मेरी कहानी किसी बड़े शहर या बड़े मंच से शुरू नहीं होती।
यह कहानी शुरू होती है मेरे छोटे से घर की रसोई से।
सुबह के पाँच बजते ही मेरी आँख खुल जाती थी।
रसोई में चूल्हे की पहली आंच के साथ ही मेरा दिन शुरू हो जाता था।
कुकर की सीटी, कढ़ाई में छौंक, मसालों की खुशबू… यही मेरी दुनिया थी।
घर के सब लोग कहते थे,
“गृहिणी का काम बस घर संभालना है।”
मैं भी चुपचाप सबकी बातें सुन लेती थी।
पर सच कहूँ तो मेरे दिल में एक छोटा सा सपना था — लिखने का सपना।
जब सब सो जाते थे, तब मैं चुपके से अपनी कॉपी निकालती थी।
रसोई में खड़े-खड़े ही कभी कोई पंक्ति लिख देती,
कभी आटे लगे हाथों से ही शब्दों को कागज़ पर सजा देती थी।
कभी-कभी मन में सवाल उठता —
क्या मेरी बातें कोई पढ़ेगा भी?
फिर खुद ही खुद को समझा लेती,
“शायद नहीं… पर दिल हल्का हो जाता है।”
एक दिन मेरी बेटी ने मेरी कॉपी देख ली।
उसने पढ़ा और मुस्कुराकर बोली —
“माँ, ये तो बहुत सुंदर है। आप इसे दुनिया को क्यों नहीं दिखाती?”
उसकी बात सुनकर पहली बार लगा कि
शायद मेरी आवाज़ भी किसी तक पहुँच सकती है।
उस दिन के बाद मैंने लिखना छुपाना छोड़ दिया।
अब मैं रसोई में सिर्फ खाना ही नहीं बनाती थी,
बल्कि शब्दों को भी पकाती थी।
कभी दर्द को कविता बना देती,
कभी यादों को कहानी।
धीरे-धीरे मैंने अपनी रचनाएँ प्रतियोगिताओं में भेजना शुरू किया।
पहले डर लगा, फिर उम्मीद जगी।
आज भी मैं वही हूँ —
एक साधारण गृहिणी।
लेकिन फर्क इतना है कि अब
मेरे हाथों में सिर्फ करछी ही नहीं,
कलम भी है।
मैंने समझ लिया है कि
सपनों की कोई उम्र नहीं होती
और न ही कोई जगह छोटी होती है।
कभी-कभी रसोई की खिड़की से आती हवा मुझे याद दिलाती है —
कि एक दिन मेरे शब्द भी
इसी हवा की तरह दूर तक उड़ेंगे।
और उस दिन मैं मुस्कुराकर कहूँगी —
“मेरी कहानी यहीं से शुरू हुई थी…
मेरे छोटे से घर की रसोई से।”