Source: Sandip Karangiya on Unsplash.com

इस कहानी को शुरू करने से पहले मैं चाहूंगी कि आप लोग मुझे थोड़ा जान लो। मैं अपनी स्टोरी बिल्कुल शुरू से बताऊंगी — एक ऐसी लड़की की कहानी, जिसके माँ-बाप ने उसे छोड़ दिया था। उसके बाद उसकी ज़िंदगी में क्या-क्या हुआ, उसने कैसे अपनी ज़िंदगी को संभाला, किस तरह हर स्थिति का सामना किया… मैं हर एक पल लिख रही हूँ।

बहुत छोटी उम्र से ही मैंने बहुत कुछ देखा है। अभी मैं 25 साल की हूँ, जब यह सब लिखने का सोचा। मेरी ज़िंदगी बिल्कुल रोलर-कोस्टर राइड जैसी रही है, और मुझे उम्मीद है कि जब आप मेरी कहानी पढ़ेंगे, आपको अच्छी लगेगी। आप मेरी लाइफ के हर पल को समझ पाओगे — खुशी भी, दर्द भी, संघर्ष भी। उम्र के साथ दुनिया भी बदलती है, लोगों के चेहरे भी, प्यार भी। कब क्या हो जाए, कुछ समझ ही नहीं आता।

काफी सालों से मैं खुद को बहुत समझदार महसूस करती हूँ। आज मैं लोगों से थोड़ा दूर रहना पसंद करती हूँ। फिलहाल जितने कम लोग मेरी लाइफ में हैं, मैं उतनी ही ज़्यादा खुश हूँ।

अभी मैं चौथी मंजिल की एक बिल्डिंग के एक कमरे में बैठी हूँ। मेरा अगला पेशेंट लगभग एक–डेढ़ घंटे बाद आएगा। इतनी अकेली हूँ तो सोचा अपनी कहानी ही लिख दूँ — शायद अकेले रहने का कोई फायदा तो हो। सच कहूँ तो मैं बहुत ज़्यादा सोचती हूँ। लोगों की बातें मुझे बहुत चोट पहुँचाती हैं। मैं खुद को संभालने की बहुत कोशिश करती हूँ, पर कभी-कभी वक्त या मेरी भावनाएँ दोनों ही भारी हो जाते हैं। आँखों से आँसू अपने आप निकल जाते हैं। मैं चाहूँगी कि कोई एक ऐसा इंसान हो, जिसके कंधे पर सिर रखकर थोड़ा सो सकूँ… पर जब कोई नहीं मिलता, तो आँसू ही साथ देते हैं। शायद यही आँसू मुझे अंदर से मजबूत बनाते हैं।

अपने ख्यालों को लिखना एक अच्छी आदत है। काफी समय पहले जब मैं क्लास में अकेली होती थी, तो अपनी फीलिंग्स किताबों के पन्नों पर लिख दिया करती थी। उससे मन को थोड़ी शांति मिलती थी। मैंने सुना है कि ज़्यादा सोचने का बोझ कम हो जाता है, जब हम लिखते हैं जो दिमाग में चल रहा होता है।

जब कोई सुनने वाला न हो, तो लिखना ही सबसे अच्छा विकल्प होता है। मुझे पता है अभी मैं थोड़ा सा बेकार भी लिख रही हूँ… पर कोई बात नहीं। अब मैं ठीक से शुरू से अपनी ज़िंदगी के कुछ लफ़्ज़ लिखने जा रही हूँ।

दूरियाँ

“कहते हैं ना, जब हम किसी से दूर हो जाते हैं, तब ही हमें उसकी असली याद आती है…”

कुछ ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ। मेरी माँ और बाबा ने मुझे और मेरी दो बहनों को इस दुनिया में तो लाया, पर उनके पास इतनी आर्थिक ताकत नहीं थी कि वो हमें पाल सकें। उन्होंने पहले सोचा कि हमें कहीं काम पर भेजकर पैसे जमा करेंगे, फिर हमें वापस ले आएंगे।

एक दिन आंधी और तूफान दोनों एक साथ आ गए, और मेरी छोटी सी दुनिया ही उजड़ गई। बाहर बहुत तेज़ बारिश हो रही थी। मेरे सामने ही घर की दीवारों के अंदर पानी भरने लगा और दरारें आने लगीं। घर के सामने एक लंबी सी नाली थी जो बाहर की तरफ जाती थी, और साइड में एक नारियल का पेड़ था। अचानक एक नारियल ज़ोर से नीचे गिरा। मैं डर के मारे माँ से चिपक गई।

माँ ने तुरंत मेरी छोटी बहन और मुझे उठा लिया और हमें एक आंटी के घर ले जाने लगी। पानी माँ की छाती तक आ रहा था, फिर भी वो हमें संभाल कर चल रही थी। बड़ी दीदी शायद उस वक्त वहाँ नहीं थी, वो किसी मौसी के घर गई हुई थी।

शाम तक माँ ने हमें आंटी के घर पहुँचा दिया। कुछ दिन बाद जब बारिश रुकी, तब वो हमें वापस ले आई।

मुझे बचपन से ही पढ़ाई का शौक था, मुझे ज़िंदगी में कुछ बनना था। चाहे उसके लिए मुझे अपनी माँ-बाबा से दूर ही क्यों न जाना पड़े, मैं तैयार थी।

मैं तब सिर्फ 3 साल की थी। मिट्टी और नारियल की खोपी से घर-घर खेल रही थी। तब अचानक मेरी माँ ने ज़ोर से बुलाया — “चुइंकल, इधर आओ!”

मैं खुशी-खुशी भाग कर गई, सोचकर शायद माँ कुछ खाने को लाई होगी। हमारे पास खाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे। घर टूट-फूट गया था, बाबा ज़्यादा घर पर रहते नहीं थे। सब कुछ बिखरा हुआ था…

माँ ने कहा, “आज तुम्हें एक जगह ले जाएंगे जहाँ बहुत सारा खाना मिलेगा और तुम बहुत खुश रहोगी।”

खाने का नाम सुनते ही मैं खुश हो गई। एक आंटी के साथ मैं और मेरी दोनों बहनें कार में बैठ गए। कार के अंदर हर तरफ खाना ही खाना था। मैंने आंटी से पूछा, “सच में हम ऐसी जगह जा रहे हैं जहाँ इतना सारा खाना मिलेगा?”

उन्होंने मुस्कुरा कर हाँ में सिर हिला दिया। माँ भी साथ थी, इसलिए मैं बिल्कुल टेंशन-फ्री थी।

लगभग पूरी रात का सफर करके हम एक नई जगह पहुँचे। वहाँ घर बहुत सुंदर और बड़े-बड़े थे। मैंने बस एक बार पीछे देखा — माँ मुस्कुरा रही थी, पर उनकी आँखों में आँसू थे… खुशी के या दर्द के, मैं समझ नहीं पाई।

फिर मैं उस आंटी के साथ एक घर के अंदर चली गई। वहाँ रोटी, आलू-मटर की सब्ज़ी, मिठाई — इतना सारा खाना देखकर मैं सब भूल गई। खाना खाया और सो गई।

शाम को जब उठी और दरवाज़े से देखा, माँ कहीं नहीं थी। आँखों से आँसू बहने लगे। मुझे नहीं पता था कि वो माँ के साथ मेरा आखिरी दिन था। मैं रोती हुई गेट तक भागी और दीदी से बोली, “माँ चली गई…”

दीदी ने कहा, “माँ वापस नहीं आएंगी…”

हम दोनों गैराज तक भागे, पर कोई नहीं था। जहाँ माँ बैठी थी, वहीं बैठकर मैंने घंटों रोई।

उस आंटी ने मुझे नए कपड़े और चॉकलेट्स दिए। मुझे तब पता नहीं था कि वही आंटी मेरी ज़िंदगी की सबसे केयरिंग मम्मी बनने वाली है।

कुछ दिन बाद हम करिपुरा नाम की जगह गए — एक इंटरनेशनल ऑर्गेनाइज़ेशन, जहाँ बच्चों का ख्याल रखा जाता था। यहीं मेरी माँ-बाबा ने हमें छोड़ दिया था। वही आंटी ने हम तीनों को एक नए, सुंदर घर में रख दिया।

वहाँ प्लेग्राउंड, टॉयज़, स्कूल — सब कुछ था। दिल से माँ की याद जाती नहीं थी, पर धीरे-धीरे हम उस आंटी को “मम्मी” कहने लगे। वो बिल्कुल एक असली माँ की तरह हमें प्यार करती, खाना खिलाती, पढ़ने को बोलती। एक प्रॉपर रूटीन वाली ज़िंदगी थी — सुबह से रात तक।

वो दिन सच में बहुत सुकून भरे थे। धीरे-धीरे मेरी पहली माँ की यादें धुंधली होने लगीं…

स्कूल के दिन:

दो साल की ट्रेनिंग के बाद एक दिन हमें एंट्रेंस एग्जाम देने के लिए स्कूल ले जाया गया। वहाँ मैंने क्लास 1 का एग्जाम दिया, लेकिन मेरा लेवल केजी के हिसाब से था, इसलिए मुझे केजी में एडमिशन मिल गया। केजी से लेकर क्लास 12 तक मैंने वहीं पढ़ाई की।

ज़िंदगी का रूटीन सिंपल था — मम्मी खाना बनाकर देती थी और मैं पढ़ाई पर ज़्यादा फोकस करती थी। मम्मी मेरी हर छोटी-बड़ी इच्छा पूरी करती थी। मुझे मंचूरियन बहुत पसंद है, इसलिए हर शनिवार मम्मी शाम के मार्केट से सबके लिए लाती थी। दिन बीतते गए। मम्मी हमेशा हमें खुश रखने की कोशिश करती थी — प्यार, केयर, अफेक्शन, हर ज़रूरत की चीज़, कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी।

पर… यह बिहेवियर सिर्फ कुछ दिन तक ही रहा।

उसके बाद मम्मी थोड़ी सी गुस्से वाली हो गई। शायद उस वक्त उनकी उम्र सिर्फ 25 साल थी और वो शादी नहीं कर पाई थीं, कुछ पर्सनल इश्यूज़ की वजह से। इसी लिए उन्हें मजबूरी में यह काम करना पड़ रहा था।

इस वजह से वो हर छोटी गलती पर माफ करने के बजाय मार दिया करती थीं। पर मुझे लगता है उसके पीछे भी उनका कोई न कोई अच्छा इंटेंशन होता होगा — शायद वो हमें स्ट्रॉन्ग बनाना चाहती थीं, या अपने दर्द को हम पर निकाल देती थीं।

मेरी छोटी बहन, मैं और बड़ी दीदी उनकी बहुत ही सख्त निगरानी में बड़े हुए थे। हमेशा परफेक्शन और पढ़ाई ही सबसे ऊपर होती थी।

मेरी दोस्ती शुरू हुई एक लड़की से, जिसका नाम लुफ था, पर मैं उसे प्यार से लुफी बुलाती थी। क्लास 5 से लेकर क्लास 12 तक वो मेरी बेस्ट फ्रेंड बनी रही। बीच में क्लास 9 से 12 तक सौम्या और रंजी भी मेरी लाइफ का हिस्सा बने।

क्लास 9 में जो नए दोस्त मिलते थे, वो ज़्यादातर बाहर घूमने, बंक मारने और मस्ती करने में साथ देते थे। पर मेरी लुफी हमेशा मुझे पढ़ाई को लेकर डाँटती थी और मोटिवेट करती थी। वही वजह थी कि मैं पढ़ाई पर फोकस करती रही — सिर्फ उसकी वजह से ही मैं अपने ट्रैक पर रह पाई।

क्लास 7 और 8 का हादसा…

मुझे उस समय सही और गलत का पूरा सेंस नहीं था, इसलिए लोगों की गलत नज़र को मैं समझ नहीं पाती थी। कुछ लोग मुझे हमेशा गलत नज़रों से देखते थे।

क्लास 7 में एक ऑटो भैया और क्लास 8 में कंप्यूटर सर ने मेरे साथ गलत व्यवहार किया। शायद उन्हें लगा होगा कि मैं एक ऑर्गनाइज़ेशन में रहती हूँ, मेरी कोई फैमिली नहीं है, इसलिए वो ऐसा कर सकते हैं।

पर जब मैंने यह बात वहाँ की फीमेल हेड ऑफिसर को बताई, तो उन्होंने दोनों को रिज़ाइन करने के लिए कहा।

क्लास 10 और उसके बाद…

जब मेरी 10वीं बोर्ड पास आ रहा था, तब मुझसे एक गलती हो गई — मुझे एक लड़के से प्यार हो गया। उस वजह से एक रात 2 बजे मम्मी ने मुझे ज़ोर से थप्पड़ मारा, और मैं बेहोश हो गई…

पर मुझे क्या पता था कि असली चैलेंज तब शुरू होंगे, जब मैं क्लास 10 में 89.2% लाकर पास हुई। उसके बाद मुझे तय करना था कि साइंस लूँ या कॉमर्स। मैं दो रात तक सो नहीं पाई।

तब मैं मम्मी को “माँ” कहने लगी, क्योंकि उनकी लगातार कोशिश सिर्फ मुझे खुश रखने की होती थी। मैं तो भूल ही गई थी कि मेरे भाई और दो बहनें भी हैं, जो मुझे बहुत प्यार करते हैं। सबने मिलकर मुझे साइंस स्ट्रीम लेने के लिए एंकरेज किया।

फाइनली मैंने उसी स्कूल में साइंस ले लिया और क्लास 12 तक वहीं पढ़ाई की।

उस समय मम्मी ने मुझे खुशी में एक 2G फोन दिया, पर उन्हें नहीं पता था कि वो समय मेरे लिए गलत था। मैं सोशल दुनिया में बहुत ज़्यादा डिस्ट्रैक्ट हो गई थी, क्योंकि पहली बार मैं दुनिया के लोगों से बात कर रही थी। मुझे लगता था सब लोग अच्छे होते हैं, पर धीरे-धीरे समझ आया कि मम्मी के अलावा ज़्यादातर लोग बस ड्रामा ही करते हैं। फिर भी मैं सब पर भरोसा करती रही।

ज़्यादा डिस्ट्रैक्ट होने की वजह से क्लास 11 के एग्ज़ाम में मेरे बहुत बुरे मार्क्स आए, तो मम्मी ने फोन वापस ले लिया।

संघर्ष और मेहनत

तब शुरू हुई असली रेस — अच्छे मार्क्स लाने की, क्योंकि अब मुझे फ्यूचर के बारे में सोचना था। मेरी माँ मुझे हमेशा एंकरेज करती थीं। मेरी दोस्त — टॉपर लुफी, रंजी और सौम्या — ने भी मुझे काफी मदद की।

बहुत स्ट्रगल के बाद क्लास 12 के एग्ज़ाम आए। रिज़ल्ट वाले दिन मैं भुवनेश्वर में थी, CUCET एग्ज़ाम देने। आज भी जब वो दिन याद करती हूँ, तो रोम-रोम खड़ा हो जाता है।

मेरी माँ मुझसे भी ज़्यादा एक्साइटेड थीं, क्योंकि उन्होंने मेरे लिए एक्स्ट्रा ट्यूशंस लगवाई थीं और सबसे लड़कर मुझे सपोर्ट किया था।

जब उन्होंने मेरा 80% देखा, उनकी आँखों में आँसू आ गए और उन्होंने मुझे ज़ोर से हग कर लिया। मैं खुद शॉक हो गई थी।

कभी-कभी लगता है कि सब कुछ सिर्फ हमारी मेहनत से नहीं होता — कुछ भगवान, लक और बड़ों के आशीर्वाद से भी होता है। शायद उस दिन ये सब काम आ गया था। आज भी मैं उस रिज़ल्ट के लिए भगवान को शुक्रिया कहती हूँ।

सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट

मुझे नहीं पता था कि ज़िंदगी ऐसे मोड़ भी लाएगी। स्कूल के दिन दोस्तों के साथ हँसते-खेलते कब खत्म हो गए, पता ही नहीं चला।

अब आया असली इम्तिहान — कौन सी कॉलेज में एडमिशन लेना है। मेरी माँ और दीदी ने थोड़ा मदद किया, और फाइनली काउंसलर की मदद से मैंने बैचलर ऑफ ऑडियोलॉजी एंड स्पीच लैंग्वेज पैथोलॉजी (BASLP) कोर्स चुना।

फॉर्म भर दिया और मुझे मेरिट बेसिस पर एडमिशन मिल गया। मेरी माँ बहुत खुश थीं।

चार महीने के अंदर मेरा एडमिशन हो गया और मम्मी मुझे चेन्नई छोड़ने आईं। हॉस्टल ढूंढकर, कैसे रहना है, सब समझाकर 3 दिन में वापस चली गईं।

तब तक सब ठीक लग रहा था, पर फिर शुरू हुई असली लड़ाई — लैंग्वेज बैरियर। लोग क्या बोल रहे हैं, मुझे कुछ समझ ही नहीं आता था। सब कुछ मेरे लिए बिल्कुल नया और अनजाना था।

लोगों के साथ रहना और एडजस्ट करना शुरू में मुश्किल था, पर धीरे-धीरे सब आसान होता गया। मैं एक पीजी में 11 लड़कियों के साथ रहती थी।

मेरी क्लास की दो लड़कियाँ तमिल थीं, उन्होंने मुझे थोड़ा-थोड़ा तमिल सिखाया। मेरी तीन हिंदी दोस्त भी थीं — मेघना, महबूबा और रज़िया। अगर ये तीन नहीं होतीं, तो मेरी कॉलेज लाइफ बिल्कुल फीकी होती।

हम सब बहुत बातें किया करते थे, एक-दूसरे का मज़ाक भी उड़ाते थे।

सब कुछ नॉर्मल चल रहा था, पर अचानक एक पल में सब कुछ बदल गया। मेरी एक क्लोज़ फ्रेंड मुझसे दूर होती चली गई। शायद उसे किसी से प्यार हो गया था।

मैंने बहुत समझाने की कोशिश की, पर उसने मेरी बात नहीं सुनी — या शायद वो अपनी प्रॉब्लम्स में ज़्यादा उलझ गई थी।

अगले साल उसने कॉलेज भी छोड़ दिया।

.    .    .

Discus