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"डेज़ी, उठो बेटा, आँखें खोलो! आज तुम्हारे पापा आ रहे हैं!" मैं एकाएक उठी। मम्मी की इस आवाज़ से मेरा दिल बाग-बाग हो गया। घर के आंगन में जैसे अचानक से खुशियों की बहार आ गई थी। जब भी पापा किसी काम के सिलसिले में कुछ दिनों के लिए बाहर जाते, तो उनके वापस आने का इंतजार मेरे लिए दुनिया का सबसे लंबा इंतजार होता था। उनकी आहट पाते ही मेरा चेहरा खिल उठता था और दिल की धड़कनें तेज हो जाती थीं।पिता का अपने बच्चों के प्रति प्यार स्वाभाविक होता है, पर वे इसे दिखा नहीं पाते; खासकर अपनी बेटी के प्रति असीम प्रेम रखते हुए भी, अनुशासन के पीछे अपनी इस कोमलता को छुपाए रखते हैं। बाहरी दुनिया के लिए वे शायद एक सख्त और अनुशासित इंसान हो सकते हैं, लेकिन अपनी संतान के लिए उनका दिल हमेशा मोम की तरह पिघलने को तैयार रहता है। पर हमारा रिश्ता कुछ अलग है—तकरार से भरा, पर उसी तकरार के पीछे छुपा था दुनिया का सबसे गहरा प्यार। वह एक ऐसा रिश्ता था जहाँ बिना कहे भी सब कुछ समझ लिया जाता था, जहाँ एक पिता की खामोशी में भी अपनी बेटी के लिए हजारों दुआएं छुपी होती थीं।मुझे आज भी याद है, जब मैं 6 साल की थी तब पापा मुझे अक्सर पार्क ले जाया करते थे। वह पार्क हमारे घर के पास ही था, जहाँ हर शाम बच्चों का मेला सा लगा रहता था। वहाँ शाम के ढलते सूरज की गुनगुनी रोशनी हरी-भरी घास पर किसी सुनहरी चादर की तरह बिखरी हुई होती थी। आसमान का रंग धीरे-धीरे बदलते हुए नारंगी और लालिमा से भर जाता था। पार्क के हर कोने में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं। कोई दौड़ रहा होता, तो कोई मिट्टी के घरौंदे बना रहा होता था। उस मखमली हरी घास पर मेरा लोट-पोट करना, दूसरे बच्चों के साथ भाग-दौड़ करना और फिर लपककर झूले की तरफ बढ़ जाना... वो मेरे बचपन के सबसे जादुई दिन थे। उन दिनों न तो कल की कोई चिंता थी और न ही किसी बात का तनाव। बस एक बेफिक्री थी जो पापा की मौजूदगी से और भी मजबूत हो जाती थी।पापा मुझे झूला झुलाते और प्यार से कहते— "झूला चाहे जितनी ऊँचाई छू ले, लौटकर ज़मीन पर ही आता है। तुम चाहे जितनी बड़ी बन जाना, अपने पैर हमेशा धरती पर रखना। ज़िंदगी की तरह इस झूले में भी उतार-चढ़ाव आते हैं, पर मुस्कुराना मत छोड़ना!" पापा की यह बात उस समय मेरे बाल-मन के लिए सिर्फ एक सामान्य सी बात थी। मुझे तब इस गहरे फलसफे का अंदाजा नहीं था कि वे मुझे जीवन के सबसे बड़े सच से रूबरू करा रहे थे। जब पापा ये बातें कहते, तो ऐसा लगता मानो कोई शिक्षक अपनी प्रिय शिष्या को या कोई श्रेष्ठ गुरु अपने बच्चे को जीवन का सबसे अनमोल और गहरा पाठ पढ़ा रहा हो। उनके चेहरे पर छाई वो गंभीरता और शब्दों की वो आत्मीयता सीधे मेरे बाल-मन में उतर जाती थी। उनके बोलने का तरीका इतना शांत और सौम्य होता था कि चंचल होने के बावजूद मैं उनकी बातें ध्यान से सुनती थी।6 साल के मासूम ज़हन में इतनी गहरी बातें भला कैसे समातीं? वक्त ने मुझे इस मुकाम पर ला खड़ा किया है, जहाँ बचपन में सुने व धुंधले अल्फ़ाज़ अब नसीहत बनकर साफ़ समझ आ रहे हैं। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो समझ आता है कि पापा मुझे सिर्फ झूला नहीं झुला रहे थे, बल्कि वे मुझे जीवन के संघर्षों के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रहे थे।मैं मचलते हुए जिद करती— "पापा, थोड़ा और तेज़!" मेरी आँखों में और ऊँचे आसमान को छूने की ललक होती थी। पापा की पैतृक चिंता तुरंत जाग उठती और वे संभालते हुए कहते— "नहीं डेज़ी, गिर जाओगी, चोट लग जाएगी।" मैं हार मानने वाली कहाँ थी, तुरंत मुँह फुलाकर कहती— "नहीं पापा, कुछ नहीं होगा।" पर पापा फिर भी झूले की रफ्तार धीमी ही रखते। उनका यह डर देखकर मैं झुंझला उठती और अपनी मासूम नाराज़गी के साथ सीधे सवाल दाग देती— "आप मुझे झूला झुला रहे हो या नहीं झुला रहे?"अपनी लाडली के इस सीधे और मासूम सवाल पर पापा मन ही मन मुस्कुरा उठते। वे बड़े दुलार से झूले की गति को थोड़ा और बढ़ाते और धीरे से स्नेहपूर्वक कहते— "मेरी दुआ है कि आज जिस तरह तुम इस झूले के संग आसमान चूमना चाहती हो, भविष्य में अपनी कामयाबी को भी इसी तरह अपने कदम चूमने पर मजबूर कर दो!" उनके इन शब्दों में जो भरोसा था, उसने अनजाने में ही मेरे भीतर एक नया आत्मविश्वास भर दिया था।पार्क के बाद पापा मुझे बर्गर खिलाने ले जाते। जब तक पापा काउंटर पर जाकर मेरे लिए गर्मागर्म बर्गर लाते, मैं वहीं पास में एक बेंच पर बैठ जाती। ठीक बगल में लगे एक टिक्की के स्टॉल से आती सोंधी खुशबू हवा में तैरती रहती; वहाँ खौलते तवे पर सिकती टिक्कियों की आवाज़ और उस तीखी हरी पुदीने की चटनी की रंगत ही ऐसी होती थी कि उसे देखकर ही मेरे गालों पर स्वाद की लाली तैर जाती। पापा के आने का इंतज़ार करते हुए, मैं कौतूहल से आस-पास के अनजान लोगों के चेहरों को निहारती, उनकी मेज़ (टेबल) की तरफ देखती और उत्सुकता से निहारती कि वे अपनी प्लेट्स में क्या-क्या खा रहे हैं। वह बचपन की एक ऐसी मासूमियत थी जहाँ हर छोटी चीज़ में एक नया अजूबा नज़र आता था।फिर जैसे ही पापा हाथों में बर्गर थामे मुस्कुराते हुए मेरी तरफ आते, मेरा नन्हा सा मन असीम तृप्ति और खुशी से सराबोर हो उठता। बर्गर खाते-खाते मैं अपने पूरे दिन भर की बातों का लेखा-जोखा पापा को सौंप देती; उन्हें स्कूल का हाल बताती, सहेलियों की बातें साझा करती, मम्मी की शिकायत लगाती और जब भी मुझे कुछ चाहिए होता, तो तुरंत मुँह बनाकर उन पर लाड़ जताती। उनके साथ बिताया हर पल साहित्य के पन्नों सा गहरा है, जो मेरे मन-मस्तिष्क में यूँ समाया है मानो सूखी धरती ने पूरे समुद्र को समेट लिया हो। वे पल मेरे जीवन की वो पूंजी हैं जिन्हें मैं कभी खोना नहीं चाहती।हर एक संतान, विशेषकर हर एक बेटी का अपने पिता के साथ बिताया हुआ वह भोला बचपन और हर एक पल जीवन का सबसे सच्चा, निश्छल और पावन पल होता है। दुनिया के तमाम रिश्तों में जहाँ दिखावट की थोड़ी-बहुत गुंजाइश हो सकती है, वहीं पिता और पुत्री का यह अनकहा रिश्ता पूरी तरह सत्य की बुनियाद पर टिका होता है। यही कारण है कि बचपन की ये खट्टी-मीठी यादें कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि मेरे जीवन की वो सबसे हसीन 'सच्ची कहानी' हैं, जिसका हर एक शब्द मेरे पिता के नि:स्वार्थ प्रेम और मेरी आत्मा के जुड़ाव से लिखा गया है। इस सच्चे अहसास को न तो वक्त धुंधला कर सकता है और न ही दुनिया का कोई बदलाव बदल सकता है।आज जब मैं बड़ी हो चुकी हूँ और जीवन की व्यावहारिक जिम्मेदारियाँ मेरे कंधों पर हैं, तब जीवन का कोई ज़ोरदार झटका या कोई झूला मुझे डरा देता है, तो मुझे बचपन का वही पार्क और वही झूला याद आ जाता है। फर्क बस इतना है कि तब झूले के पीछे मेरे पापा खड़े होते थे, और आज उनकी सीखें खड़ी हैं। तब उनके हाथ मुझे गिरने से बचाते थे, और आज उनके शब्द! भले ही समय के साथ बहुत कुछ बदल गया हो, पर उनका विश्वास, उनका स्नेह और उनके दिए हुए संस्कार आज भी मेरे हर कदम का सहारा हैं। मेरे पिता मेरे जीवन के सच्चे पथ-प्रदर्शक हैं और उनकी दी हर सीख मेरे जीवन की अमूल्य धरोहर है।"त्वं साक्षात् जगत् पिता, मम जीवनस्य रक्षकः।"— Happy Father's Day, Papa!