Source: Tung Lam on Pixabay.com किया शुरु जिस पल से सोचना हमने
उस पल से इस कदर मशरूफ हो गए
मगरूर न हुए तो जग से चूर हो गए
खुद में डूबे इस कदर कि खुद से दूर हो गए।
सवालों का सिलसिला कहीं थमा तो नहीं
बस हम ठहरे इस कदर कि मजबूर हो गए
नामंजूर हमें ख्वाबों में जीना न था, पर -
असल ज़िंदगी के ख्वाब से महरूम हो गए
मगरूर न हुए तो जग से चूर हो गए
खुद में डूबे इस कदर कि खुद से दूर हो गए।
तुम्हें लगता है- हमें फ़र्क पड़ता नहीं
कानों में हमारे कुछ खटकता नहीं
रात गुज़रती है, सूरज बदलता नहीं
दिल धड़कता है बस दहकता नहीं
चलो मान लिया हमने कि सच है यही
तुम सदा खुश रहो बेकसूर हम नहीं।
हमारा क्या हम तो आदतन सह जाएँगे
फिर सितमगर पर एतबार कर जाएँगे
छोड़कर चले जाना हमने सीखा नहीं
जो सीखा है तुमने वो समझा नहीं
खामोशी हमारी कुछ कह न सकी
और सेहत हमारी सब सह न सकी।
पर तुमने तो कभी कुछ किया ही नहीं
हर खुशी को चुना बस चुना ही नहीं
अपने शब्दचयन से तुम वाक़िफ तो थे
बस ज़ायके से इसके महरूम हो गए
हमने ये सोचा और यूँ मज़बूत हो गए
खुद में डूबे इस कदर कि खुद से दूर हो गए
तुम कहते हो - हमने शिकायत न की
जब की थी तुमने कभी वो सुनीं ?
अपना समझकर तुम्हें किया था बयाँ
अब ढूंढते हो -खामोशी में क्या है छिपा ?
परेशानी ये न थी कि हम बदल गए
मसला ये हुआ कि हम समझ गए।
सब्र का बांध कभी टूटा ही नहीं
जो टूटा था अंश कभी छूटा ही नहीं
रूठा था मगर झूठा तो नहीं ?
तुम अक्स हो मेरे दूजा मैं नहीं
जो है ही नहीं हम उसमें जीने लगे
स्मृतियों में अपनी तुमसे मिलने लगे
खुशियों की कदर हमने जानी वहीं
भरपूर दी मगर महरूम हो गए।
मशहूर जब हुए तो सबके नूर हो गए
मुफ़ीड न दिखें कि पल में क्रूर हो गए
उठे सवाल जब किरदार पर तो चूर हो गए
खुद में डूबे इस कदर कि खुद से दूर हो गए।
पर हम भी ढीठ हैं हुजूर कि फिर शूर हो गए
चूर तो मूठा था वो अंश शुरू नवांश हो गए ।
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