हर घर एक व्यवस्था से चलता है। कुछ नियम लिखे हुए होते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो कभी कागज़ पर नहीं आते, लेकिन उनकी पाबंदी सबसे ज़्यादा सख्ती से की जाती है। मेरे घर के लिखे हुए नियम बहुत साफ थे। सुबह 7 बजे नाश्ता, दोपहर 1:30 पर खाना, रात 9 बजे रात्रि भोजन। कपड़े हमेशा इस्त्री किए हुए, अलमारी में रंग के हिसाब से लगे हुए। जूता-चप्पल तक एक पंक्ति में। घर में सफाई सबकी ज़िम्मेदारी थी और अनुशासन सबसे बड़ी चीज़ थी। बाहर से देखने पर हमारा घर एक आदर्श, मध्यम-वर्गीय, संस्कारी परिवार लगता था, जहाँ सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन इन सब दिखाई देने वाले नियमों के पीछे एक ऐसा नियम भी था जो कभी बोला नहीं गया, कभी चर्चा नहीं हुई, लेकिन हर दिन, हर पल पालन किया गया। वो नियम था - इस घर में माँ को थकने का, बीमार पड़ने का, रोने का, या अपना दर्द बताने का कोई हक नहीं है।
बचपन में मैं समझ ही नहीं पाई कि ये सामान्य नहीं है। जब मैं अपनी सहेलियों के घर जाती थी और देखती थी कि उनकी माँ दोपहर में आराम करती है, या कहती है कि आज तबीयत ठीक नहीं है, तो खाना बाहर से मंगा लेते हैं, तो मुझे बड़ा अजीब लगता था। मुझे लगता था कि शायद मेरी सहेलियों की माँ कामचोर है। क्योंकि मेरे घर में मैंने कभी अपनी माँ को ये कहते हुए नहीं सुना था कि आज मैं नहीं कर पाऊँगी। वो चाहे कितनी भी थकी हो, चाहे उसके पैर में दर्द हो, चाहे उसकी आँखें नींद से बंद हो रही हों, वो सुबह सबसे पहले उठती थी और रात को सबके बाद सोती थी। ये उसका नियम नहीं, उसकी ड्यूटी बना दी गई थी।
मेरे पापा को अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए कभी भी आवाज़ ऊँची करने की या हाथ उठाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। उनका तरीका इससे कहीं ज़्यादा गहरे मानसिक नियंत्रण का था। मनोविज्ञान में इसके लिए एक शब्द है - दमनकारी नियंत्रण। उनका एक घूरना, उनकी एक लंबी खामोशी जो पूरे भोजन की मेज पर छा जाती थी, उनका जवाब न देकर बस देखते रहना, ये सब चिल्लाने से भी ज़्यादा डरावना होता था। घर में एक तरह का 'अंडे के छिलकों पर चलने' वाला माहौल रहता था, मतलब हर कोई फूँक-फूँक कर कदम रखता था कि कहीं कुछ गलत न हो जाए और पापा नाराज़ न हो जाएँ। इस माहौल में माँ ने जीना सीख लिया था। उसने अपना एक बचाव का तरीका बना लिया था - हर काम से पहले माफी माँग लेना, हर बात पर हाँ कह देना, और अपनी हर इच्छा को दूसरों की ज़रूरत के नीचे दबा देना।
मुझे एक दिन आज भी बिल्कुल साफ याद है जो मेरे मन में हमेशा के लिए बैठ गया है। उस दिन माँ को बहुत तेज़ बुखार था। उसका शरीर तप रहा था, उसकी आँखें लाल थीं और वो ठंड से काँप रही थी। मैं स्कूल से आई तो देखा, वो रसोई में खड़ी है। मैंने पूछा, माँ, आप आज आराम क्यों नहीं कर रही, तो उसने धीरे से कहा कि आज उससे खड़ा नहीं हुआ जा रहा। उसी वक्त पापा की आवाज़ आई - "सबको बुखार आता है, इसका मतलब ये नहीं कि घर का चूल्हा बंद हो जाए। बच्चे स्कूल से भूखे आएंगे।" उस दिन माँ ने बुखार में ही रोटियाँ बनाईं। उसने एक बार भी शिकायत नहीं की। अगर कभी वो कहती कि वो थक गई है, तो उसे काम से बचने का बहाना कह दिया जाता था। धीरे-धीरे माँ ने बोलना ही बंद कर दिया। उसने अपने दर्द को अंदर ही अंदर पीना सीख लिया।
ये सिर्फ मेरे घर की कहानी नहीं थी। जब मैंने बड़े होकर अपनी मौसी, अपनी चाची और अपने आस-पड़ोस की औरतों को देखा, तो मुझे एहसास हुआ कि ये कहानी हर दूसरे घर की है। हमारे समाज में औरतों को शुरू से ही ये सिखाया जाता है कि उनका सबसे बड़ा धर्म परिवार को जोड़े रखना है। चाहे इसके लिए उन्हें अपनी खुद की पहचान, अपनी सेहत और अपनी इज्जत ही क्यों न कुर्बान करनी पड़े। मेरी माँ ने भी यही किया। उसने अपने आप को इस परिवार की नींव बना दिया, और नींव को कौन देखता है? सबको दीवारें और छत दिखाई देती है, लेकिन नींव का दर्द कोई नहीं समझता। उसने ये सोच लिया था कि अगर उसने अपनी तकलीफ बोली, तो घर बिखर जाएगा, और इसलिए उसने चुप रहना ही बेहतर समझा। ये एक अलिखित समझौता था जो उसने अपने आप से कर लिया था।
इस चुप्पी में समाज भी बराबर का ज़िम्मेदार था। जब कोई रिश्तेदार घर आता था तो माँ को देख कर कहता था - "अपना ख्याल रखा करो, कितनी कमज़ोर हो गई हो।" लेकिन ये कोई नहीं पूछता था कि उसका ख्याल रखने वाला कौन है? क्या उसके पास आराम करने का विकल्प है भी? समाज सिर्फ सलाह देता है, सहारा नहीं देता। और इस तरह माँ की चुप्पी को समाज की चुप्पी ने और मज़बूत बना दिया। सबको लगता था कि सब ठीक है, क्योंकि माँ ने कभी शिकायत ही नहीं की।
इस लगातार की खामोशी और डर का असर बहुत गहरा और लंबे समय तक रहने वाला होता है। इसका असर सिर्फ माँ पर ही नहीं, बल्कि हम बच्चों पर भी पड़ा। सबसे पहले, इसने मुझे प्यार की एक गलत परिभाषा सिखा दी। मुझे लगा कि प्यार का मतलब है खुद को पूरी तरह मिटा देना, अपनी हर ज़रूरत को नज़रअंदाज़ करना और हमेशा दूसरों को खुश रखना। मुझे लगा कि अगर मैं अपने लिए कुछ माँगूँ तो मैं स्वार्थी कहलाऊँगी। दूसरा असर माँ के शरीर पर पड़ा। जो दर्द शब्दों में नहीं निकलता, वो शरीर में जमा हो जाता है। डॉक्टर इसे मनोदैहिक दर्द कहते हैं। आज भी मेरी माँ को अक्सर सिर दर्द, कमर दर्द और थकान रहती है, जिसका कोई चिकित्सीय कारण नहीं मिलता। क्योंकि सालों का दर्द उसके अंदर जमा है। आज भी अगर वो दोपहर में 15 मिनट के लिए लेट जाए, तो वो अपराधबोध महसूस करती है, सबसे पूछती है कि क्या मैं थोड़ी देर लेट जाऊँ? उसका आराम करना भी अब अनुमति पर निर्भर करता है। ये सीखा हुआ व्यवहार है। तीसरा और सबसे खतरनाक असर था झूठी खुशहाली का। बाहर से हमारा परिवार एक आदर्श परिवार लगता था, जहाँ सब कुछ आदर्श है। लेकिन अंदर से ये आदर्श दिखने की कीमत एक इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी देकर चुका रहा था। उसने अपनी पहचान, अपने सपने, अपनी ख्वाहिशें सब कुछ इस घर के लिए छोड़ दिया था।
आज जब मैं बड़ी हो गई हूँ, जब मैं चीज़ों को समझने लगी हूँ, तो मुझे एहसास होता है कि हम माँ के साथ कितने गलत थे। हम बच्चे भी उसी व्यवस्था का हिस्सा बन गए थे। हमने कभी ये नहीं सोचा कि माँ को भी आराम की ज़रूरत है। क्योंकि हमने अपने पापा को कभी ये करते हुए नहीं देखा। हमने सीखा ही नहीं था कि माँ को धन्यवाद बोलना चाहिए या उसकी मदद करनी चाहिए। और इस बात का मुझे सबसे ज़्यादा अफसोस है।
अगर मुझे ज़िंदगी में एक मौका मिले, वक्त में पीछे जाने का, तो मैं एक ही दिन बदलना चाहूँगी। मैं उस बुखार वाले दिन में जाना चाहूँगी और अपनी माँ का हाथ पकड़ कर उसे रसोई से बाहर ले आना चाहूँगी। और मैं अपने पापा से और अपने आप से ये एक वाक्य कहना चाहूँगी, जो हमारे घर में कभी कहा ही नहीं गया - "माँ, तुम्हें उठने की कोई ज़रूरत नहीं है। आज का खाना हम देख लेंगे। तुम बस आराम करो, मैं हूँ यहाँ।"
मुझे लगता है कि शायद ये एक वाक्य ही काफी होता। ये एक वाक्य उस अनदेखे नियम को तोड़ देता। ये एक वाक्य मेरी माँ को ये एहसास दिलाता कि वो सिर्फ एक मशीन नहीं है, वो एक इंसान है। ये कहानी सिर्फ मेरी माँ की नहीं है। ये उस हर औरत की कहानी है जो अपने परिवार को जोड़ने के लिए खुद को तोड़ देती है, जो अपने वजूद का चुप-चाप समझौता कर लेती है और जिसके समझौते की कीमत कभी कोई नहीं समझता। मौन की सबसे बड़ी कीमत यही है कि वो धीरे-धीरे एक इंसान को उसी की नज़रों में खत्म कर देता है।