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किसी कार्य की शुरुआत में उससे जन्म लेने वाला उत्पाद उसके रचयिता को अधिकतर ही सबसे मज़बूत नींव वाला लगता है, उसका विकास और उससे प्रभावित होने वाले जीवों को उसके उत्पाद का सु-फल ही मिलेगा, यह भरोसा आविष्कारक को होता ही है। लेकिन इस ऊँचे किनारों वाले कटोरा रूपी समाज में मुट्ठी भर ही लोग हैं जो यह आकलन कर पाते हैं कि इस समाज के सुधारक के रूप में सबसे उचित और कारगर क्या हो सकता है। यानी कि उस समय के society की क्या ज़रूरत और माँग है, और यह भी वे बखूबी समझते हैं कि इस रास्ते में अगर चलना तय कर लिया है, तो फिर पीछे छूटे निशानों की तरफ़ वापस नहीं लौटा जा सकता। उन्हें आगे बढ़ते हुए वे कदम-चिह्न स्थापित करने हैं, जिनके ज़रिए और भी लोग अपना जीवन इस समाज को दे सकें, उन्हें जो आज तक मिला है उसका ऋण चुका सकें क्योंकि जहाँ वे आज खड़े हैं, वहाँ तक आने का सफ़र लाखों साल पहले अलग-अलग जीवों ने शुरू कर दिया था, जिसके फलस्वरूप आज का यह समाज इतना लंबा सफ़र तय कर चुका है और आज भी हर सीमाओं को तोड़ने की ताक़त रखता है। इन्हीं पूर्व में बनी सीमाओं को तोड़ना बेहद ज़रूरी भी है, क्योंकि इसमें खड़े ढाँचों को सुधार पाना अब मुमकिन नहीं है, उनकी नींव ही ऐसे विचारों से बनी है जिनके सामने पूरी तरीके से नया विकल्प खड़ा करना एक मात्र उपाय है। नए विकल्प का आधार और उसका रास्ता सिर्फ़ संघर्ष से होकर ही गुज़रता है, अगर उससे बचकर कोई यह समझता है कि बिना संघर्ष किए वह सामाजिक परिवर्तन ला सकता है, तो वह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी। यह संघर्ष भी ज़मीनी होना बहुत महत्वपूर्ण है – हाँ, संघर्ष के और भी धड़े हो सकते हैं और होते भी हैं, लेकिन रोज़मर्रा की छोटी-बड़ी कुरीतियों को तोड़ना बेहद अहम है।

आख़िरी से पहले की शुरुआत

आज से साढ़े-पाँच साल पहले मध्य प्रदेश के एक शहर इंदौर में रहने वाले पत्रकार सौरव बैनर्जी ने शहर के ऐशो-आराम और स्थायी नौकरी को छोड़कर फिर से पीछे जाने का सोचा, यानी कि एक गाँव शुक्रवासा में, जो कि देवास जिले में स्थित है। भारत के अधिकतर गाँव वर्तमान समय से पीछे ही हैं, वहाँ आज भी मूल चीज़ों का अभाव है, सोच में आज भी वही सिकुड़न है। मानो उनका समय किसी ने पकड़ कर रखा हो और उसे छोड़ने का नाम नहीं ले रहा हो, लेकिन ये हालात उनकी हैं जो मेहनत से, अपने श्रम से पैसे कमा रहे हैं, जो शोषित हैं – उन्हें रोज़गार, जातिगत और वर्ग उत्पीड़न, चिकित्सकीय अभाव रोज़ाना झेलना पड़ता है। जिनके घरों में धन के कनस्तर भरे हैं, उन्हें मूल चीज़ों का अभाव नहीं झेलना पड़ता है, बल्कि वे वंचित रखा करते हैं उन्हें जिन्हें वे अपनी जागीर समझते हैं। इन्हीं कसी हुई बेड़ियों को तोड़ने के लिए, ज़मीन पर रहकर हर दिन बदलाव करने के लिए बनर्जी ख़ुद और उनकी विचारधारा से गठित उनका संगठन हाउल को लेकर यहाँ पर जा बसे। शहर की इमारतों में लगे मखमली पर्दों के पीछे रहने वाले लोग यह बखूबी जानते हैं कि उनके पड़ोसी गाँव में लोगों की ज़िन्दगी कितनी जर्जर है, लेकिन वे अक्सर अपने आराम और खोखली ज़िंदगी के बीच उन्हें अनदेखा कर दिया करते हैं। पर हाउल ने सारे आराम को दरकिनार कर शुक्रवासा में काम करना कोई दया या दान से बढ़कर अपनी ज़िम्मेदारी समझा। हाउल ने जाते ही जाति प्रथा के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाई और हर वर्ग, जातियों के साथ उठना-बैठना शुरू किया, सभी को एक छत के नीचे लाकर काम के आधार पर एक करने के विचार को गाँव वालों के भीतर सींचा। यह समय था कोविड का, जब सभी जगह रोज़गार था ही नहीं, ऐसी मुश्किल के समय में हाउल की टीम ने वहीं के मजदूरों के साथ एक सामूहिक पुस्तकालय खोलने का सोचा और हाउल को गाँव के मज़दूरों और किसानों का साथ मिला। इस ढाँचे को खड़ा करने के लिए वहीं के लोगों से पुरानी लकड़ियाँ खरीदीं और साथ ही उन्हें उनकी मजदूरी के पैसे भी दिए, जिससे वे उस समय अपने घर को चला सकें। इस काम ने सभी गाँव वालों को एकजुट किया और सभी ने एक-दूसरे की मुश्किलों का साथ निभाया। शुक्रवासा में ढंग के सरकारी विद्यालय भी नहीं हैं और जो हैं भी, उनमें पढ़ाने वाले शिक्षक अपने दूसरे ही रोज़गार में मशगूल हैं, ऐसे में फिर उन बच्चों के लिए वही स्थिति फिर से पैदा होती है जहाँ फिर से उन्हें ज़िल्लत की ज़िंदगी जीनी पड़ेगी, फिर वे दूसरों का मैला ढोने के लिए तैयार होंगे। शोषित होना ही उनकी ज़िंदगी का एक मात्र सच बन जाएगा और फिर यही आगे जाकर वे अपनी क़िस्मत मान लिया करते हैं। इन सबको पछाड़ कर आगे आने की शुरुआत पढ़ाई से होती है, इसीलिए सामूहिक पुस्तकालय के बच्चों को भी पढ़ना शुरू किया और साथ ही जो यह समझते हैं कि पढ़ाई की कोई उम्र होती है, उनका हाथ थामकर उन्हें भी शिक्षा की दुनिया में दाखिल करवाया। यह पढ़ाई सिर्फ किताबों तक ही सीमित नहीं रही, उन्हें कला का भी प्रशिक्षण दिया गया। जैसे नृत्य और ड्राइंग की रोज़ शाम में क्लास आयोजित कराई जाती थी, उसी के साथ उनके लिए उनकी ही ज़िंदगी पर आधारित नाटक लिखे गए और उन्हें उसे लिखना भी सिखाया गया। यह शिक्षा उन्हें उनके हक के बारे में भी जागरूक करने की शुरुआत थी, जिसकी वजह से शुक्रवासा के लोगों ने सवाल पूछना शुरू कर दिया, उन लोगों से जो उनके हक़ को कई अरसों से मार रहे थे। पंचायत स्तर पर सचिव, कोषाध्यक्ष और सरपंच को समझाया गया कि पूरे गाँव के लिए समान रूप से काम करना उनकी ज़िम्मेदारी है, चाहे वे किसी भी जाति या वर्ग के हों। गाँव के राशन वितरण के घोटाले पर सवाल उठाए गए और राशन केंद्रों पर निगरानी रखना शुरू की गई, जिसके चलते राशन वितरण की स्थिति में काफ़ी सुधार आया। गाँव ने मिलकर एक समिति का गठन किया जो गाँव के विकास के मुद्दों को लेकर बात करती और साथ ही उसका हल भी सभी साथ मिलकर निकालते और उस पर काम भी करते। ऐसे कितने ही लोग होंगे जो आज के समय में अपना जीवन सबसे दबे और पिछड़ों के नाम करते हैं, हमारे समाज को सौरव और उनकी युवा टीम जैसे व्यक्तियों की बेहद ज़रूरत है, तभी तो गाँवों की परिभाषा बदल पाएगी, भारत एक प्रगतिशील देश के रूप में उभर पाएगा। अगर ऐसी ही समितियाँ, ऐसे स्कूल और खुल सकें, तो भारत को एक उन्नत भूमि बनकर उभरने से कोई नहीं रोक सकता है। क्या आपको ऐसा नहीं लगता? यह सिर्फ़ एक कहानी मात्र नहीं, बल्कि एक सोच है जो हर एक सक्षम व्यक्ति को अपनानी चाहिए।

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