मेरे अपने ही मेरा तिरस्कार करते हैं,
मुझे ज़लील हर बार करते हैं।
सीना मेरा भी है, दिल मेरा भी धड़कता है,
थोड़े से प्यार के लिए मन मेरा भी तड़पता है।
अपाहिज हूँ शायद, बोझ भी,
कुछ बन सकूँ—थी मेरी सोच भी।
क्यों मेरी उम्मीद के साथ खिलवाड़ करते हो,
मेरी आत्मा को मारकर मुझे बेज़ार करते हो।
तन को मारो मेरा, मुझे गाली दो,
जीवन का श्राप हूँ तुम्हारा, चाहे मुझे ज़हर की प्याली दो।
हूँ मगर अंश तुम्हारा, चाहे शरीर से अपंग सारा,
क्यों मेरी सच्चाई तुम्हें डराती है,
मुझे दुनिया से मिलाने में
तुम्हें शर्म आती है।
मेरी कमी का अहसास मुझे रोज़ क्यों कराते हो,
जो हर पल तड़पता है, उसे और क्यों रुलाते हो।
जो मेरे बस में नहीं, उस कारण मुझ पर चिल्लाते हो,
मेरी बेबसी से क्या तुम खुशी पाते हो।
धन, वैभव, सम्मान संसार में तुम्हारा है,
कुछ क्षण प्रेम से मुझे क्यों नकारा है।
बहुत धनवान हो, मेरा इलाज कराते हो,
पर मन से मुझे दरिद्र, लाचार, बेबस ठहराते हो।
क्या देते प्यार तुम, अगर होता मैं औरों की तरह?
गर थी उमंग तुम्हें मेरे पूर्ण होने की,
मार क्यों नहीं दिया तुमने
जब थी शून्य जीवनी।
अब मेरी खूबियों को नजरअंदाज कर,
मेरी कमियां गिनाते हैं,
वात्सल्य नहीं,
घृणा दिखाते हैं।
मेरे अपने ही मेरा तिरस्कार करते हैं,
मुझे ज़लील हर बार करते हैं।