प्रेम करने वालों के प्रति समाज की कठोरता और अन्याय
लगभग एक साल पहले की बात है। मेरे मोहल्ले की एक लड़की रात को अपने प्रेमी के साथ अपने घर से चली गई। उसके जाने के बाद उसके परिवार ने उसे बहुत ढूँढा। जब एक दिन बाद वह मिली, तो उसके प्रेमी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। उन दोनों की किस्मत अच्छी थी कि समय रहते बात पुलिस तक पहुँच गई, वरना उन दोनों में से किसी के साथ भी कोई अनहोनी हो सकती थी। बाद में लड़की को उसके घर वालों ने बहुत पीटा और उसे अपने मुताबिक बयान देने के लिए मजबूर किया। दबाव में आकर लड़की ने पुलिस के सामने बयान दिया कि वह लड़का उसे बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया था। इसके तुरंत बाद लड़की के परिवार ने महज़ तीन दिन के अंदर उस लड़की की शादी उससे दुगनी उम्र के लड़के से जबरदस्ती करा दी। वहीं दूसरी तरफ लड़के को उसके परिवार ने जमानत पर छुड़वा लिया।
कुछ समय बाद मुझे खबर मिली कि वह लड़की अपने ससुराल से भाग चुकी है और वह लड़का, जिससे वह प्रेम करती थी, वह भी अपने घर से भाग चुका है। इस बार उन्हें कोई नहीं पकड़ पाया। वे कहाँ हैं और किस हाल में हैं, किसी को नहीं पता।
इसके अलावा एक और हादसा है, जो मुझे याद आ रहा है। उस समय मैं सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। हमारे गाँव में एक लड़के की लाश मिली और जाँच में पता चला कि उसकी प्रेमिका के परिवार ने ही इज्जत के नाम पर उसकी हत्या की थी। मुझे याद है कि उस वक्त गाँव के हालात इतने खराब और तनावपूर्ण हो गए थे कि हमारे स्कूल के दरवाजे पर भी सुरक्षा के लिए 4-5 पुलिसकर्मी बैठते थे।
इसके लिए हमें हमारे समाज की बनावट को समझना पड़ेगा। जो बच्चे प्रेम करने या प्रेम-विवाह करने की सजा भुगतते हैं, उनके माता-पिता इस समाज से बाहर नहीं रहते। परिवार जिस इज्जत की बात करता है और जिसके लिए अपने बच्चों को भी क्रूर सजा देने से नहीं चूकता, उसकी यह मानसिकता समाज के डर की वजह से ही बनी है। उन्हें डर लगता है कि लोग उनके परिवार को बुरा-भला कहेंगे। समाज में झूठे सम्मान और बनावटी इज्जत को बचाने के लिए परिवार किसी भी हद तक गुजर जाते हैं।
हमारे समाज की बनावट ही ऐसी है कि यहाँ कोई भी इंसान अपनी मर्जी से जीवन के फैसले नहीं ले सकता। कोई भी फैसला लेने से पहले बच्चों को माता-पिता की तरफ देखना पड़ता है और माता-पिता समाज की तरफ देखते हैं। हमारे यहाँ बच्चे अपने करियर का फैसला भी खुद नहीं ले सकते, तो सोचिए जीवनसाथी चुनने का अधिकार उन्हें इतनी आसानी से कैसे मिल जाएगा।
इसलिए, जब भी कोई लड़की किसी लड़के से प्रेम करती है, तो उसका परिवार इसे अपना घोर अपमान समझता है। वे झूठी इज्जत के नशे में अंधे होकर लड़के की जान तक ले लेते हैं। हालांकि ऐसी परिस्थितियों में लड़कियों को भी मारा जाता है, पर ज्यादातर मामलों में लड़की के परिवार वाले लड़के को अपना मुख्य निशाना बनाते हैं।
इसके साथ ही हमने ऐसे मामले भी देखे हैं, जहाँ गाँव के लोगों ने मिलकर प्रेमियों को मार दिया। अक्सर पंचायत भी ऐसे घिनौने फैसले लेती है।
एक लड़की को इस दौरान अपने ही परिवार से जो अपमान और प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, वह बहुत भयानक होती है। आसपास के लोग, रिश्तेदार और समाज तो उन्हें जीने नहीं देते, ऊपर से परिवार के जरिए होने वाली मारपीट और मानसिक हिंसा उन्हें पूरी तरह तोड़ देती है। उनकी कुछ दिनों के अंदर ही किसी से भी शादी करा दी जाती है और उन्हें पूरी जिंदगी प्रेम करने की सजा भुगतनी पड़ती है। कई बार तो महज़ प्रेम करने पर लड़की के परिवार के जरिए ही लड़की को मार भी दिया जाता है।
दूसरी तरफ, अगर कभी लड़के की जिद के सामने झुककर उसका परिवार उसकी प्रेमिका को स्वीकार कर ले, तो भी लड़की के सामने हजारों नई समस्याएँ आकर खड़ी हो जाती हैं। लड़के का परिवार लड़की को मन से नहीं अपनाता। उसे बार-बार अहसास दिलाया जाता है कि उसने प्यार करके और अपने परिवार की मर्जी के बिना शादी करके बहुत बड़ी गलती की है। कई बार तो लड़के को अपनी प्रेमिका का साथ निभाने के लिए अपने खुद के माता-पिता और परिवार से हमेशा के लिए अलग होना पड़ता है।
समाज की इस गहरी और अंधकार से भरी कुरीति को खत्म करने के लिए मुख्य रूप से तीन स्तरों पर काम करना होगा।
इस समस्या का सबसे बड़ा और स्थायी समाधान है — बेहतर शिक्षा। इतिहास गवाह है कि किसी भी समाज के हद से ज्यादा कट्टर और रूढ़िवादी होने के पीछे सबसे बड़ा कारण अशिक्षा होती है। भारत की भी यही सबसे बड़ी समस्या है। आज भी बहुत सारे बच्चे शिक्षा से वंचित रहते हैं। ऐसे में वे जो भी अपने आसपास घटता हुआ देखते हैं, उसे ही सही मान लेते हैं।
वहीं, जिन्हें शिक्षा मिल रही है, उनके साथ भी एक समस्या है कि उन्हें मूल्य-आधारित शिक्षा नहीं मिल रही। उस शिक्षा का कोई महत्व नहीं, जो एक इंसान को समाज का मानसिक गुलाम बनने से न रोक सके। हमें न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था में सुधार करने की जरूरत है, बल्कि शिक्षा को देश के हर बच्चे तक पहुँचाने की भी जरूरत है। तभी इस तरह की रूढ़िवादी मानसिकता खत्म हो पाएगी।
भारत की कानून व्यवस्था की धीमी रफ्तार भी एक बहुत बड़ी कमजोरी है। अदालत में एक केस को सुलझने में 11-12 साल लग जाते हैं। ऐसे में नौजवानों का कानून पर कोई खास भरोसा नहीं रहता। इसके अलावा, पुलिस प्रशासन भी इसी समाज का हिस्सा है, इसलिए कई मामलों में पुलिस सुरक्षा देने की बजाय पीड़ित लड़के-लड़की पर ही समझौते का दबाव बनाने लगती है या परिवार का साथ देती है।
कई बार पुलिस कोर्ट के आदेश के सामने झुककर लड़के-लड़की को सुरक्षा तो देती है, पर उनकी सुरक्षा इतनी मजबूत नहीं होती कि वह उन्हें समाज की रूढ़िवादी सोच और अचानक होने वाले हमलों से बचा सके। कानून व्यवस्था के मजबूत होने पर ही प्रेम कहानियाँ सफल हो पाएंगी और धीरे-धीरे समाज की सोच को चुनौती देने लगेंगी।
शिक्षा व्यवस्था और कानून व्यवस्था में भी तभी सुधार आएगा, जब लोग इसके लिए आवाज उठाएँगे। लोगों की चुप्पी ही इस देश को खोखला करती जा रही है। हमें समझना होगा कि अगर हम आज चुप रहे, तो कल और मासूम लोग प्रेम करने की सजा भुगतेंगे। जागरूकता ही ऐसी प्रणाली है, जिसके जरिए लोगों को समझाया जा सकता है और शिक्षा तथा कानून व्यवस्था को भी बेहतर बनाया जा सकता है।
जागो और दूसरों को भी जगाओ! क्योंकि इंसानियत और प्रेम किसी भी खोखले सामाजिक नियम से कहीं बढ़कर हैं।