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जिंदगी कभी-कभी ऐसे कठिन इम्तिहान लेती है जहाँ इंसान अंदर से टूटकर बिखर जाए, मगर एक माँ की ममता उन तूफानों से भी अपनी औलाद को खींच लाती है जहाँ मौत साए की तरह साथ चल रही हो। यह कहानी मेरी अम्मी और मेरी सबसे बड़ी बहन 'जहाँ दीदी' के उस दर्दनाक और खौफनाक सफर की है, जिसे याद करके आज भी रूह कांप उठती है।

शुरुआती दिन और खुशियों का दौर

मेरी सबसे बड़ी बहन जहाँ दीदी जब 18–19 साल की थीं और उन्होंने अपनी 12वीं की पढ़ाई पूरी की थी, तभी उनकी शादी हमारे ही एक करीबी रिश्तेदार में तय कर दी गई। वह मेरे मामा के साले थे। ससुराल बहुत बड़ा और भरा-पूरा खानदान था। घर में छह भाई थे, जिनमें दीदी के शौहर तीसरे नंबर पर आते थे। दो जेठानियाँ थीं और दो देवर थे।

पूरे खानदान में दीदी इकलौती थीं जिन्होंने 12वीं तक साइंस विषय से पढ़ाई की थी। उनका सलीका, तहज़ीब, सादगी और हर काम को कायदे से करने का तरीका सबका दिल जीत लेते थे। ससुराल में सभी उनकी बहुत इज्जत और मोहब्बत करते थे। शादी के दो साल बाद उनके आँगन में एक नन्ही परी आई, जिसका नाम हमने 'उज़्मा' रखा। जिंदगी बहुत खूबसूरत गुजर रही थी। शौहर का साथ, बच्ची की किलकारियाँ और भरा-पूरा परिवार—सब कुछ मुकम्मल लग रहा था। मगर किसी को क्या मालूम था कि मुकद्दर के पन्नों पर खामोशी से कोई दर्दनाक दास्तान लिखी जा रही थी।

बीमारी का साया और रिश्तों की बेरुखी

शादी के लगभग पाँच साल बाद दीदी की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। डॉक्टरों ने जाँच के बाद बताया कि उन्हें आंतों का अल्सर (Ulcerative Colitis) है। आंतों में छालियाँ और जख्म हो चुके थे, जिनकी वजह से लगातार ब्लीडिंग होती थी। यह बीमारी धीरे-धीरे दीदी को अंदर ही अंदर दीमक की तरह चाटने लगी। उनके घने बाल झड़ने लगे, चेहरे की रौनक चली गई और 5 फुट 5 इंच की खूबसूरत कद-काठी वाली दीदी सूखकर हड्डियों का ढांचा बन गईं। दिन भर ब्लीडिंग और दस्त की वजह से वह इस कदर कमजोर हो गईं कि बिस्तर से उठने के काबिल भी न रहीं।

बीमारी जब दो साल से ज्यादा खिंच गई, तो ससुराल वालों का सब्र और प्यार जवाब देने लगा। एक दिन उनके शौहर दीदी और तीन साल की मासूम उज़्मा को हमारे घर छोड़ गए और कह गए कि "तबीयत संभलते ही आकर ले जाऊँगा।" मगर वह दिन फिर कभी नहीं आया।

उस वक्त हमारे अपने घर के हालात भी बहुत नाजुक थे। मँझली बहन का तलाक हो चुका था, दादाजी को पैरालिसिस हो गया था और वह दो साल बिस्तर पर रहकर हाल ही में दुनिया से रुखसत हुए थे। आर्थिक तंगी के चलते हमें अपना पुराना किराए का मकान छोड़ना पड़ा था और हम सब दूसरे शहर में एक छोटे से कमरे में रहने को मजबूर थे। अब्बा मजदूरी करते थे, हम बहनें भी हाथ बँटाती थीं। घर में जो थोड़े-बहुत पैसे आते, उनमें या तो एक वक्त की रोटी बन पाती थी या दीदी की दवा आती थी। उस मुफलिसी में भी अम्मी ने कभी हिम्मत नहीं हारी।

साल 2002: जित्री का अस्पताल और दंगों की आग

साल 2002 का दौर था। दीदी की इस बीमारी को करीब साढ़े चार साल हो चुके थे। तभी हमारे एक नेक दिल पड़ोसी ने बताया कि 'जित्री' नाम के गाँव में एक बड़ा अस्पताल है, जहाँ आंतों की बीमारियों का बहुत बढ़िया इलाज होता है। अम्मी के पास पैसे नहीं थे, तो उन भले पड़ोसी ने खुद एक टैक्सी का इंतजाम किया और रास्ते के लिए खाने-पीने का सामान भी पैक करवाया। अम्मी दीदी को लेकर जित्री के अस्पताल पहुँच गईं और वहाँ इलाज शुरू हुआ।

मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था। वहाँ पहुँचे चार-पाँच दिन ही हुए थे कि अचानक गुजरात में गोधरा कांड हुआ और पूरे सूबे में दंगों की भयानक आग भड़क उठी। अस्पताल के डॉक्टरों और स्टाफ के हाथ-पाँव फूल गए। उन्होंने साफ कह दिया, "हालात बेकाबू हो चुके हैं, हम किसी की सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं ले सकते। आप लोग अपने-अपने रिस्क पर तुरंत यहाँ से निकल जाइए।"

एक माँ का फौलादी हौसला

अस्पताल से बाहर निकलते ही मालूम हुआ कि दूर-दूर तक कोई गाड़ी या बस नहीं चल रही है। किसी ने बताया कि यहाँ से दो-तीन किलोमीटर दूर एक बस स्टैंड है, शायद वहाँ कोई बस मिल जाए। दीदी इतनी कमजोर थीं कि अपने पैरों पर खड़ी भी नहीं हो सकती थीं।

उस खौफनाक मंजर में अम्मी ने जो किया, वह सिर्फ एक माँ की ममता ही कर सकती है। तीसरे माले पर रखे बिस्तर और सामान के दो भारी बैग अम्मी पहले सीढ़ियों से नीचे उतारकर बेसमेंट में लाईं। फिर दोबारा तीसरी मंजिल पर चढ़कर गईं और अपनी 5 फुट 5 इंच लंबी, बीमार जवान बेटी को दोनों हाथों में एक नन्हे बच्चे की तरह गोद में उठाया और नीचे लेकर आईं। दीदी को बेसमेंट में बैठाकर बोलीं, "तू यहीं बैठ, मैं बस का पता करके आती हूँ।"

अम्मी ने दंगों के उस खौफ के बीच 1-2 किलोमीटर का फासला पैदल तय किया और बस स्टैंड का पता लगाया। पहले वह सामान उठाकर बस स्टैंड छोड़ आईं, फिर वापस अस्पताल आईं और दीदी को दोबारा अपनी गोद में उठाकर उस वीरान सड़क पर दो किलोमीटर पैदल चलकर बस स्टैंड पहुँचीं। जब एक बस आई, तो अम्मी ने दीदी और सामान को ऊपर चढ़ाया।

सफर किसी मौत की घाटी से गुजरना जैसा था। रास्ते में बस पर पथराव हुआ, दंगाई हमला करने की फिराक में थे। मगर उस बस के ड्राइवर और कंडक्टर ने इंसानियत की मिसाल पेश की। उन्होंने कहा, "हम धर्म नहीं देखते, हम आप सबकी जान बचाकर ही दम लेंगे।" ड्राइवर ने बस की रफ्तार ऐसी बढ़ाई कि हमलावरों को चीरती हुई बस सीधे अहमदाबाद की तरफ दौड़ पड़ी।

सुलगते अहमदाबाद में मौत को मात

बस ने अम्मी को गीता मंदिर के पास एक सुनसान कोने में उतारा, ताकि किसी उपद्रवी भीड़ की नजर न पड़े। दूसरी तरफ, घर पर हम तीनों बहनें (14, 17 और 20 साल) और दीदी की 5 साल की मासूम बच्ची उज़्मा डर के मारे एक-दूसरे से चिपटकर रो रही थीं। अब्बा समाज के मर्दों के साथ इलाके में पहरा दे रहे थे। जब भी बाहर से चीख-पुकार का शोर आता, हम उस मासूम बच्ची को सीने से लगाकर छिपने की जगह तलाशते थे। उस जमाने में मोबाइल फोन नहीं थे और दुकानें बंद होने से पीसीओ भी ठप थे। हमें नहीं पता था कि अम्मी और दीदी जिंदा भी हैं या नहीं।

गीता मंदिर के कोने में खड़ी अम्मी को देखकर एक मुस्लिम ऑटो-रिक्शा वाला रुका। उसने कहा, "रास्तों पर कत्लेआम मचा है, जाना मुमकिन नहीं।" मगर अम्मी ने बेबसी से कहा, "भाई, यहाँ खड़े रहे तब भी मारे जाएँगे। अल्लाह पर भरोसा रखो, अगर वो चाहेगा तो हम बच निकलेंगे।" उस ड्राइवर का दिल पसीज गया। उसने कहा, "ठीक है, अगर मरेंगे तो साथ मरेंगे, बचेंगे तो नसीब।"

रिक्शा जैसे ही एक मोड़ पर पहुँचा, सामने सैकड़ों की हिंसक भीड़ तलवारें और पत्थर लिए खड़ी थी। ड्राइवर ने कहा, "रिक्शे को कसकर पकड़ लीजिए, अगर निकल गए तो जिंदगी है।" अम्मी और दीदी ने रिक्शे को मजबूती से थामा। ड्राइवर ने हवा की गति से रिक्शा भगाया। उपद्रवियों के हथियार और लाठियाँ रिक्शे के लोहे पर टकराकर बजती रहीं, पर अम्मी, दीदी और ड्राइवर को खरोंच तक नहीं आई। वह नेक ड्राइवर उन्हें हमारी सोसाइटी के दरवाजे तक सही-सलामत ले आया। जब अम्मी दीदी को लेकर घर पहुँचीं, तो पूरी बस्ती दंग रह गई। यह अल्लाह का एक करिश्मा ही था।

23 जून: वो दर्दनाक इत्तेफाक

दंगों की उस आग से तो अम्मी अपनी बेटी को बचा लाई थीं, मगर दीदी के जिस्म की बीमारी अब आखिरी मुकाम पर थी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था कि उनकी आंतें पूरी तरह छलनी हो चुकी हैं और अब कोई उम्मीद बाकी नहीं है।

मई में दंगे थम गए। जून में हमारी मँझली बहन का दूसरा निकाह तय था, जिसकी तारीख 24 जून मुकर्रर हुई थी। घर में हल्दी और मेहंदी की रस्में हो चुकी थीं। मगर निकाह से ठीक एक दिन पहले, 23 जून को जहाँ दीदी की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ने लगी। शाम को मगरिब के वक्त, करीब 6:30 बजे, दीदी ने अम्मी की गोद में अपनी आखिरी सांस ली।

दर्दनाक इत्तेफाक यह था कि 23 जून वही तारीख थी, जिस दिन पाँच साल पहले दीदी को पहली बार बीमारी का खून आया था। दीदी ने चार दिन पहले ही कहा था, "23 जून को मेरी बीमारी को पूरे पाँच साल हो जाएँगे।" और उसी 23 जून को उन्होंने इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया।

एक तरफ मंझली बहन के हाथों में मेहंदी और हल्दी लगी थी, दूसरी तरफ दीदी का बेजान जिस्म पड़ा था। अम्मी नहीं चाहती थीं कि जिस बेटी ने पाँच साल तक बिस्तर पर असहनीय दर्द झेला है, उसकी रूह को मिट्टी में जाने के लिए अब और इंतजार करना पड़े। रात को 11:00 बजे ही पूरे आंसुओं के साथ जहाँ दीदी को सुपुर्दे-खाक कर दिया गया।

और अगली दोपहर 2:00 बजे, मंझली बहन की बारात आई। घर में न कोई बाजा था, न कोई जश्न, न किसी के बदन पर नए कपड़े। सूजी हुई आँखों और भीगे आँचलों के बीच खामोशी से निकाह की रस्म अदा की गई। एक बहन को कफन ओढ़ाकर विदा किया गया था, तो दूसरी को खामोश आंसुओं के साथ रुखसत किया गया।

यह हमारी जिंदगी की उस किताब का सिर्फ एक पन्ना है, जिसे मेरी अम्मी ने अपने आंसुओं और बेमिसाल हौसले से लिखा था। जहाँ दीदी भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, मगर उस खौफनाक दंगे में एक लाचार माँ का अपनी जवान बेटी को गोद में उठाकर मीलों चलना, ममता की वह अमर दास्तान है जो दुनिया के किसी भी तसव्वुर से कहीं बड़ी है।

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