Source:  Joábel Pires on Pexels.com

औरत की सबसे बड़ी चाहत उसके बच्चे होते हैं, इसमें कोई शक नहीं है। एक औरत बच्चों के लिए सदा सबके आगे झुक जाती है, खुद को भी वो दांव पर लगा देती है। बच्चे सबसे बड़ी कमजोरी होते हैं उसकी, पर बात जब उन्हीं बच्चों पर आती है तो उनके लिए वो चंडी का रूप धर लेती है और अकेली ही सबके सामने दीवार के जैसे खड़ी हो जाती है। ये कहानी कहानी नहीं, एक सच्एचाई है—क ऐसी ही औरत की।

मनु बहुत ही हंसमुख और बातूनी लड़की थी। बिना बात हंसना, किसी से भी कहीं भी बस बोलते रहना, यह खूबी थी उसमें। बोलने में भी कि सबको अपना कर ले, दिखने में ठीक-ठाक थी, कोई कमी ऐसी थी कि हर कोई उसे पाने की तलब रखता था। उसकी चाहत बस किसी एक का दिल से होकर उसकी रूह में समाना था। कहा जाए तो वो जितनी मासूम थी, उतनी ही मासूम उसकी ख्वाहिश थी। वो चाहती थी बस कोई ऐसा हो जो उसे चाहे, ना कि उसके जिस्म को।

अचानक एक दिन ऐसे ही उसे पता चलता है उसके घर वालों ने उसकी शादी तय कर दी है। चाहत तो उसकी भी थी कि कोई उसे चाहे और वो उसे, फिर उसकी शादी हो, पर फिर सोचा चलो हो सकता है जिससे शादी तय हुई हो वो वही शख्स हो जैसा वो चाहती है।

आखिर शादी होकर मनु अपने ससुराल आ गई। सबका दिल जीत लिया उसने अपनी कोशिशों से, यूं तो, पर शायद जैसा जीवन साथी वो चाहती थी ये वो था ही नहीं। इस शख्स को तो बस जिस्म की भूख थी। हर वक्त भूखे भेड़िए की तरह उसे नोचता, मनु की मर्जी उसके लिए कोई मायने नहीं रखती थी। मनु उसके लिए बस सोने और खाना बनाने की कोई मशीन थी जैसे। अंदर ही अंदर घुट रही थी मनु। तभी उसे पता चलता है वो मां बनने वाली है। उसे लगता है कुछ वक्त सुकून से बीतेगा अब, पर वो वहशी था, शायद उसको इस हालत में भी मारना-पीटना उसने शुरू कर दिया। मनु की आत्मा तक को नोच लिया था जैसे।

मनु किसी से अपना दर्द कहती तो सब कहते बच्चा हो जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा।

बेटा हुआ है मनु, मुबारक हो। मनु होश में आई तो सब बार-बार उसे बधाई दे रहे थे। उसे लगा शायद अब उसके दुख शायद कुछ कम हो जाएंगे।

मनु को घर पर आए कुछ दिन ही हुए थे, पर वो वहशी ऐसी हालत में भी मनु को मारने-पीटने से बाज नहीं आता। मजाक करते-करते कब वो भड़क जाता और बिना वजह किसी का भी गुस्सा मनु पर निकलता। अब तो हद ही हो चुकी थी। जैसे-जैसे मनु का बेटा बड़ा हो रहा था, उसकी जरूरतें बढ़ रही थीं और मनु उन जरूरतों के लिए पैसे मांगती तो पहले उसे शर्त रखी जाती सोने की। ना वक्त, ना आदमी, किसी भी वक्त चालू हो जाता था वो हैवान।

घर की जरूरतें हों या बच्चों की, हर जरूरत पूरी करने के लिए पहले मनु को नंगा होना पड़ता उस शैतान के आगे। ऐसा करते-करते वक्त बीत रहा था और मनु बस टूट रही थी अंदर से। एक बार फिर मनु मां बनने वाली थी।

अबकी बार उसे एक बेटी हुई। बेटी को देख मनु को उसमें अपनी छवि दिखी। मनु ने सोच लिया था जो जिंदगी उसने जी है वो जिंदगी उसकी बेटी को नहीं जीने देगी। वो अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर कुछ बनाएगी और उसका जीवनसाथी उसकी बेटी खुद चुनेगी।

धीरे-धीरे उसकी बेटी भी बड़ी होने लगी, पर ना उसके पति की आदतों में सुधार तो हुआ नहीं, उल्टा मनु को जो थोड़ी बहुत आने-जाने, लोगों से मिलने पर खुशी मिलती थी, वो भी छीन ली गई। उसकी आजादी पूरी तरह खत्म कर दी थी, जैसे कि मनु इंसान नहीं एक खिलौना हो बस।

मनु जितनी सीधी थी, उसकी बेटी उतनी ही तेज और मां की हालत वो अच्छे से समझती थी। छोटी उम्र में ही बड़ी हो गई थी मनु की ये गुड़िया।

एक बार गुड़िया को खेलता देख उसका पति बोला, इसे गीता सिखाओ, काम कराओ, घर के सिखाओ कि पति भगवान होता है, वरना जूते खाएगी ससुराल में। वैसे भी इसके 18 का होते ही मैं इसकी शादी कर दूंगा।

ये सुन मनु की जान निकल गई। इतनी कम उम्र में शादी? मेरी गुड़िया भी मेरी जिंदगी जिएगी क्या अब?

मनु ये सोच ही रही थी कि गुड़िया की आवाज आई, "अगर सब करके भी मम्मी जूते खाती है तो मैं क्यों कुछ करूं, सीधे जूते ही खा लूंगी।"

गुड़िया का ये जवाब सुन मनु का पति फिर बिना वजह उस पर टूट पड़ा।

मनु के कानों में बस एक ही बात घूम रही थी—18 का होते ही गुड़िया की शादी। नहीं, नहीं, वो गुड़िया को ऐसी जिंदगी नहीं दे सकती।

अब मनु आवाज उठाने की सोच ली थी और एक रिपोर्ट उसने अपनी पंचायत में डाल दी। पंचायत बैठाई गई, पर हर पंचायत की तरह मनु को भी बच्चों का वास्ता देकर समझाया गया और धैर्य रखने को कहा गया।

मनु के इस कदम से उसके पति के अहम को ठेस पहुंची। उसने मनु के साथ और बद से बदतर सलूक करना शुरू कर दिया। उसने मनु की कमजोरी—उसके बच्चे—जानकर मनु को कहा, "तुम खुद मौत को गले लगा लो तो सही है, वरना मार तो तुम्हें वैसे भी मैं दूंगा। पर तुम खुद मरती हो तो तुम्हारे बच्चे किसी के मोहताज नहीं होंगे, वरना उनको भी मैं खाने को मोहताज कर दूंगा।"

मनु देख रही थी उस आदमी को और सोच रही थी—एक जानवर भी अपने बच्चों के साथ ऐसा नहीं करता जैसा ये आदमी कर रहा है। कौन कहेगा ये आदमी एक बाप है।

वो तो मां थी। बच्चों की खातिर खुद को मारने को भी तैयार हो गई। तीन बार उसे जहर दिया गया और वो चुपचाप उसे पी गई, पर कहते हैं ना जिंदगी हो या मौत सब ऊपर वाले के हाथों में होती है। मनु को कुछ नहीं हुआ उस जहर से, तीनों बार बच गई।

अब उसे छत से कूदने के लिए उकसाया जा रहा था। तभी गुड़िया के कानों में बात पड़ी और गुड़िया चुपचाप मनु के पास बोली, "आप उस आदमी के कहने पर हमारे लिए मर सकती हो तो हमारे कहने पर जीना सीख लो मम्मी। ऐसा कुछ मत करना आप।"

अब मनु ने सोच लिया था—वो जिएगी अपने बच्चों के लिए और खुद के लिए।

मनु के इस फैसले से उसका पति सकपका गया और हर तरह से बस मनु को सबकी नजरों में पागल साबित कर अलग करना चाहता था।

मनु में लिखने की बहुत कमाल आदत थी। ये गुड़िया को पता थी। उसने कई पब्लिकेशन से बात कर और मामा की मदद से मम्मी की लिखी कहानियों की एक किताब प्रकाशित करवा दी।

रातों-रात सीधी-सादी मनु अब एक ऑथर बन चुकी थी। लोग काफी पसंद कर रहे थे उसकी लिखी किताब को।

आगे भी गुड़िया ने कई प्रतियोगिताओं की जानकारी निकाल अपनी मम्मी को जबरदस्ती उनमें हिस्सा लेने के लिए मनाया। ऐसे कई प्रतियोगिताएं जीतकर मनु अब कई बड़े-बड़े सम्मान हासिल कर चुकी थी।

मनु में बात-बात में कविता गुनगुनाने की आदत थी। ये देख गुड़िया ने वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए भी मनु का नामांकन भर दिया।

और ऊपर वाले की लीला देखिए—जिसे सब उसके पति के कहने पर पागल समझ रहे थे, वो अपने शहर की पहली वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने वाली सदस्य बन गई।

अब उसकी इज्जत बन चुकी थी।

बस सब पाकर भी जो उसने नहीं पाया था वो थी आजादी, क्योंकि उसका पति चाहता था वो बिना कुछ लिए अलग हो जाए।

पर अब मनु अपने और अपने बच्चों के हक के लिए सबके आगे एक मजबूत दीवार सी खड़ी थी। एक अकेली, शांत सी, सीधी सी मनु पूरे शहर की पंचायत के फैसले से लड़ी, अपने हक, अपनी पहचान और बाकी महिलाओं के लिए प्रेरणा मिसाल बनी—जो खुद में सब फिल्मी लगता है।

ये शायद सभी को कहानी लगे, पर ये हकीकत है मेरी खुद की, जो औरतों के लिए मिसाल मानी जाती आज शहर में, जिसे कभी पागल कहकर निकाल दिया गया था।

हमें जिंदगी सिखाती है कि उम्र कोई भी हो, शुरुआत कहीं से भी हो सकती है।

औरत जितनी नाजुक है, उतनी ही मजबूत भी। बस जैसा वक्त और हालात उसे बनाते हैं, वो वैसी ही बन जाती है।

.    .    .

Discus