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वीरता, जिस‌का विशेषण, 
वीर संज्ञा है जिसे,
आज तक समझा नहीं मैं,
वीर कहते हैं किसे,
कोटि-शत अनगिन कथाएं,
हर पुरुष-मन की व्यथाएं,
स्त्रियाँ सब स्वप्न में भी,
पूजती रहतीं जिसे, 
आज तक सम‌झा नहीं मैं,
वीर कहते हैं किसे...

स्त्रियाँ क्या, क्या पुरुष, 
शिशु-बाल-नव-सुकुमार भी, 
भ्रूण तक महिमा सुने, 
इस वीर के श्रृंगार की, 
उत्ता, कुकुर, केसरी, 
सारंग, सब सेवक किए,
पर अथक नित जन्म लेतीं, 
हैं कथा संहार की,

रक्त से लिखतीं हैं कलमें, 
पुष्प से रचतीं कभी, 
वक्ष विस्तारित करें ये, 
सत्य और झूठी सभी, 
दर्जनों सद्गुण की मूरत, 
वीर के आकार की, 
ख्याति-जस जुग-जुग बजे,
इस वीर के परिवार की,

कविताएँ है तलवार की, 
कुछ दुग्ध-रक्तिम धार की, 
प्रतिशोध की, प्रतिकार की, 
संग्राम बारम्बार की,
ब्रम्हा के इस ब्रम्हाण्ड में, 
संसार कहते हैं जिसे,
आज तक सम‌झा नहीं मैं,
वीर कहते हैं किसे...

सत्य ही वर्णित किया है, 
वीर भोग्यः वधुन्धुरा,
सत्य ही सब जानते हैं, 
वीर ही सब कुछ यहां,
जो किसी का, हर किसी का, 
वीर का सबकुछ हुआ, 
और क्या मतलब ही इसका, 
वीर भोग्यः वसुन्धरा,

वीर भोगे रमणियों को, 
सुन्दरी सर्वत्र को,
वीर भोगे शस्त्र को और,
अस्त्र को, विशस्त्र को, 
राक्षसों को वीर भोगे, 
दैव को, अन्यत्र को, 
वस्त्र को भी, शास्त्र को भी, 
यत्र-तत्र-सर्वत्र को,

वीर भोग्यः वसुन्धरा,
क्या पृथ्वी को भी भोगता, 
कितना भोगी है, विलासित, 
सा लगे ये देवता, 
सुरा, सुरा, सरिता, सरा, 
स्रष्टि को भी वश में किया, 
कितनी अगणित योग्यता, 
हां वीर सबकुछ भोगता,

सीखलो लक्षण जरूरी, 
वीर बनना है जिसे,
आज तक समझा नहीं मैं, 
वीर कहते हैं किसे...

वीर का अनिवार्य गुण, 
शत-शत प्रमाणित साहसी, 
मेरे मन में पच-अपच सा,
भ्रम से लथपथ साहसी,
अर्ध-मानव अर्ध-वहशी, 
भी जचेगा साहसी, 
जो लड़ा नरसिंह से नर, 
वो नहीं क्या साहसी,

मृत्यु जीवन ज्ञान न हो, 
क्यों लड़ें पहचान न हो, 
शिव को जो ललकारे कैसा,
कुन्दबुद्धि साहसी, 
वृक्ष के पीछे अमर, 
आजानुभुज शर-चाप-धर, 
मर्यादा के पर्वत शिवर का, 
ये कथानक साहसी?

माना बाली को था वर, 
और न्याय करना था अगर, 
रणभूमि में मर या अमर, 
ऐसा पढ़ा था साहसी,
मुझको आती है हंसी, 
पर याद कर लो तुम इसे,
आज तक समझा नहीं मैं, 
वीर कहते हैं किसे...

रुप का वर भी जचा, 
हर-हर विदित हर वीर को, 
जस सुषोभित रंग कलंकित, 
पाप-राजक-नीर को,

जन्म से देखा सुनायक, 
कुछ कथा कब की भी हो, 
हो मिथक या हो पुराणिक, 
मध्य या अब की भी हो, 
रक्त, नीलः, पलाश, पीत:, 
श्वेत, नारंग, पाटलम्, 
सब सुहाये वर्ण अपितु, 
कृष्ण किन्चित खीर को,

सीतापति आजानुभुज च, 
कर्ण अपि आजानुभुज च, 
पृथ्वीराज आजानुभुज तथ, 
भुज बलम् शुभ वीर को,
वक्ष विस्तृत अपरिहार्यम्, 
भूषणम् अपि अपरिहार्यम्, 
शिरसिकेशन धारयन्ता:,
स्मित-कुपित मुख वीर को,

काले, नीले, सांवले, 
तीनों वरन रणछोड़ के,
आज तक शंका में हूं,
कि सत्य समझूं मैं किसे,
आजतक समझा नहीं मैं, 
वीर कहते हैं किसे...

कितने लक्षण, कितनी बातें,
कितने कारण, कितनी रातें, 
कितना जागूं, क्या कहूं,
क्या-क्या लिखूं, कितना रचूं, 
वीर के भोगों का वर्णन, 
लिख के मैं कितना जचूं,
अत अति हो जाएगा सो,
गुण की श्रेणी सजधजूं,

धैर्य, शौर्य, साहस, पराक्रम, 
कर्म-निष्ठा, दृड़ता, सत्यम्, 
आत्मबल, पुरुषार्थ, स्वाभि-
-मान व स्वविचार हो, 
संकलप, त्यागी, समर्पण, 
रणकुशल, रणनीति-संजन, 
धुरचपल, वज्री-वचन सम, 
वज्रभुज हर बार हो,

अश्व की रफ्तार हो और,
गज सदर्श-बल-भार हो, 
कड़क दृष्टि, व्योमचारी, 
सिंहदल सरदार हो,
चन्द्रमा का शीत वांछित, 
व्याल-घात अभिनीत वांछित, 
रक्त-तृष्णाभीष्ट वांछित, 
लोम का भण्डार हो,

धेनुपति का कद प्रधानम्, 
गव्यक्षीरम् मद प्रधानम्,
हठ-प्रधानम्, लठ-प्रधानम्,
कर स्वयं तलवार हो,
रोग शून्यम्, ग्लानि शून्यम्, 
शिथिल शून्यम्, हानि शून्यम्, निष्कपट, रोषी-विकट, चक्षु-
-वरन रक्तिम लपट, 
विवेकपट, व भष्मकट, 
आघात तेजस वज्रपट, 
शूल-शून्यम्, क्लेश-शून्यम्, 
मृत्यु का अवतार हो,

गर्व इतना हो प्रबल कि,
दंभ छोटा दिख रहा हो, 
अंत करने में प्रथम, 
आरंभ छोटा दिख रहा हो,
मिट रहा हो शत्रु का घर, 
वंश रोता दिख रहा हो, 
युद्ध करने अति ही उत्सुक, 
बालात् अंगीकार हो,

निम्न को धर दे कुचल के, 
श्रेष्ठ का कर दे दमन, 
हर नियम का हो हनन, 
रण या सुखों का हो चयन, 
पशुबलि या नरबलि, 
या प्रीति की, बस स्व-का मन, फड़फड़ाता तन-बदन और, 
हार अस्वीकार हो,

आक्रोश प्रिय और असम्वेदी, 
छल-कपट का हो मनन,
भूख जिसकी शान्त न हो,
प्यास जिसकी हो गगन,
सिंहावलोकन प्रति ही क्षण, 
डाकार गर्जन हो घनन, 
वीर को शत-शत नमन हो, 
वीर को शत-शत नमन, 
वीर को शत-शत नमन हो,
वीर को शत शत नमन, 
गुण हजारों है सृजन के, 
कैसे बताऊं मैं किसे, 
आज तक समझा नहीं मैं, 
वीर कहते हैं किसे...

सत्य मेरे सामने पर, 
मैं निरा अज्ञान हूं, 
मसखरा मैं, मैं कुबुद्धि, 
दूष मैं मदवान हूं, 
कुछ न समझा मैं कभी, 
मैं रात्रिचर, विष-प्राण हूं, 
निर्बलों में श्रेष्ठ, कालिम, 
कमतरा, कमध्यान हूं,

मैं अचल, कृमि एक अवल, 
बस छुद्र सा एक श्वान हूं, 
भीख से मैं पल रहा हूं,
नित्य भिक्ष-आचान हूं,
अन्न, वस्त्रम् च निवासम्,
जीवनस्यः मूल भावम्, 
जिसका ये सब छीना जबरन, 
मैं वहीं इंसान हूं,

वीर जन ने मुझको भोगा, 
मुझको खाया, मुझको नोचा, 
चींथा-फाड़ा और ‌कहा के, 
मैं बहुत बलवान हूं,
वो वीर शिख-नख वर के थे, 
कुछ घर के कुछ बाहर के थे, 
सिहों के दन्ताधर के थे, 
कुछ तो मेरे अस्तर के थे, 

कपटी हँसी, विद्युत द्युति, 
अभिनय में अद्‌भुत स्वर के, 
जिंदा बचा मैं या नहीं, 
हद है के मैं अन्जान हूं,
मौन, बेईमानी, कपट-छल,
चापलूसी, झूठ पल-पल,
स्वार्थ-सिद्धि, छद्‌म-वेशी, 
भ्रष्ट धुत-धुत-धुत अनरगल,

अवगुणों से होगा लथपथ, 
जाँच लेना तुम इसे, 
अच्छी तरहा जानता हूं, 
वीर कहते हैं किसे, 
खूबियां पहचानता हूं, 
वीर कहते हैं किसे...

बलवान का, बलहीन पर, 
बालात् सा आघात होगा, 
सत्य के जो साथ होगा, 
उसपे ये प्रतिघात होगा, 
पीठ पर होगा छिपाकर, 
मूं पे दल के साथ होगा, 
तात चोरों का वो होगा, 
दुर्जनों का नाथ होगा,

बन्धु होगा, क्रूर होगा, 
वार भी भरपूर होगा, 
मैं भी चकनाचूर हुआ हूं, 
तू भी चकनाचूर होगा, 
तू भी जब मजबूर होगा, 
तब समझना सरल होगा, 
रक्त से जो सींचा होगा, 
उसमें फल भी गरल होगा, 
जो बहेगा आँख से मां की, 
वो झूठा तरल होगा,

घर के भीतर जश्न होगा, 
तू लपट में विरल होगा, 
अनल होगा भूखा-प्यासा, 
यज्ञ की अ-मिटी पिपासा, 
घर का होगा वीर वो,
तेरी आहुति देगा इसे, 
खूब ढंग से जानता हूं, 
वीर कहते हैं किसे, 
खून से पहचानता हूं,
वीर कहते हैं किसे...

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