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जब मेरी माँ मेरे साथ थीं, तब मुझे यह भी नहीं पता था कि मैं खुद कितनी मज़बूत हूँ। मेरी कहानी सिर्फ संघर्ष की नहीं है, बल्कि उस ताकत की है, जो मुझे खुद भी नहीं पता थी कि मेरे अंदर छिपी है। यह सब शुरू हुआ जब मैं 21 साल की थी और मेरी माँ हमेशा से ही मेरी सहेली की तरह थीं। और कहा जाए तो मेरी ज़िंदगी में वही एक इंसान थीं जो मेरी सच्ची मित्र थीं, क्योंकि मैं हर काम में धीमी थी या उतनी अच्छी नहीं थी, इसलिए मेरे दोस्त नहीं बन पाते थे। इस वजह से मेरी दुनिया में सिर्फ वही थीं, अकेली। उन्हीं के साथ मैं खाती थी, उनके साथ ही सोने जाती थी और वे मेरे साथ ही रहती थीं। ज़्यादातर मैं उन्हीं के साथ उठती-बैठती थी। कहीं भी बाहर जाना हो या खरीदारी करनी हो, वे मेरी पूरी दुनिया थीं।

मैं उनसे बहुत प्रेम करती थी। उन्हें सब पता होता था कि मुझे क्या चाहिए, क्या पसंद है। वे मेरे लिए बालों की क्लिप और चूड़ियाँ लाकर देती थीं। ऐसा लगता था जैसे वे मेरी आत्मा का ही हिस्सा हों। उन्हें यह भी पता होता था कि मुझे क्या अच्छा लगेगा, क्या नहीं, खाने में क्या पसंद है, मैं कैसी हूँ।

मैं कभी भी एक आदर्श बेटी नहीं थी, बल्कि मैं अपनी माँ को कभी उतना गर्व भी महसूस नहीं करवा पाई। मैं पढ़ाई में, खेल-कूद में या किसी भी काम में बहुत अच्छी नहीं थी, हर चीज़ में धीमी थी। लेकिन उन्होंने कभी मुझे इस बात के लिए नीचा नहीं दिखाया, न ही कभी ताना मारा। वे पहली इंसान थीं जिन्होंने मुझे वैसे ही अपनाया, जैसे मैं हूँ।

मैं कुएँ के मेंढक की तरह थी, जिसे बाहर की दुनिया का कोई ज्ञान नहीं होता। उसी तरह मुझे भी दुनियादारी की समझ नहीं थी। मैं बहुत ही अंतर्मुखी स्वभाव की थी।

पर जब मैं 21 साल की हुई, तब वे अचानक हमें, मुझे छोड़कर चली गईं। हम इतने अमीर नहीं थे कि उनका अच्छे से किसी बड़े अस्पताल में इलाज करवा पाते, तो नहीं करवा पाए। उनके जाने के बाद जैसे मेरी आत्मा भी उनके साथ चली गई। कोई हँसा देता था तो हँस लेती थी, रुला देता था तो रो लेती थी। जब हँसती थी तो मौसियाँ बोलती थीं कि देखो, माँ चली गई तो हँस रही है, कितनी खुश है, जबकि दर्द तो दिल में होता है न, वहाँ कोई नहीं देखता। मेरे दिल में कोई भावनाएँ नहीं थीं, वे छोड़कर चली गई हैं। कुछ समझ में नहीं आता था कि क्या और कैसे महसूस करूँ। इस बात को अपनाने में मुझे डेढ़ साल लगे। समझ में ही नहीं आता था कि कैसे प्रतिक्रिया करूँ, तो कोई हँसाता था तो हँसने लगती थी, कोई रुलाता था तो रो लेती थी, लेकिन मेरी माँ के जाने के बाद बहुत सारी समस्याएँ होने लगीं। मेरे पापा और भैया का व्यवहार मेरे प्रति बदल गया और बहुत ही कठोर हो गया। और उनके व्यवहार की वजह से मानसिक और शारीरिक परेशानियाँ बढ़ गईं। मुझे कुछ समझ ही नहीं आता था कि क्या हो रहा है। एक तो मम्मी के जाने का दर्द था, और ऊपर से मुझे संभालने की बजाय बहुत सारे लोगों ने जो व्यवहार दिखाया, मुझे उम्मीद नहीं थी कि वे लोग ऐसा कुछ करेंगे, तो सब कुछ अचानक से हुआ। मुझे समझ ही नहीं आता था। मेरी ज़िंदगी जैसे मुर्दे जैसी हो गई थी। उससे मेरा दिल बुरी तरह से टूट गया था।

मेरी माँ के जाने के बाद मुझे लगा कि शायद अब मेरा बड़ा भाई मेरी माँ की तरह मेरा साथ देगा और सुधर जाएगा, पर नहीं, वह मेरी बहुत बड़ी गलतफहमी थी, जो उसने तुरंत ही यह कहकर दूर कर दी कि अब तुम्हें कौन बचाएगा, अब तुम्हारी माँ भी नहीं रही तुम्हें मुझसे बचाने वाली। भले ही उसने यह बात मज़ाक में कही थी, पर बहुत जल्दी उसने अपनी बात को वास्तविकता में बदल दिया। और माँ के जाने के बाद से ही मुझे संभालने और साथ रहने की बजाय वह हर बार मुझ पर नियंत्रण करने लगा—चिल्लाना, चीखना, गुस्सा करना, मारना-पीटना और हर बात पर पीछे पड़ जाना कि तुमने आखिर ऐसा कहा कैसे। वह हर बात की पूरी बारीकी निकालने लगता था—कब देखा, दिन कौन सा था, समय क्या था, कब हुआ, क्या किया—सब कुछ विस्तार से बताओ मुझे। और अगर मैं नहीं बता पाती तो बहुत ज़ोर से मारता था, बहुत मारता था।

उसे बहुत गुस्सा आता था, वह मुझे ताने मारता, मुझे नीचा दिखाता। हर बात में कहता कि तुम कभी किसी चीज़ में अच्छी नहीं थी—न पढ़ाई में, न ही खेल-कूद में। तुम्हें कुछ नहीं आता, कोई कौशल नहीं है तुम्हारे अंदर। जब मैं कहती कि है और गिनाती, तो वह उनमें कमियाँ निकालता और कहता कि तुम्हें लगता है कि तुम ज़िंदगी में कुछ कर पाओगी? और फिर कभी-कभी बहुत अच्छी-अच्छी बातें करता, बाहर ले जाता, कुछ खिलाता-पिलाता या खिलवाता और बहुत मीठी बातें करता। और मैं उसकी बातों में आ जाती थी। फिर वह मुझसे पूछता कि मुझे बताओ कि क्या करना है तुम्हें ज़िंदगी में, क्या बनना चाहती हो, क्या सोचती हो कि अगले पाँच साल के बाद खुद को कैसे देखती हो। और कहता कि भैया को नहीं बताओगी तो किसे बताओगी, मेरे अलावा है ही कौन तुम्हारा, और ये पापा तो वैसे भी कुछ समझते नहीं। मुझे बताओ।

और मैं उसकी ये बातें सुनकर हर बार यही सोचती थी कि वह सुधर गया है और ज़िम्मेदार बन रहा है, और हर बार बता देती थी। वह सुनकर कुछ देर शांत हो जाता था और फिर से उसी तरह से करने लगता था—अच्छा, तो तुम्हें लगता है कि तुम कर पाओगी? मैं हाँ कहती, तो वह बोलता कि क्या उपलब्धियाँ रही हैं तुम्हारी आज तक, क्या कर लिया तुमने। मैं कहती कि अभी कुछ नहीं कर पाई, तो क्या हुआ, आगे कर लूँगी, तो वह और भी ताने मारता और बहुत ज़्यादा नीचा दिखाता। हर बात, हर शब्द पकड़ने की आदत थी उसे, तो एक-एक घंटे तक बहस करता। फिर कुछ बोलो या चुप रहो, दोनों ही स्थिति में मारता। बोलो तो कहता कि मैं बात कर रहा हूँ न, दो मिनट चुप तो रहो, बोलने तो दो, और ऐसा करके बोलने का मौका ही नहीं देता था, खुद ही एक-एक घंटे तक बोलता रहता था। और अगर नहीं बोलो तो कहता कि कुछ तो बोलो, कुत्ता भौंक रहा है। मेरे पापा मुझे मारते नहीं थे, पर मानसिक प्रताड़ना पूरी देते थे।

तो मेरी माँ के जाने के बाद थोड़ा संभलकर मैंने कोशिश की कि मैं भी उनकी तरह बनूँ, घर के काम सीखूँ। तो सुबह जल्दी उठने की कोशिश की, तो पापा उठने नहीं देते थे। और काम करने की कोशिश करूँ तो गाली देते थे—दूर रहो, तुमसे नहीं बनेगा, तुम क्या कर पाओगी। और नहीं तो धक्का मारकर दूर भगा देते थे और चीज़ें छीन-झपट लेते थे। और पूछो कि ऐसा क्यों करते हो, तो कहते—मैं ऐसा ही हूँ, बहुत ज़िद्दी हूँ, मुझे करने दो, तुम जाओ, तुमसे तो कुछ भी नहीं आता है। ऐसा बोलते थे। मुझे समझ में नहीं आता था कि वे ऐसा क्यों करते हैं, उन्हें क्या परेशानी है।

और अगर मैं कर भी देती, तो वही काम उसी वक्त वापस करके कहते थे कि तुमने अच्छे से नहीं किया था। पूरे दिन ऐसा जताने की कोशिश करते थे जैसे उनके बिना मैं कुछ नहीं कर सकती। वे मेरी माँ को भी बहुत परेशान करते थे, उन्हें बहुत गालियाँ देते थे, हर बात में। और उनके साथ भी यही करते थे कि सबके सामने ऐसा दिखाने की कोशिश करते थे कि वे बहुत परेशान रहते हैं।

और उनके साथ भी, और न ही मेरे भाई के साथ—मैं सिर्फ अपनी मम्मी के साथ ही सबसे करीब थी। वही सब कुछ थीं। पर फिर भी मेरे पापा थे, लेकिन वे हर बात पर मेरे पीछे पड़े रहते थे, पूरे दिन लगातार बोलते रहते थे। कहीं भी जाना हो या न जाना हो, और अगर मुझे नहीं जाना होता था, तो वे गिड़गिड़ाने लगते थे चलने के लिए, और मतलब पीछे ही पड़े रहते थे जब तक कि मैं ‘हाँ’ न कर दूँ। बार-बार मना करने के बाद भी वे ऐसा करते, लगातार बोलते रहते थे।

मेरे पापा और भैया दोनों ही बहुत ज़्यादा स्वार्थी और असंवेदनशील थे और उनके अंदर भावनाएँ बिल्कुल भी नहीं थीं। और उन दोनों के बीच मैं बहुत ज़्यादा देखभाल करने वाली, संवेदनशील और भावुक थी। मैं अपनी भावनाओं को बिल्कुल भी संभाल नहीं पाती थी। मैं कभी नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से उन्हें कोई भी परेशानी हो या वे मुश्किल में पड़ें। मैं बस शांति की तलाश में थी और हर जगह शांति ढूँढ़ती थी। बहुत सारे अलग-अलग तरीके आज़माए, पर कोई हल नहीं मिला।

जैसे फिल्मों में होता है न, एक बेचारी लड़की होती है और फिर उसे बचाने एक राजकुमार आता है, उस समय जब मैं 22–23 साल की थी, तो यह मेरे भी दिमाग में था, पर धीरे-धीरे सारी गलतफहमियाँ दूर हो गईं। बहुत कोशिश की। शुरू में लगता था कि शायद मेरी ही गलती है, मैं ही इन्हें समझ नहीं पाई, मुझसे ही कोई गलती हुई है, तो मैं खुद को सुधारने की कोशिश करती थी, हर तरीके से, शांति से, नए तरीकों से।

पर नहीं, हर बार समझ में आता है कि मैं अकेले कुछ भी नहीं कर सकती। ताली एक हाथ से नहीं बज सकती। जब आखिरकार समझ में आया कि जब तक सामने वाला नहीं चाहेगा, तब तक कुछ भी नहीं हो सकता किसी रिश्ते में। रिश्ते दोनों तरफ से बराबर कोशिश करने से बनते हैं।

इन सब का मुझ पर क्या असर हुआ—तो जब मेरे भाई मुझे मारते थे, तो मुझे कई बार बहुत ज़्यादा चोट लग जाती थी। वह मेरा हाथ मोड़ते थे, सिर दीवार में मारते थे, गला दबाते थे। जिस भी तरह से मारते थे, उसके बाद उस हिस्से में मुझे बहुत परेशानी होती थी। मेरा हाथ मुड़ता नहीं था, बहुत ज़्यादा दर्द होता था या सीधा नहीं होता था। हाथ से कोई काम नहीं हो पाता था और हफ्तों तक यह समस्या रहती थी। किसी को इन बातों से कोई मतलब नहीं था। सिर में दर्द रहता था या शरीर के किसी भी हिस्से में हफ्तों तक दर्द बना रहता था। मुझे बहुत दर्द होता था, कई-कई हफ्तों तक। न ठीक से सो पाती थी, न उठ-बैठ पाती थी।

वे दोनों ही भावनाहीन थे। मेरा भाई मेरे दर्द और रोने को अभिनय बताता था, कहता था कि यह नाटक कहीं और जाकर करो। उस समय मैंने थिएटर जॉइन किया था, वहाँ अच्छा लगता था, थोड़ा मन बहल जाता था मेरा, पर मेरे भाई ने अपने अहंकार में मेरा वहाँ जाना भी बंद करवा दिया था। मुझे बहुत डर लगता था, तो जब भी मैं कोशिश करती अपना दर्द उसे बताने की, तो वह कहता था—यहाँ मत रो, यह नाटक अपने थिएटर जाकर करना।

मैं भी मानसिक रूप से उनकी ही तरह बन गई थी—बहुत चिड़चिड़ी, बहुत गुस्सा करने वाली। हर बात में लालच आ गया था, मैं स्वार्थी हो गई थी, सिर्फ अपने बारे में सोचने लगी थी, सब कुछ उनकी तरह। पर मुझे शांति नहीं मिल रही थी, चाहकर भी नहीं। फिर मैंने खुद से प्यार करने की कला को अपनाने की कोशिश शुरू की। मुझे नहीं पता था कि यह क्या होता है। और सबसे बड़ी समस्या यह थी कि मेरे पास नौकरी भी नहीं थी, तो उसके भी ताने मिलते थे। इतने सालों में कौशल सीखने की भी बहुत कोशिश की मैंने, पर नहीं सीख पाई, क्योंकि मेरे भाई मुझे कुछ करने नहीं देते थे। हर बात में उन्हें समस्या थी—चाहे मैं बैठी हूँ, सो रही हूँ, टीवी देख रही हूँ, मोबाइल चला रही हूँ, चित्र बना रही हूँ, कुछ सीखने की कोशिश कर रही हूँ, लिख रही हूँ या पढ़ रही हूँ—उन्हें हर एक चीज़ से परेशानी होती थी।

ऐसा नहीं था कि मेरी नौकरी नहीं लग रही थी, तो उसकी वजह से परेशानी थी, बल्कि उन्हें तो हर बात से ही परेशानी होती थी। मुझे कभी समझ नहीं आया कि असली समस्या क्या थी, वह ऐसा क्यों करता था। मैंने बहुत कोशिशें कीं, पर वे दोनों ही मुझे आगे बढ़ने या कुछ करने नहीं देते थे। इसलिए मेरे पास नौकरी भी नहीं थी। मुझे डर लगता था कि खुद से प्यार करने की कला में क्या-क्या करना होता होगा, लेकिन मैंने थोड़ा खोजकर, छोटे स्तर से इसे अपनाने की कोशिश की।

मैंने अपनी कमियाँ और बुराइयाँ निकालीं और उन पर काम किया। एक-एक करके सब हटाने की कोशिश की, क्योंकि मैं बचपन में ऐसी नहीं थी। मैं बचपन में बहुत ही अच्छी लड़की थी और मैं ऐसी नहीं बनना चाहती थी, क्योंकि मैंने जो सहा, वह मैं नहीं चाहती थी कि कोई दूसरा भी सहे।

फिर भी बहुत सारी बातें हैं जिन्हें यहाँ बता पाना या अपने दर्द और संघर्ष को व्यक्त कर पाना बहुत मुश्किल है। लेकिन अब मैं उनसे दूर हूँ और खुश हूँ। मैं अपने आप को बदल रही हूँ। अब मैं वैसी गुस्सैल या चिड़चिड़ी नहीं हूँ, मैं शांत हूँ और मुझमें थोड़ा ठहराव है। और भी प्रयास कर रही हूँ—अपने आप को ढूँढ़ने की, बदलने की, पाने की, समझने की। अभी भी सब कुछ ठीक नहीं हुआ है, पर मैंने कभी हार नहीं मानी—न तब, न अब।

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