जटायू
नागिनों का नाथ मैं,
चण्डाल कर्कश-भाष मैं,
चल तेरी गर्दन में कस दूँ,
आज निज-नख-पाश मैं,
चल मैं तेरा रथ बनाऊँ,
दस जुए, दस नथ चढ़ाऊँ,
वेगिनी तुझको नचाऊँ,
कर दूँ सत्यनाश मैं,

आ तुरंगिन वश में कर लूँ,
तेरी हर प्रश्वास में,
देख जलदर्पण में खुदको,
कितना तू नादान है,
तू महा-धूरत, महा-
-मूरख, महा-अज्ञान है,
आज संकट में नहीं, 
कुल-ख़त्म तेरे प्राण हैं...

रावण
प्राण निश्चित कर सुनिश्चित,
उड़ न तू आवेश में,
फूल न इतना अजारी,
आ न मद में, द्वेष में,
वृद्ध काया है तेरी, तू,
दर्प के परिवेश में,
दम्भ-हठ में, आत्म-मद में,
स्व के मिथ्या-आदेश में,

गज-मदों में चूर चूहे,
मत उलझ लंकेश में,
छुद्र वाणी, छुद्र प्राणी,
छुद्रता में निम्नतर,
क्रोध से बच, तू पतंगा,
क्षुद्र से भी क्षुद्रतर,
राह से हट जा परे चल,
छोड़ दे मेरी डगर...

जटायू
रुक ऐ लंका-लाल तुझको,
काल से मिलवाऊँगा,
चीथड़े पाताल से आ-
-काश तक फैलाऊँगा,
भ्रम को तू न पाल तुझको,
नोच कर खा जाऊँगा,
देख नख विकराल तुझको,
मैं सबक सिखलाऊँगा,

अस्थियाँ लीलूँ मैं भय का,
रंग तुझे दिखलाऊँगा,
चल दिखा सब छुद्र गुण,
तू कितना मायावान है,
तू महा-धूरत, महा-
-मूरख, महा-अज्ञान है,
आज संकट में नहीं, 
कुल-ख़त्म तेरे प्राण हैं...

रावण
सारे ग्रह-नक्षत्र मेरे,
एक कथन संग मौन हैं,
शनि अभागे, उलटे भागे,
कोठरी में रौन हैं,
गंध-अर्वों को चबाया,
यक्ष-देवों को दबाया,
यम-कुबेरों को नभाया,
सब ही मुझसे गौण हैं,

कौन है तू छुट-मकोड़ा,
तुच्छ-हँसोड़ा कौन है,
कौन कपटी है तू कमतर,
लड़ तू शिशुओं से जा मर,
क्रोध से बच, तू पतंगा,
क्षुद्र से भी क्षुद्रतर,
राह से हट जा परे चल,
छोड़ दे मेरी डगर...

जटायू

मेरी तमसा से ढपे,
पूरा नगर वो गिद्ध हूँ,
पूछ नभ-निधि में मैं,
कैसा अंतका, क्या सिद्ध हूँ,
तीक्ष्ण दृष्टि अति-प्रहारक,
मैं ही मारक, मैं ही तारक,
कितने प्राणों का संहारक,
जीवहर बल-रिद्ध हूँ,

व्योम पूरा मेरी सत्ता,
नभ का नृप प्रसिद्ध हूँ,
चल दिखा बल नीच दुष्टा,
क्या तेरा वरदान है,
तू महा-धूरत, महा-
-मूरख, महा-अज्ञान है,
आज संकट में नहीं, 
कुल-ख़त्म तेरे प्राण हैं...

रावण
युद्ध-अक्षम तू पुरातन,
खग तू झूठा-झीठ है,
मार खाकर ही मनेगा,
दिखता ही तू ढीठ है,
खा के जूते लात तेरी,
लगती पक्की पीठ है,
मच्छरों के संग-गति कर,
तू भी उन सा कीट है,

अंत को बैठा तू खंढ़र,
जर्जरा सा जरीठ है,
कुछ तो कर ले शर्म, टूटा-
-तन-कमर, जर्जर उमर,
क्रोध से बच, तू पतंगा,
क्षुद्र से भी क्षुद्रतर,
राह से हट जा परे चल,
छोड़ दे मेरी डगर...

जटायू

मुण्ड-दस की ये दो बाँहें,
आ उखाड़ूँ युद्ध कर,
जांघों के भीतर से तेरा,
बल उतारूँ युद्ध कर,
राह तकती होगी, जागी,
मंद-बुद्धि महा-अभागी,
तेरी घरनी का सुहागी-
-रंग उजाड़ूँ युद्ध कर,

फाड़ूँ बीसों कर्ण-पट सुन,
मैं चिंघाड़ूँ युद्ध कर,
युद्ध कर पापी कलंकित-
-कुल, कि तू पहचान है,
तू महा-धूरत, महा-
-मूरख, महा-अज्ञान है,
आज संकट में नहीं, 
कुल-ख़त्म तेरे प्राण हैं...

रावण

युद्ध को न हो ललायित,
काव्य न कर बेतुके,
सरिता चले मेरे वेग से ही,
पवन मुझसे ही रुके,
सूर्य जले मेरे ताप से ही,
चन्द्र-डग मेरी नाप से ही,
गुरु डरे आलाप से ही,
इन्द्र घुटनों पर झुके,

झुक गए पर्वत भी अपना,
कद कमा कर डर चुके,
युद्ध लड़ जा दीपकों से,
पुष्प पर मँडरा भ्रमर,
क्रोध से बच, तू पतंगा,
क्षुद्र से भी क्षुद्रतर,
राह से हट जा परे चल,
छोड़ दे मेरी डगर...

जटायू

स्त्री-नर, सुकुमार, सबजन,
किसी को भी न भाऊँ मैं,
दुर्जनों को, सुर-जनों को,
उर-जनों को खाऊँ मैं,
जीव-जग की मैं निराशा,
रक्त से बुझती पिपासा,
मैं हूँ कूपम अंधका सा,
भय-भँवर फैलाऊँ मैं,

वेग तारों सा करूँ मैं,
वज्र सा गिर जाऊँ मैं,
जित भी जाऊँ, भय उगाऊँ,
अटल-वध मेरा मान है,
तू महा-धूरत, महा-
-मूरख, महा-अज्ञान है,
आज संकट में नहीं, 
कुल-ख़त्म तेरे प्राण हैं...

रावण

जर्जरित, जर्जर, जरामय,
जरग्रसित, तू जरित है,
तू गरुड़ के पद के मद में,
चूर गदगद भ्रमित है,
विकल, व्याधित, व्यथित, विरसी,
व्यसन-ग्रसित अकथित है,
अशुभ से लथपथ तू, तेरा,
अंत निश्चित त्वरित है,

डिम्ब का शरणार्थ, द्विज,
अंडज, अधम तेरा चरित है,
जग में लिखित और पठित है,
समर में मैं हूँ अमर,
क्रोध से बच, तू पतंगा,
क्षुद्र से भी क्षुद्रतर,
राह से हट जा परे चल,
छोड़ दे मेरी डगर...

जटायू

नाम है बद-नाम मेरा,
शौक ही संग्राम मेरा,
अति-अनर्थी काम मेरा,
है जटायु नाम मेरा,

शब्द-भेदी, लक्ष्य-भेदी,
हृदय-भेदी बाण हूँ मैं,
राम मेरा, श्याम मेरा,
काल ही बलराम मेरा,

मृत्यु-भूमि, मरण-भूमि,
दग्ध-भूमि, दाह-भूमि,
भूत-भूमि, भस्म-भूमि,
घर मेरा, विश्राम मेरा,

मृत समूचा ग्राम मेरा,
मैं जटायु नाम मेरा,
है जटायु नाम मेरा,
मद से तू मदवान है,
तू महा-धूरत, महा-
-मूरख, महा-अज्ञान है,
आज संकट में नहीं, 
कुल-खत्म तेरे प्राण हैं...

रावण

सुन जटायू, प्राण वायु,
जिसपे सब जग चल रहा,
मेरी आज्ञा में पवन है,
अनल मुझसे जल रहा,
आज, अब का, आगे का सब,
ज्ञान मुझको कल रहा,
मैंने वारिधि को पछाड़ा,
मैं वहीं निश्चल रहा,

बाण सत्य और जो मिथक हैं,
सब मेरे तरकश में हैं,
ये समय, सुर-ताल, हर घट,
काल मेरे वश में हैं,
बिजलियाँ आकाश से छीनीं,
मेरी नस-नस में हैं,
मेरी दाहाड़ों से प्रति-पल,
काँपता भूतल रहा,

मरघटों के सब अघोरी,
मैंने ही जन्माए हैं,
गंगाधर के घर के रस्ते,
मैंने ही समझाए हैं,
शीश दस न किए हैं अर्पण,
प्राण दस कटवाए हैं,
कटी ये पृथ्वी, टली है मृत्यु,
मैं अटल हर-पल रहा,

सुन जटायू, प्राण वायु,
जिसपे सब जग चल रहा,
मेरी आज्ञा में पवन है,
अनल मुझसे जल रहा,

रण बनाता है झड़प को,
लाज से मैं गल रहा,
चीख ऊँचा कर के स्वर,
मैं काटता तेरे विहग-पर,
क्रोध से बच, तू पतंगा,
क्षुद्र से भी क्षुद्रतर,
राह से हट जा परे चल,
छोड़ दे मेरी डगर...

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