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सच क्या है और उसे जानना कैसे है?

मैं हमेशा से ही कोई बहुत बड़ी आस्तिक नहीं रही हूँ। एक समय पर मेरे मन में भगवान को लेकर आस्था थी, पर शायद इसलिए कि मेरे बड़ों ने मुझे वह सिखाया था। हालांकि मैं खुद अपने भीतर श्रद्धा भाव ढूंढ रही थी, पर मुझे नहीं मिला।

जब मैं छोटी थी तब हमारे घर में सुबह-सुबह गुलशन कुमार के गाए हुए देवी-भजन बजा करते थे, जिन्हें मैं भी खुशी-खुशी सुनती थी। एक समय ऐसा भी था जब मुझे लगा कि मेरे सवालों के जवाब भगवान के पास हैं। इसलिए जवाब जानने के लिए मैंने खुद को अत्यधिक आस्तिक बनाने की कोशिश की, रोज-रोज स्टेटस पर राम की तस्वीर भी लगाई, 'रामायण' और 'महाभारत' जैसे धारावाहिक देखे, यहाँ तक कि 'श्रीमद्भगवद्गीता' भी पढ़ी। पर इनमें से किसी ने भी मेरी आंतरिक बेचैनी को कम नहीं किया। ऐसा नहीं कि यहाँ सीखने योग्य कुछ नहीं है, पर शायद जो मुझे जानना था वह यहाँ नहीं है।

समय के साथ सवालों का घेरा और बेचैनी दोनों बढ़ते गए। सवालों का उत्तर ढूंढते-ढूंढते मैं इस परिणाम पर पहुँची कि भगवान का कोई अस्तित्व नहीं है। मैंने नास्तिकता को स्वीकार कर लिया, पर मन की बेचैनी अभी भी वही-की-वही रही।

मुझे न तो मेरे सवालों का उत्तर मिला और न ही शांति। क्योंकि मैं दुनिया को यह बताने चल दी कि भगवान नहीं हैं, एक समय पर मुझे आस्था और आस्तिक लोगों से इतनी चिड़ हो गई कि मैं बस उनको गलत साबित करने पर ही ध्यान दे रही थी। इस चिड़ की वजह से मैंने अपनी माँ का दिल भी दुखाया। मैं भूल गई कि अगर वह अज्ञानी है तो मैं भी कोई बहुत बड़ी ज्ञानी नहीं हूँ। मैंने अनजाने में एक विश्वास को छोड़कर दूसरा विश्वास खुद से बाँध लिया था।

किंतु समय बदला और मुझे समझ आया कि आस्था और पाखंड में अंतर होता है। हालांकि मैं अंधी आस्था या अंधी नास्तिकता का समर्थन नहीं करती, पर आजकल सिर्फ पाखंड और अंधविश्वास का ही विरोध कर रही हूँ। क्योंकि भगवान हैं या नहीं, यह मेरा सवाल कब बन गया मुझे समझ ही नहीं आया, मुझे भगवान को नहीं खुद को जानना था। और इसमें मेरी मदद की बुद्ध ने।

बुद्ध का असर

जब से मैंने बुद्ध की शिक्षाओं को स्कूल में पढ़ा था, तभी से मैं उनसे प्रभावित थी। हालाँकि स्कूल के बाद बहुत समय तक मैंने न तो उनको पढ़ा और न ही उनके विषय में सोशल मीडिया पर कुछ देखा।

पर अचानक बेचैनी बढ़ने और सवालों के घेराव ने मुझे उनकी तरफ जाने के लिए मजबूर किया, मुझे सच जानने के लिए उनका मार्ग ही सबसे बेहतर लगा। हालाँकि यह ज़रूरी नहीं कि बाकी रास्ते सही नहीं हैं, यह सिर्फ एक इंसानी स्वभाव है। मैं बुद्ध से प्रभावित हूँ इसलिए मुझे उनका रास्ता सबसे बेहतर लगा, अगर कोई किसी और से प्रभावित है तो उसे उनका रास्ता ही बेहतर नज़र आएगा।

बुद्ध को जानने के लिए मैंने बौद्ध धर्म नहीं अपनाया, क्योंकि एक धर्म से जुड़कर आप दूसरे धर्मों से कट जाते हैं। पहले ही हिंदू धर्म में जन्म होने की वजह से बाकी धर्मों के लोग मुझे खुद से अलग मानते हैं। इसलिए मेरा मानना है कि या तो आप सभी धर्मों को अपना लो, या सभी को त्याग दो। किसी एक से जुड़ने में कोई लाभ नहीं।

साथ ही मैंने बुद्ध को भगवान भी नहीं माना, क्योंकि बुद्ध ने कभी कृपा करने की बात की ही नहीं। बुद्ध ने न कभी कोई चमत्कार किया और न ही यह कहा कि मैं तुम्हारे दुःख हर लूँगा। उन्होंने न खुद को भगवान बताया और न ही यह कहा कि कहीं भगवान हैं, वे चाहते थे कि हम सच को खुद जानें। चाहे वह भगवान के होने का सच हो या न होने का।

मैंने बुद्ध को जानने के लिए सबसे पहले अंबेडकर साहब की पुस्तक 'भगवान बुद्ध और उनका धम्म' पढ़ी। उस पुस्तक का असर इतना हुआ कि एक पल के लिए मेरे मन में भी बौद्ध धर्म अपनाने का विचार आया। बाबा साहब अंबेडकर ने, बुद्ध के जीवन की कठिनाइयों, अनुभवों और शिक्षा को बिल्कुल साधारण शब्दों में काफी बेहतर तरीके से लिखा है। वह सब पढ़ने के बाद मैं बुद्ध और उनकी शिक्षाओं से और ज़्यादा प्रभावित हुई। मुझे लगता है कि बुद्ध ऐसी शख्सियत हैं कि जो भी उनके बारे में पढ़ता है, वह उनसे और जुड़ता चला जाता है।

मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ, बुद्ध को जितना जाना उतना ही उनसे जुड़ती चली गई। पर अब लग रहा है कि मैं बुद्ध के पास आकर अटक गई हूँ। खुद बुद्ध के विचार हमें आगे बढ़ना सिखाते हैं, पर हम बुद्ध के ज़रिए ही सच को जानने की कोशिश कर रहे हैं। हमें बुद्ध के मार्ग को चुनना था, और हम बुद्ध को चुनकर वहीं बैठ गए।

सच क्या है

एक सच यह है कि मैं सिर्फ एक जीव हूँ, एक प्रजाति का हिस्सा, जिसका नाम इंसानों की प्रजाति है। जब इस सच को देखती हूँ तो खुद में और बाकी जीवों में कोई अंतर नज़र नहीं आता। वैसे ही जब खुद को इंसान के रूप में देखती हूँ तो दूसरे धर्मों और देशों से जुड़े इंसानों में कोई अंतर नज़र नहीं आता।

पर एक सच यह भी है कि इंसानों का कोई स्थायी सही-गलत नहीं है। सही-गलत की परिभाषा बदलती आ रही है, और आगे भी बदलेगी। हालाँकि यह बदलाव इतना आसान नहीं होता, इसके लिए अक्सर क्रांतिकारी आंदोलन होते हैं और आंदोलनकारियों को विरोध भी झेलना पड़ता है।

खैर, अगर सही-गलत जैसी परिभाषाएँ इंसानों की बनाई हुई हैं और ये लगातार बदलती हैं तो सच क्या है? वह सच क्या है जिसके बारे में बुद्ध कहते हैं कि वह 'अपरिवर्तनशील और स्थायी' है?

इस सच तक तो मैं अभी तक नहीं पहुँच पाई, पर इतना तय है कि मुझे यहाँ तक पहुँचाने में बुद्ध की शिक्षाओं का बहुत बड़ा हाथ है।

बुद्ध से आगे बढ़ो

बीते कुछ समय में मैंने बुद्ध को बहुत पढ़ा, उनके बारे में सोशल मीडिया पर भी देखा। और आगे भी उनको जानने की मेरी जिज्ञासा कम नहीं हुई है, मुझे उन्हें जब जितना जहाँ जानने का मौका मिलता है मैं जानती हूँ।

बुद्ध को जानने से मुझे काफी हद तक शांति प्राप्त हुई है। क्योंकि बुद्ध तार्किक हैं, और उनके बताए रास्ते पर चलकर काफी स्पष्टता मिलती है। पहले के मुकाबले चीजों को समझना ज्यादा आसान हो गया है। कहीं-न-कहीं गुस्से पर भी काबू हुआ है। यही कारण है कि बुद्ध की तरफ मेरी श्रद्धा बढ़ती जा रही है।

पर अब लग रहा है कि बुद्ध के प्रति आसक्ति को भी त्यागने का वक्त आ चुका है। क्योंकि बुद्ध से बँधकर मैं कभी आगे नहीं बढ़ पाऊँगी। हालाँकि मुझे बुद्ध को त्यागने से पहले उन्हें अच्छे से जानना है। लेकिन इतना तय है कि बुद्ध का हाथ पकड़कर बैठने से भी हम एक बंधन में ही बँधते हैं। और सच को किसी बंधन में बँधकर नहीं जाना जा सकता, यह भी मैंने बुद्ध से ही जाना है।
इसलिए—बुद्ध, गीता, कुरान, बाइबल और महावीर से सीखो, पर आगे बढ़ जाओ।

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