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क्या लिखूँ मैं अपना ग़म, लिख सकूँ इतना कम नहीं।
क्या लिख दूं इस पर कि किस तरह मेरी रूह से ज़्यादा मेरे जिस्म की चाह रही?
या लिखूँ किए गए उन झूठे क़स्मों-वादों पर?
क्या लिख दूं किस तरह मेरा दिल जानते हुए भी, दिल-आज़ार निकले वो?
इस पर क्या लिखूँ कि मैं इश्क़ में हार चुकी हूँ?
क्या लिख दूं उस फ़रेब की फ़रेबी पर
या मेरी उस मासूमियत पर जो कहीं खो सी चुकी है अब?
क्या लिख दूं उन रातों को बहाए हुए उन आंसुओं के बारे में?
या लिखूँ उन कांपते हुए हाथों को कैसे अकेले संभाला है मैंने?
क्या लिख दूं, वो मेरा भगवान के सामने झुककर दर्द कम करने की भीख मांगना?
या लिखूं उस जंग के बारे में जो मैंने हर दिन खुद से लड़ी है?
लिखना चाहूं भी तो कैसे लिखूं दोस्त?
मैं लिख सकूं मेरा ग़म इतना कम नहीं।
हां, अगर तुम लिख पाओ तो ज़रूर लिखना इस पर
क्या प्यार के नाम पर ग़लत करने वालों का कोई हिसाब नहीं?
जवाब का इंतज़ार करूंगी।

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