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बीति रात मैने एक शख्स को देखा
मानो एक अंधेरा सा बसा हो मन में
बड़ी-बड़ी आँखों की पुतली हो जैसे
भीतर कोई प्रश्न हो क्या, कब, कैसे?
एक सोच दूबी गुमनामी में
मंजील जैसे छिपी घने जंगलों में
ललाट पर कोई शिकन न थी जैसे
शरीर में कोई जान न हो कैसे?
आँखे घुमा कर जब उसने मेरी ओर देखा
कुछ ठंडी हवा के झोके सा महसुस हुआ
शिघ्र अगली गली में मुडकर देखा जिसे
साथ चल रहे ने पूछा, क्या ढूंढ़ रही और किसे?
रहस्य में उलझे मैने कहा वहाँ उस गाड़ी मे
अंधेरी गली मे एक शख्स गाड़ी के रोशनी में
उसने कहाँ, दो ही थे हम कब से यहाँ
न जाने खाली गली तुमने देखा किसे कहाँ?