़पूँ कूप गरल में,
जल-जल जाए, लपट कंठ में,
उबलूँ हालाहल में,

शक्ति का अस्तित्व न बचे,
मिल जाऊँ धरा के तल में,
या बेधारी कुल्हाड़ियों से,
मुझको काटा जाए,
धर्म की ओट में मेरे धड़ को,
मांस को बाँटा जाए,
या मेरी बलि, मेरे रक्त से,
सिद्धि को डाटा जाए,
कपित व्यथा में, ज्वलित चिता में,
रुंधे श्वास, डूबते जल में,

शर्म जो आए, मत शर्माना,
भले भीतर से पछताना,
पर मुझसे मिलने मत आना,
मुझसे मिलने मत आना...

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