अध्याय १: मजबूरी की धूप
कहानी समर्पित है मेरी अम्मी 'जैनब' और अब्बा 'नजीर' को…
जिन्होंने जिंदगी के सबसे खौफनाक तूफानों को झेलकर भी हमारे आंगन में मोहब्बत के फूल खिलाए।
और नन्ही नसरीन दीदी की पावन याद को, जिनकी खामोशी आज भी हमारी रूह को जिंदा रखती है।
सूरज अभी पूरी तरह से निकला भी नहीं था कि सात-आठ साल की छोटी-सी जैनब की आँखें खुल जाती थीं। जिस उम्र में मासूम बच्चियों की नींद अपनी माँ की मीठी लोरी और नर्म थपकी से खुलती है, उस नाजुक उम्र में जैनब के कानों में सुबह चार बजे का अलार्म गूँजता था। बाहर घना अंधेरा होता, और सुबह की सर्द हवा में एक अजीब-सी सिहरन होती थी। वह चुपके से अपनी चटाई से उठती, ठंडे पानी से हाथ-मुँह धोती और सीधे रसोई की तरफ बढ़ जाती थी।
रसोई में जाते ही उसका सामना बर्तनों की खनखनाहट और जलते हुए कोयले के तीखे धुएँ से होता था। उसके छोटे-छोटे हाथ, जो शायद अभी ठीक से आटे की भारी परात भी नहीं उठा पाते थे, चूल्हे पर नाना जी के टिफिन के लिए रोटियाँ बेलने लगते थे। नाना जी की सरकारी नौकरी थी।, सुबह की शिफ्ट में उन्हें दफ्तर जाना होता था। अगर टिफिन वक़्त पर न बनता, तो पूरे दिन की दौड़-भाग खराब हो जाती।
"जैनब बेटी, चाय चढ़ाई?" कमरे के भीतर से नाना जी की भारी लेकिन थकी हुई आवाज़ आती थी।
"जी अब्बा, बस हो गई," जैनब अपनी पतली-सी मासूम आवाज़ में जवाब देती और चिमटे से रोटी को सीधे चूल्हे की दहकती आग पर फुलाने की कोशिश करती।
कई बार अंगारे की तेज़ आँच उसकी उँगलियों को छू जाती, छाले पड़ जाते, लेकिन वह उफ़ तक नहीं करती थी। क्योंकि वह बहुत छोटी उम्र में ही जान गई थी कि अगर वह रोई या कमजोर पड़ी, तो पूरे घर का ढाँचा बिखर जाएगा।
इस घर में एक माँ तो थी, लेकिन वह सिर्फ जिस्मानी तौर पर मौजूद थी। कुछ साल पहले शहर में हुए उन खौफनाक दंगों ने, चारों तरफ फैली चीख-पुकार और बेरहम आगज़नी के उस खौफनाक मंज़र ने उसकी अम्मी (नानी) के ज़हन पर ऐसा गहरा और जानलेवा वार किया था कि वह अपनी सुध-बुध पूरी तरह खो बैठी थीं। वह अचानक चीखतीं, रोतीं और कभी-कभी हवा में किसी अनदेखे डर से बातें करने लगतीं। दंगों का वह बाहरी माहौल तो शांत हो गया था, लेकिन जैनब की अम्मी के दिमाग के अंदर एक ऐसा दंगा भड़क उठा था जो कभी शांत नहीं हुआ। वह मानसिक रूप से पूरी तरह अस्वस्थ हो चुकी थीं। वह मंजर उनके दिलो-दिमाग से कभी ओझल नहीं हो पाया।
ऐसे में, जैनब जो खुद अभी पाँच भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थी, अचानक उस घर की 'अम्मी' बन गई। सबसे बड़े भाई को बाहर के कामों में नाना जी का हाथ बँटाना पड़ता था, इसलिए बाकी की दो छोटी बहनों और दो छोटे भाइयों को संभालना, उन्हें नहलाना, उनके आँसू पोंछना और उन्हें खाना खिलाकर सुलाना, यह सब सात साल की जैनब के नन्हे कंधों पर आ गया था।
कई बार जब दोपहर में सारे बच्चे सो जाते, तो जैनब अपनी बीमार अम्मी के पास जाकर चुपचाप बैठ जाती। वह अम्मी का हाथ अपने हाथों में लेती, जो कभी बहुत नर्म हुआ करते थे लेकिन अब बेजान से लगते थे। वह अपनी अम्मी की सूनी आँखों में देखती, जहाँ कभी ममता का समंदर लहराता था, वहाँ अब सिर्फ एक खालीपन और एक अंतहीन खौफ तैरता रहता था।
"अम्मी, मैं हूँ… आपकी जैनब," वह बड़े हौसले से कहती।
लेकिन अम्मी बेजान-सी दीवार को ताकती रहतीं, जैसे वहाँ अतीत का कोई पुराना डरावना मंज़र चल रहा हो। जैनब चुपके से अपने आँसू अपने दुपट्टे के कोने से पोंछ लेती। उसने बहुत छोटी उम्र में ही यह कड़वा सच सीख लिया था कि आँसू बहाने से जिंदगी के काम आसान नहीं होते, बल्कि और मुश्किल हो जाते हैं। उसने हर हाल में मुस्कुराना और हालातों से लड़ना सीख लिया था। यही उसका बचपन था—जहाँ खिलौनों की जगह कड़छी-चम्मच थे और लोरी की जगह ज़िम्मेदारियों का एक गहरा, भारी सन्नाटा था।
वक़्त अपनी रफ़्तार से गुज़रता रहा और जैनब धीरे-धीरे सयानी होने लगी। नाना जी ने जब देखा कि जैनब अब पूरी तरह समझदार हो गई है, और उसने अपने बचपन की पूरी जिंदगी अपने भाई-बहनों को पालने और घर संभालने में खपा दी है, तो उनकी बूढ़ी आँखों में एक ही फ़िक्र रहने लगी—जैनब के हाथ पीले करना। अम्मी (नानी) की मानसिक हालत वैसी ही थी, लेकिन एक माँ का दिल तो भीतर कहीं धड़कता ही था। उन्होंने भी टूटी-फूटी ज़बान में नाना जी से कहा, "जैनब के लिए कोई ऐसा लड़का ढूँढो जो सीधा हो, जो मेरी नेक बच्ची को कभी कोई दुख न दे।"
तलाश शुरू हुई और रिश्ता तय हुआ। दूल्हा यानी हमारे अब्बा 'नजीर' एक बेहद शरीफ, सीधा और साफ़ दिल का इंसान थे। उनके आगे-पीछे इस दुनिया में कोई नहीं था, वे बिल्कुल अकेले थे। नाना जी को लगा कि लड़का भले ही गरीब है, उसके पास न तो अपना कोई बड़ा मकान है और न ही कोई आलीशान नौकरी, लेकिन उसका दिल सोने का है। वह उनकी लाडली बेटी को कभी बोझ नहीं समझेगा और उसे बेपनाह मोहब्बत देगा।
शादी सादगी से संपन्न हो गई। जैनब एक घर की ज़िम्मेदारियों से निकलकर दूसरे घर की दहलीज़ पर आ गई। लेकिन किस्मत के पन्नों पर शायद संघर्ष की स्याही कुछ ज़्यादा ही गहरी लिखी थी।
शुरुआती दिन बहुत ही तंगहाली और मुफ़लिसी में गुज़रे। अब्बा नजीर की आमदनी बहुत कम थी। वे दोनों शहर के एक बेहद तंग इलाके में, एक छोटे-से किराये के मकान में रहने लगे। मकान क्या था, बस एक घुटन भरा कमरा और एक छोटी-सी रसोई, जहाँ धूप और ताज़ी हवा भी बहुत मुश्किल से रास्ता ढूँढ पाते थे। कुछ ही समय बाद, उनके आंगन में पहली किलकारी गूँजी—सबसे बड़ी बेटी जहां दीदी का जन्म हुआ।
तंगहाली के बावजूद घर में खुशियों की एक हल्की-सी किरण जागी। अब्बा नजीर ने जब पहली बार अपनी बेटी को गोद में उठाया, तो उनकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने गर्व से जैनब से कहा, "जैनब, भले ही मेरे पास दौलत नहीं है, लेकिन मैं अपनी बेटियों को शहज़ादियों की तरह पालूँगा।"
दो साल बाद, एक और नन्ही परी ने उनके घर में कदम रखा—नसरीन। नसरीन बहुत ही प्यारी, चंचल और मासूम बच्ची थी। उसकी गोल-गोल आँखें और उसकी भोली मुस्कान पूरे घर की थकान मिटा देती थीं। लेकिन जैसे-जैसे परिवार बढ़ रहा था, मकान का किराया देना और भी दूभर होता जा रहा था। कई महीने ऐसे गुज़रते थे जब अब्बा के पास काम न होने के कारण वे मकान मालिक को किराया नहीं दे पाते थे।
उस मकान की मालकिन एक बहुत ही सख्त, घमंडी और बेमुरव्वत औरत थी। जब किराया वक़्त पर नहीं मिलता था, तो वह अपनी औकात दिखाने और जलील करने से बाज़ नहीं आती थी।
"देखो जैनब, अगर इस महीने भी किराया नहीं मिला, तो मैं तुम्हारा सारा सामान बाहर सड़क पर फेंकवा दूँगी," वह अक्सर दरवाज़े पर आकर चिल्लाती थी।
जैनब अम्मी हाथ जोड़कर बेबसी से खड़ी हो जातीं, "बाकी सब ठीक है बाजी, लेकिन थोड़ा वक़्त दे दीजिए। इनके पास काम थोड़ा मंदा चल रहा है, जैसे ही पैसे आएँगे हम चुका देंगे।"
"वक़्त? वक़्त तो मुफ़्त में नहीं आता। बहाने मत बनाओ। अगर किराया नहीं दे सकती, तो तुम्हें मेरे घर का पूरा काम मुफ़्त में करना पड़ेगा।" मकान मालकिन ने उनकी मजबूरी का सौदा कर लिया।
उस दिन के बाद से, अम्मी जैनब की जिंदगी और भी दोहरी चक्की में पिसने लगी। अपने बच्चों को संभालना, अपने घर का खाना बनाना और फिर उस ज़ालिम मकान मालकिन के पूरे आलीशान घर की सफाई, झाड़ू-पोछा और भारी-भारी बर्तन माँजना। सिर्फ इतना ही नहीं, वह औरत अम्मी को अपनी खरीदी हुई जागीर समझती थी। जब भी उसे बाज़ार जाना होता, भारी शॉपिंग करनी होती या किसी रिश्तेदार के यहाँ जाना होता, वह अम्मी को हुक्म सुना देती, "जैनब, चलो मेरे साथ, सामान उठाने के लिए कोई चाहिए।"
मजबूरी का नाम बहुत बड़ा होता है। अम्मी चुपचाप अपना सर झुकातीं, अपनी नन्ही बच्चियों को पड़ोस के भरोसे या अब्बा के आसरे छोड़तीं और उस औरत के पीछे-पीछे भारी सामान उठाने चल देतीं। उनके पैर थकते, बदन टूटता, लेकिन वह सोचतीं कि चलो, इसी बहाने बच्चों के सिर पर छत तो सलामत है। उन्हें क्या मालूम था कि यही लाचारी एक दिन उनकी जिंदगी का सबसे भयानक और दर्दनाक सौदा बन जाएगी।
वह मई का महीना था। आसमान से जैसे साक्षात आग बरस रही थी। दोपहर के बारह बजे ही सड़क का डामर पिघलने लगता था। हवा इतनी गर्म और तीखी थी कि साँस लेना भी दूभर था। और इसी खौफनाक मौसम में, छोटी नसरीन दीदी को टाइफाइड ने अपनी जानलेवा चपेट में ले लिया था।
नसरीन का पूरा शरीर तवे की तरह तप रहा था। उसका मासूम चेहरा पीला पड़ चुका था और वह बिस्तर पर पड़ी बस दर्द से कराह रही थी। अब्बा नजीर सुबह से ही बेहद परेशान थे, वे कहीं से दौड़-भाग करके थोड़े से पैसों का इंतज़ाम करके लाए थे ताकि बच्ची की दवाई आ सके। अम्मी लगातार नसरीन के सर पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रख रही थीं, लेकिन बुखार कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था।
"जैनब, मैं डॉक्टर के पास से नसरीन की दूसरी दवाई लेकर आता हूँ, तुम इसके पास ही रहना, इसे अकेला मत छोड़ना," अब्बा नजीर ने फ़िक्रमंदी से कहा और बाहर जाने लगे।
तभी, अचानक दरवाज़े पर ज़ोर से दस्तक हुई। दरवाज़ा खुला तो सामने वही बदमिज़ाज मकान मालकिन खड़ी थी। उसने भारी तड़क-भड़क वाली साड़ी पहनी हुई थी और हाथ में एक बड़ा-सा पर्स था।
"जैनब! जल्दी तैयार हो जाओ। मुझे बाज़ार जाना है, किसी को तोहफ़ा (गिफ़्ट) देना है। धूप बहुत तेज़ है, मैं अकेली इस गर्मी में कैसे सारा सामान उठाऊँगी," उसने अपनी रोबीली आवाज़ में हुक्म सुनाया।
अम्मी ने अंदर से आती हुई नसरीन की कराहने की आवाज़ सुनी। उन्होंने कातर और रोती नज़रों से मकान मालकिन को देखा, "बाजी, आज नहीं... प्लीज आज मुझे छोड़ दीजिए। मेरी नसरीन को बहुत तेज़ बुखार है, टाइफाइड हुआ है उसे। वह बहुत बीमार है, हिल भी नहीं पा रही है।"
अब्बा नजीर ने भी आगे बढ़कर हाथ जोड़े, "हाँ बाजी, बच्ची की हालत बहुत खराब है। इस कातिल धूप में जैनब का जाना मुमकिन नहीं है। आप आज अकेले देख लीजिए या किसी और को साथ ले जाइए।"
लेकिन उस औरत के सीने में दिल नहीं, पत्थर था। उसे अपनी ऐश-आराम की शॉपिंग के आगे एक गरीब और मजबूर माँ-बाप की मरती हुई बच्ची का दर्द दिखाई नहीं दिया। उसने अपनी आँखें तरेरीं और कड़े लहजे में कहा, "अच्छा! तो अब तुम लोग मुझे मना करोगे? याद है न कि पिछले तीन महीनों का किराया बाकी है? अगर आज मेरे साथ नहीं चली जैनब, तो शाम को अपना सारा बोरिया-बिस्तर समेट लेना और इस बीमार बच्ची को लेकर सड़क पर बैठ जाना!"
यह सिर्फ धमकी नहीं थी, बल्कि एक माँ के कलेजे पर सीधे खंजर का वार था। इस तपती धूप में, बिना पैसों के, उस तड़पती बच्ची को लेकर वे कहाँ जाते? अम्मी की आँखों से सावन-भादों की तरह आँसू बहने लगे। उन्होंने अब्बा की तरफ देखा। अब्बा नजीर की आँखें भी अपनी बेबसी पर लाल हो चुकी थीं।
"ठीक है बाज़ी… मैं चलती हूँ," अम्मी ने काँपती आवाज़ में कहा। "लेकिन मैं अपनी इस हालत में बच्ची को घर पर अकेला नहीं छोड़ सकती। मैं इसे अपनी गोद में साथ लेकर चलूँगी।"
"हाँ-हाँ, जो करना है करो, पर जल्दी चलो, मेरा वक़्त ज़ाया मत करो," उस बेरहम औरत ने कहा।
अम्मी ने नसरीन को एक पतले-से सूती दुपट्टे में लपेटा और उसे अपने सीने से सटाकर गोद में उठा लिया। अब्बा नजीर भी उनके साथ हो लिए, क्योंकि वे अपनी पत्नी और इस बेहद बीमार बच्ची को उस ज़ालिम औरत के रहमोकरम पर अकेला नहीं छोड़ सकते थे। तीनों बाज़ार की तरफ चल पड़े।
बाज़ार का वह मंज़र किसी दहकते जहन्नुम से कम नहीं था। सूरज ठीक सिर पर तांडव कर रहा था। धूप सीधे आँखों में तीरों की तरह चुभ रही थी। मकान मालकिन आगे-आगे मटकती हुई चल रही थी—कभी इस कपड़े की दुकान पर, कभी उस जेवर की दुकान पर। और उसके पीछे-पीछे, अम्मी जैनब अपनी गोद में बुखार से तपती हुई नसरीन को लिए मूक दर्शक की तरह खड़ी रहती थीं।
नसरीन का शरीर बुखार की तपन से और भी गर्म होता जा रहा था। बाहर की झुलसाने वाली धूप ने उसकी हालत को बदतर कर दिया था। वह अम्मी के सीने से बुरी तरह चिपकी हुई थी और उसकी सूखी हुई मासूम ज़बान से सिर्फ एक ही दर्दनाक आवाज़ निकल रही थी—
"अम्मी... पानी... पानी पीना है... अम्मी..."
अम्मी का अपना हलक प्यास से सूख चुका था, लेकिन अपनी बच्ची की यह आखिरी पुकार सुनकर उनका कलेजा फटा जा रहा था। "हाँ मेरी बच्ची, बस अभी पानी पिलाती हूँ," अम्मी रोते हुए कहतीं। अब्बा नजीर पास की दुकान से भागकर पानी लाते और नसरीन के सूखे, पपड़ी जमे होंठों से लगाते। नसरीन दो घूँट पीती और फिर निढाल हो जाती थी।
यह खौफनाक सिलसिला एक घंटे, दो घंटे... न जाने कितने घंटों तक चलता रहा। मकान मालकिन की शॉपिंग खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। वह एक दुकान से दूसरी दुकान घूमती रही, कपड़े देखती रही, मोल-तोल करती रही।
तभी, एक मोड़ पर चलते हुए, अम्मी जैनब को अचानक महसूस हुआ कि उनकी गोद में रखी नसरीन का शरीर एकदम से शांत और बहुत भारी हो गया है। जो बच्ची अब तक धीरे-धीरे कराह रही थी, "अम्मी पानी... अम्मी पानी..." उसकी आवाज़ अचानक हमेशा के लिए शांत हो गई। उसका कोमल सिर अम्मी के कंधे पर एक तरफ बेजान होकर लुढ़क गया।
अम्मी का दिल एक पल के लिए जैसे धड़कना भूल गया। उन्होंने चलते-चलते ही काँपते हाथों से नसरीन के चेहरे से दुपट्टा हटाया। नन्ही नसरीन की आँखें आधी खुली थीं, लेकिन उनमें अब कोई रोशनी, कोई हरकत नहीं थी। उसके होंठ जो पानी के लिए तड़प रहे थे, अब हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो चुके थे। उसकी साँसें थम चुकी थीं।
अम्मी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उनकी रूह भीतर ही भीतर चीख पड़ी, लेकिन गला पूरी तरह घुट गया। वे समझ गईं... उनकी लाडली नसरीन अब इस फानी दुनिया में नहीं रही। उसने अपनी अम्मी की गोद में, उस ज़ालिम धूप और बेमर्वी दुनिया के बीच दम तोड़ दिया था।
अम्मी ने एक नज़र पास चल रहे अब्बा नजीर पर डाली। अब्बा के चेहरे पर भी वही खौफ, आँसू और बेबसी थे। लेकिन वे दोनों बाज़ार के बीचों-बीच थे। चारों तरफ अजनबी लोगों का हुजूम था, दुकानें थीं और आगे वह बेपरवाह मकान मालकिन चल रही थी। अगर अम्मी वहाँ चीखतीं-चिल्लातीं, तो बीच बाज़ार तमाशा बन जाता। वह औरत शायद डर के मारे वहीं उन्हें बेसहारा छोड़कर भाग जाती या हंगामा खड़ा कर देती।
अम्मी जैनब ने उस वक्त एक बहुत बड़ा, पथरीला और कलेजा चीर देने वाला फैसला किया। उन्होंने अपने आँसुओं के समंदर को अंदर ही अंदर पी लिया—एक ऐसा घूँट जो तेज़ाब से भी ज़्यादा कड़वा था। उन्होंने नसरीन के बेजान, ठंडे शरीर को और कसकर अपने सीने से लगा लिया और उसके चेहरे पर दोबारा सूती दुपट्टा इस तरह डाल दिया जैसे वह गहरी नींद में सो रही हो।
वे दोनों चुपचाप, बिना एक शब्द बोले, उस औरत के पीछे लाश की तरह चलते रहे। अम्मी का हर एक कदम जैसे मौत के कुएँ में गिर रहा था। जिसकी मासूम बच्ची गोद में मर चुकी हो, वह माँ कैसे कदम बढ़ा सकती है? यह सिर्फ और सिर्फ वही खुदा और वह माँ जानती थी।
जब शॉपिंग खत्म हुई और वे वापस अपने किराये के मकान के अहाते में पहुँचे, तब जाकर मकान मालकिन ने अम्मी की तरफ देखा। अम्मी का चेहरा बिल्कुल सफेद पड़ चुका था, आँखें पथरा गई थीं जैसे उनमें कोई जान ही न हो।
उस औरत ने अजीब-सी नज़र से और चिढ़कर देखा और कहा, "अरे जैनब! तुम पागल तो नहीं हो गई हो? इस जानलेवा गर्मी में कोई अपने बच्चे के ऊपर ऐसा पूरा दुपट्टा कौन डालता है? बच्ची का दम घुट जाएगा, हटाओ इसे!"
अम्मी ने बहुत धीरे से अपने कंधे से नसरीन को उतारा। उन्होंने मकान मालकिन की आँखों में सीधे देखा। उन आँखों में अब कोई डर, कोई लाचारी नहीं थी, बल्कि एक ऐसा भयावह सन्नाटा था जो किसी की भी रूह को कँपा दे। अम्मी ने बहुत ही शांत, ठंडी और काँपती हुई आवाज़ में कहा:
"बाजी... इसका दम अब क्या घुटेगा। काफी देर पहले ही इसने मेरी ही गोद में, उसी तपती धूप में दम तोड़ दिया है। मगर हम रास्ते में थे, बाज़ार के बीच थे... इसलिए मैंने आपको बताया नहीं ताकि आपका तमाशा न बने।"
यह सुनते ही उस घमंडी औरत के होश उड़ गए। उसके हाथ से महंगे सामान के सारे थैले छूटकर ज़मीन पर बिखर गए। उसका चेहरा खौफ और गुनाह के अहसास से पीला पड़ गया।
अब्बा नजीर बदहवास होकर पागलों की तरह दौड़ पड़े। वे भागते हुए पास के डॉक्टर को बुलाकर लाए। डॉक्टर ने आकर नसरीन की ठंडी नब्ज़ छुई, उसकी पथराई आँखों को देखा और एक गहरी, ठंडी साँस लेकर हाथ छोड़ दिए।
"यह बच्ची तो काफी देर पहले ही मर चुकी है। आप लोग इसे इस नाजुक हालत में इस कातिल धूप में लेकर क्यों घूम रहे थे?" डॉक्टर ने बेहद अफ़सोस से कहा।
अब्बा नजीर वहीं मिट्टी पर ढह गए और अपने सिर पर हाथ रखकर दहाड़ें मारकर रोने लगे। लेकिन अम्मी जैनब नहीं रोईं। उनकी आँखों के आँसू सूखकर पत्थर हो चुके थे। वे बस नसरीन के उस मासूम, शांत चेहरे को अपलक देखती रहीं, जो अब इस दुनिया की भूख-प्यास और बुखार की तपन से हमेशा के लिए आज़ाद हो चुका था। यह दर्द, यह खौफनाक मंज़र, उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा, सबसे गहरा ज़ख्म बन गया। एक ऐसा ज़ख्म, जिसकी दुनिया में कोई दवा नहीं थी, कोई मरहम नहीं था।
नन्ही नसरीन के चले जाने के बाद, उस छोटे-से घर में एक ऐसा डरावना सन्नाटा पसर गया था जिसे दुनिया की कोई भी दौलत नहीं भर सकती थी। कई दिनों तक घर का चूल्हा नहीं जला। अम्मी बस एक कोने में बुत बनी बैठी रहतीं और अपनी सूनी गोद को घंटों देखती रहतीं।
लेकिन जिंदगी बहुत बेरहम और चलायमान होती है, यह किसी के दुख में रुकती नहीं है। बड़ी बेटी जहां दीदी का मासूम चेहरा देखकर, अम्मी ने धीरे-धीरे खुद को दोबारा जिंदा करने और समेटने की कोशिश शुरू की।
इस बेहद मुश्किल, काले और दर्दनाक दौर में, अगर कोई इंसान चट्टान की तरह अम्मी के सम्मान और उनके वजूद के साथ खड़ा रहा, तो वे हमारे अब्बा 'नजीर' थे। उन्होंने कभी भी अम्मी को यह अहसास नहीं होने दिया कि नसरीन के जाने में उनकी कोई गलती या लापरवाही थी। उन्होंने समाज के तानों के आगे अम्मी को ढाल बनकर बचाया। अब्बा ने अम्मी पर कभी किसी चीज़ की पाबंदी नहीं लगाई। उस दौर के समाज में जहाँ अक्सर मर्दों का ही हुक्म चलता था, वहाँ अब्बा नजीर ने हमेशा अम्मी जैनब के फैसलों को खुद से आगे और सर्वोपरि रखा।
"जैनब, तुमने बचपन से लेकर अब तक जिंदगी में बहुत दुख देखे हैं। अब मैं जीते-जी तुम्हें और कोई दुख नहीं देख सकता," अब्बा नजीर हमेशा अम्मी का हाथ थामकर कहते थे।
वक़्त का पहिया और आगे घूमा। खुदा ने उनकी सच्ची सहनशीलता और सब्र को देखा और उनकी सूनी झोली को फिर से खुशियों से भर दिया। घर में और बेटियों की बहार आई—नसरीन दीदी के बाद पैदा हुईं नरगिस दीदी, फिर आरिफा दीदी और सबसे आखिर में मैं (जिसने आज अपनी अम्मी की इस दर्दभरी दास्तान को शब्दों का रूप दिया है)।
समाज के कुछ संकीर्ण सोच वाले लोग, जो हमेशा दूसरों की जिंदगी में नुक्स निकालते हैं, वे अक्सर अब्बा से कहते थे, "अरे नजीर भाई, आपके घर तो सिर्फ बेटियाँ ही बेटियाँ हो रही हैं। बेटे के बिना खानदान का नाम कैसे चलेगा? बुढ़ापे का सहारा कौन बनेगा?"
लेकिन अब्बा नजीर उन लोगों की दकियानूसी बातों पर सिर्फ मुस्कुरा देते और गर्व से कहते, "मेरी बेटियाँ मेरा गुरूर हैं, मेरी शान हैं। ये मेरे लिए कोई बोझ नहीं हैं, बल्कि अल्लाह की अनमोल रहमत हैं। मैं अपनी बेटियों से उतनी ही मोहब्बत करता हूँ, जितनी कोई अपने हजार बेटों से भी नहीं कर सकता।"
अब्बा ने अपनी सभी बेटियों को बहुत नाज़, अदब और शहज़ादियों की तरह पाला। उन्होंने कभी बेटे और बेटी में कोई फर्क नहीं किया। अम्मी जैनब ने भी अपने बचपन की भयानक तकलीफों और नसरीन दीदी को खोने के उस असहनीय दर्द को अपनी बेटियों की परवरिश के आड़े कभी नहीं आने दिया। उन्होंने यह दृढ़ संकल्प लिया था कि जो तल्खी, जो लाचारी और जो जिल्लत उन्होंने खुद झेली है, उसकी काली परछाईं भी उनकी बेटियों के सुनहरे भविष्य पर न पड़े।
आज जब अम्मी पीछे मुड़कर अपनी इस अड़सठ-सत्तर साल की लंबी जिंदगी के सफर को देखती हैं, तो उन्हें महसूस होता है कि भले ही उनका बचपन आँसुओं की नदी में बीता, भले ही उनकी जवानी का एक अनमोल हिस्सा नसरीन दीदी के साथ ही मिट्टी में दफन हो गया, लेकिन आज उनका बुढ़ापा बेहद खूबसूरत, महफूज़ और मुकम्मल है।
आज उनकी सबसे बड़ी ताकत उनके बच्चे हैं, उनकी ये प्यारी बेटियाँ (जहां, नरगिस, आरिफा और मैं) हैं, जो उनके एक हल्के-से आँसू पर अपनी जान छिड़कने को हर पल तैयार रहती हैं। आज उनके पास उनके अब्बा (नाना जी) की वो पाक दुआएँ हैं, जो उन्होंने सुबह चार बजे तन्मयता से टिफिन बनाते वक्त अपनी नन्ही बेटी जैनब को दी थीं। और सबसे बढ़कर, उनके पास हमारे अब्बा नजीर का वह उम्र भर का वफादार साथ और बेपनाह मोहब्बत है, जिसने उनके हर नासूर बन चुके ज़ख्म को अपनी वफ़ा और केयर से भर दिया।
यह कहानी जैनब की है—एक ऐसी लड़की की जिसने महज सात साल की उम्र में माँ का भारी किरदार निभाया, एक ऐसी बदनसीब मगर मजबूत माँ की जिसने अपनी ही गोद में अपनी तड़पती बच्ची को खोया, और आज एक ऐसी खुशनसीब औरत की जिसके आंगन में आज उसकी बेटियों के रूप में इज्जत और मोहब्बत के अनगिनत फूल खिले हुए हैं। उनका संघर्ष बेकार नहीं गया, उनकी बेमिसाल सहनशीलता ने आज एक खूबसूरत, शिक्षित और हँसते-खेलते परिवार की मजबूत बुनियाद रखी है।