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कितना अजीब है ना?
सब कुछ गलत लड़की के साथ हो,
और जब वो उसके खिलाफ आवाज़ उठाए,
तो ये समाज भी उसे ही गलत ठहराए।

हाँ, ये लाइन लिखने से पहले भी मुझे सोचना पड़ा,
क्योंकि ये समाज,
सीधे "तुम गलत हो" नहीं कहता।
बल्कि हमारे फैसले पर उँगलियाँ उठाता है।

इसे तो बस तिल का ताड़,
राई का पहाड़ बनाना आता है।

"उसे ये तो नहीं करना चाहिए था,
अरे, इतनी सी बात पर इतना तमाशा?
इतनी भीड़ लगाना क्या ही ज़रूरत है,
अब खत्म भी करो बात को।"

"वो UP से है, इसलिए खून गरम है थोड़ा,
वो अनपढ़ है ना, इसलिए उसने कुछ भी बोल दिया।
तुम तो समझदार हो, चुप हो जाओ,
आराम से बात करते हैं।
इतना गुस्सा क्यों हो रही हो?"

"अरे, इसमें उन्हें क्यों बुला रही हो?
अच्छा, अपनी पहचान दिखाना चाहती हो?
छोड़ो ना, आदमियों में होती ही है गर्मी।"

और उस भीड़ में—
लोगों का पीछे-पीछे हँसना,
एक-दूसरे के कान में बातें बनाना,
और सबका आ-आकर पूछना:
"यहाँ क्या हुआ है? इतनी भीड़ क्यों लगी है?"

सब बस सलाह देने,
बातें बनाने,
हँसने, तमाशा देखने,
और वो औरत है ना, तो
उस पर उँगलियाँ उठाने आते हैं।

सब उसे गिराते ही तो हैं।
आज भी हम नहीं बदल पाए।

आज भी मोहल्ले की हर लड़की डरकर जीती है।
जाने कैसे, जाने कैसे

हम लोगों की सोच बदल पाएँगे?
जाने कब एक साधारण सी लड़की
अपना फैसला सुनाएगी,
और ये समाज कहेगा:

"हाँ, तुम सही हो।"
हाँ, मैं किसी की स्वीकृति नहीं माँग रही हूँ।
मैं जवाब माँग रही हूँ,
मैं अपना हक़ माँग रही हूँ।
आख़िर कब हमारे फैसलों पर औरों का फैसला थोपना बंद किया जाएगा?
आख़िर कब हमारे फैसले को किसी का तमाशा नहीं सहना पड़ेगा?
आख़िर कब?

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