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प्रकृति और पर्यावरण पर विशेष रचना
मैं धरती हूँ…
जब कोई पूछे — तुमने इंसान के लिए क्या किया है?
कभी मेरे आँगन में
हरियाली मुस्कुराती थी,
नदियाँ गीत गाती थीं,
पहाड़ बादलों से बातें करते थे,
और हवा में मिट्टी की खुशबू
अपनेपन का संदेश लाती थी।
मैंने किसी से कुछ नहीं माँगा,
बस सबको देती रही।
तुम्हारे जन्म से पहले भी
मैं तुम्हारे लिए तैयार थी।
तुम्हारे छोटे-से शरीर को
चलने के लिए जमीन दी,
प्यास बुझाने को पानी दिया,
साँस लेने को हवा दी
और भूख मिटाने के लिए
अपने सीने से अन्न उगाया।
तुमने मुझे माँ कहा,
और मैंने सचमुच
तुम्हें अपने बच्चे की तरह पाला।
जब तुम्हें घर चाहिए था,
मैंने अपनी मिट्टी दी।
जब तुम्हें भोजन चाहिए था,
मैंने खेतों में फसल उगाई।
जब तुम्हें छाया चाहिए थी,
मैंने पेड़ों की शाखाएँ फैला दीं।
जब तुम्हें ठंड लगी,
मैंने अपने भीतर से
ईंधन और ऊर्जा के साधन दिए गए।
मैंने कभी हिसाब नहीं माँगा।
तुमने मेरे जंगलों से
लकड़ी ली,
मेरी नदियों से
पानी लिया,
मेरी छाती से
खनिज निकाले,
मेरे खेतों से
अन्न लिया।
मैं फिर भी चुप रही।
लेकिन एक दिन
मेरी चुप्पी को
तुमने मेरी सहमति समझ लिया।
पेड़ गिरने लगे,
नदियाँ मैली होने लगीं,
हवा में धुआँ भरने लगा,
मिट्टी में कचरा दबने लगा।
जहाँ कभी पक्षियों का संगीत था,
वहाँ मशीनों का शोर सुनाई देने लगा।
मैंने तुम्हें रोकना नहीं चाहा,
क्योंकि माँ अपने बच्चों को
बढ़ते हुए देखना चाहती है।
पर विकास की दौड़ में
तुम भूल गए कि
जिस रास्ते पर दौड़ रहे हो,
वह रास्ता भी मेरा ही है।
आज जब गर्मी बढ़ती है,
जब बारिश अपना समय बदलती है,
जब जंगल कम होते हैं,
जब नदियाँ सूखने लगती हैं—
तो मुझे दोष मत देना।
मैं बदली नहीं हूँ,
तुमने मेरा संतुलन बदल दिया है।
फिर भी मैं तुम्हें
एक और मौका देती हूँ।
एक पौधा लगा दो,
एक नदी को गंदा होने से बचा लो,
एक मुट्ठी कचरा
सही जगह पहुँचा दो,
पानी की एक बूँद बचा लो।
तुम्हें ये छोटे काम लगेंगे,
लेकिन मेरे लिए
यही उम्मीद की किरण है।
मैं बदला नहीं चाहती,
मैं बस तुम्हारा साथ चाहती हूँ।
क्योंकि मैं केवल
तुम्हारे पैरों के नीचे की जमीन नहीं हूँ।
मैं तुम्हारी पहली साँस हूँ,
तुम्हारे भोजन का आधार हूँ,
तुम्हारे घर की नींव हूँ,
तुम्हारे भविष्य की रखवाली हूँ।
जब कोई पूछे—
“धरती ने हमारे लिए किया ही क्या है?”
तो मेरा उत्तर बहुत सरल है—
“मैंने तुम्हें जीवन दिया है।”
और जब तुम पूछो—
“हमने धरती के लिए क्या किया?”
तो शायद एक दिन
तुम्हारे पास भी
गर्व से कहने के लिए कुछ हो।
क्योंकि याद रखना—
मैं रहूँगी,
तो तुम्हारी कहानी आगे बढ़ेगी।
मैं स्वस्थ रहूँगी,
तो तुम्हारा भविष्य मुस्कुराएगा।
मैं धरती हूँ…
तुम्हारी संपत्ति नहीं,
तुम्हारी माँ हूँ।
और माँ को बचाना
किसी एक दिन का काम नहीं—
यह हर साँस की जिम्मेदारी है।

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