सूर्य का अट्टहास फिर गूंजा,
द्युती-सम चमक-चमक कर,
कालजयी कविता के कुसुम,
वो काले-काले अक्षर,
महक उठे कुछ पुष्प अतीत के,
जन्मे चहक-चहक कर,
चोट पे चोट निरंतर पड़ती,
जाती खनक-खनक कर,
धुत विकास के ढोंग को रख कर,
श्रम की लाल-लपट पर,
फिर प्रयाग के पथ पर,
वह पुनः तोड़ती पत्थर...
वो उजले पन्नों के भीतर,
मल्लयुद्ध भावों का,
खत्म ना हुआ अभी पलायन,
सूनापन गांवों का,
वो हंसता सा मुखमंडल और,
रुदन मूक आंहों का,
बारम्बार प्रहार से मृत वो,
कोमलपन बाहों का,
थमा क्यों नहीं गुरू हथौड़ा,
सीकर थम गए थक कर,
फिर प्रयाग के पथ पर,
वह पुनः तोड़ती पत्थर...
बार बार वो हंस-हंस के क्यों,
आंसू पोंछ रही है,
भाषाविद् ना होकर शायद,
घर का सोच रही है,
या महामारी की आशंका,
फिर से नोच रही है,
कर्म कर रही कठिन अनवरत,
डर से मोच रही है,
ना पहुंचा क्यों रथ विकास का,
गाँव के जर्जर पथ पर,
क्यों प्रयाग के पथ पर,
वह पुनः तोड़ती पत्थर...
गिट्टी पर जब घन कुट-ता है,
चिंगारी खिंचती है,
नव-यौवन की मृदुता गायब,
वृद्ध-चर्म दिखती है,
आगामी कल सुंदर लिखने,
आज युद्ध लिखती है,
लिखी निराली अटल आज भी,
धूप में वो सिंकती है,
सिंकी-भुंजी वो देह और भी,
लड़ती सूर्य से डट-कर,
फिर प्रयाग के पथ पर,
वह पुनः तोड़ती पत्थर...
ठेठें, छाले, फटीं बिवांईं,
जलते-तपते गहने,
भूख-प्यास और निर-आशाओं,
का सिंगार है पहने,
अस्त्र-शस्त्र संग जीवन-रण की,
लगी धार में बहने,
नारी है शायद वो सबकुछ,
पैदा हुई है सहने,
पर्वत काट रही कटार से,
खुद तिल-तिल कट-कट कर,
फिर प्रयाग के पथ पर,
वह पुनः तोड़ती पत्थर...
काश गाँव में होती और मैं,
चूल्हा-चौका करती,
गाए-बजाये जिस दिन चाहे,
जिस पर भौंका करती,
इस ज्वाल-भट्टी में तन को,
कभी ना धौंका करती,
मैं जीती या मरती,
मजदूरी कभी ना करती,
मैं जीती या मरती,
मजदूरी कभी ना करती,
मयके जाती, दम से सोती,
टांग पे टांग को रख कर,
पर प्रयाग के पथ पर,
मैं पुनः तोड़ती पत्थर...