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कुछ बेचैनी हमेशा साथ चलती है। एक ऐसी बेचैनी, जो हर उपलब्धि के बाद भी ख़त्म नहीं होती। जो हर रात सोने से पहले और हर सुबह आँख खुलते ही वही सवाल दोहरा देती है - क्या मैं सही कर रहा हूँ? क्या सब ठीक होगा? क्या मुझे कभी वह मिलेगा जिसके लिए मैं अपनी पूरी ताकत झोंक रहा हूँ? और अगर नहीं मिला...तो क्या होगा?

क्या मैं उन चेहरों का सामना कर पाऊँगा, जिनकी उम्मीदों का बोझ बरसों से अपने कंधों पर ढो रहा हूँ? लेकिन फिर एक और सवाल उठता है - मैं आखिर किन चेहरों को खुश करना चाहता हूँ? और क्यों? क्या वे चेहरे आज भी वैसे ही हैं, या फिर मैं उनके उस पुराने रूप से डरता हूँ, जो मेरे भीतर हमेशा के लिए छप गया है? शायद वे बदल चुके हों, पर मेरा अतीत नहीं बदला। वह आज भी मेरे भीतर जिंदा है। हर पल मुझे याद दिलाता रहता है कि काश...सब कुछ अलग होता। लेकिन “अलग” से मेरा मतलब क्या है? एक बड़ा घर? बैंक खाते में बहुत सारा पैसा? एक महंगी गाड़ी? ऊँचा ओहदा? अगर यह सब मेरे पास होता, तो क्या मैं सचमुच खुश होता? और अगर मैं खुश होता भी... तो क्या वे खुश होते? शायद इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

मैंने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा इसी उम्मीद में जी दिया कि एक दिन वे मुझ पर गर्व करेंगे। एक दिन वे सिर ऊँचा करके कहेंगे - "यह हमारा अपना है।" लेकिन आज सोचता हूँ - क्या मैं सच में उन्हें खुश करना चाहता था? या मैं अब भी उनसे डरता हूँ? शायद मैं आज भी उसी डर से भाग रहा हूँ। यह डर कि अगर मुझसे कोई गलती हो गई तो? अगर मैं असफल हो गया तो? क्या मैं खुद को कभी माफ़ कर पाऊँगा? पर फिर मन पूछता है - मेरी गलती थी ही क्या? क्या मुझे सचमुच वही जीवन जीना चाहिए था जो उन्होंने मेरे लिए तय किया था? क्या अपनी इच्छाओं को हमेशा दबा देना ही आज्ञाकारिता कहलाता है?

मैं आज भी भाग रहा हूँ। रुकना चाहता हूँ...पर रुक नहीं पाता। क्योंकि शायद रुकना, उन तमाम उम्मीदों के मर जाने जैसा लगता है, जिन्हें बरसों से अपने भीतर जिंदा रखा है।

मैंने हमेशा वही रास्ता चुना जो मुझे सही लगा, भले ही वह आसान नहीं था। लोग खुश नहीं थे। उन्होंने कहा - "यह रास्ता ठीक नहीं है।" जब भी हम कोई रास्ता चुनते हैं, तो जो रास्ता पीछे छूट जाता है, वह कभी-कभी हमारी आत्मा को भी चुभने लगता है। और अगर आपने वह रास्ता चुना हो जिस पर बहुत कम लोग चलते हैं, तो दुनिया आपको बार-बार याद दिलाती रहती है कि आपने क्या-क्या खो दिया। वे आपकी महत्वाकांक्षाओं को स्वार्थ कहने लगते हैं। वे आपको यह महसूस कराने की कोशिश करते हैं कि आपने अपने सपनों के लिए उन लोगों को पीछे छोड़ दिया, जिनके लिए आपको जीना चाहिए था। फिर वे आपको वापस उसी रास्ते पर बुलाते हैं जिस पर वे खुद चल रहे हैं। वे कहते हैं- "यही सही तरीका है जीवन जीने का।" लेकिन अजीब बात यह है कि वे कभी यह नहीं कहते कि वे उस रास्ते पर खुश हैं। शायद इसलिए कि उन्हें अब किसी के सवालों का सामना नहीं करना पड़ता। वे उन "चार लोगों" का हिस्सा बन चुके हैं, जिनसे कभी वे खुद डरते थे।

मैं उन सारी चीज़ों को पीछे छोड़ देना चाहता हूँ जो मुझे खुलकर साँस भी नहीं लेने देतीं। मैं उस अतीत से मुक्त होना चाहता हूँ जो हर बार भीतर तक तोड़ देता है। लेकिन विडंबना देखिए...मैं आज भी उसी अतीत की जंजीरों से बंधा हूँ, जिन्हें तोड़ने की इच्छा भी रखता हूँ और जिनसे अलग होने से डरता भी हूँ। आखिर यह कैसी विवशता है? मुझे किस बात का डर है?

क्या आप अकेले रह जाएँगे?

लेकिन शायद हम अकेलेपन से इसलिए नहीं डरते कि वहाँ कोई और नहीं होता। हम इसलिए डरते हैं क्योंकि अकेलापन हमें हमारे सबसे करीब ले आता है। वह हमें वह सब दिखाता है जिससे हम पूरी ज़िंदगी भागते रहे, हमारे घाव, हमारी असुरक्षाएँ, हमारी अधूरी इच्छाएँ, हमारा अनकहा दर्द।

शायद इसी वजह से हम हमेशा किसी न किसी शोर में खुद को खोए रखना चाहते हैं। हम दुनिया से कहते हैं कि हम खुशी की उस तितली को पकड़ना चाहते हैं। लेकिन सच तो यह है कि हम उससे भी डरते हैं। डर इस बात का नहीं है कि वह उड़ जाएगी। डर इस बात का कि अगर वह सचमुच हमारे हाथों पर आ बैठी...तो क्या हम उसे संभाल पाएँगे? क्या हम सच में उसके हक़दार हैं? हम अपनी हर कमी से परिचित हैं। हम जानते हैं कि कहाँ टूटे हुए हैं, कहाँ कमजोर हैं, कहाँ खुद से नज़रें चुराते हैं। और हमारे भीतर एक आवाज़ लगातार गूंजती रहती है "तुम इसके लायक नहीं हो।"

यही आवाज़ हमें खुद के करीब नहीं आने देती। यही हमें खुद को पूरे मन से स्वीकार करने से रोकती है। जबकि सच तो यह है कि खुश रहना किसी इनाम की तरह नहीं होना चाहिए। वह हमारा स्वाभाविक अधिकार होना चाहिए। उसे पाने के लिए हमें किसी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए।

फिर भी...

हम पूरी ज़िंदगी एक ऐसे "परफेक्ट इंसान" बनने की कोशिश करते रहते हैं, जो शायद कभी अस्तित्व में था ही नहीं। हम अपनी छोटी-सी गलतियों के लिए खुद को उम्रभर सज़ा देते रहते हैं। हम खुद को वही माफ़ी नहीं दे पाते, जो हम दूसरों को आसानी से दे देते हैं। और फिर हम उम्मीद करने लगते हैं कि कोई और आएगा…कोई ऐसा इंसान, जो हमें पूरा कर देगा।

जो हमें वह खुशी देगा, जो हम खुद को नहीं दे सकते। लेकिन ऐसा लगभग कभी नहीं होता। और अगर होता भी है, तो कुछ क्षणों के लिए। क्योंकि दुनिया का कोई भी रिश्ता, कोई भी सफलता, कोई भी उपलब्धि उस खालीपन को स्थायी रूप से नहीं भर सकती, जिसे भरने की जिम्मेदारी हमेशा से हमारी अपनी थी।

फिर भी विडंबना देखिए...हम पूरी ज़िंदगी उसी खोखली उम्मीद का पीछा करते रहते हैं कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा। एक दिन वे लोग हमें स्वीकार करेंगे। एक दिन वे हमें वह प्रेम देंगे, जिसकी तलाश में हमने अपने सपनों, अपनी इच्छाओं और कई बार खुद को भी खो दिया। लेकिन सच यह है कि वह दिन अक्सर कभी नहीं आता।

और फिर एक दिन...

हम दूसरों से खुशी की भीख माँगते-माँगते इस दुनिया से चले जाते हैं, बिना यह जाने कि जिस सुकून को हम सारी उम्र बाहर खोजते रहे… \वह शायद हमेशा से हमारे ही भीतर, हमारी प्रतीक्षा कर रहा था।

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