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कहानियों के किस्सो में बस बड़े किरदार क्यों होते हैं,

जो पीछे छूट गए कहीं पर्दा में, वो चुपके से आंसू धोते हैं।

सबने देखा राम और सीता का चौदह साल का वो वनवास,
पर उर्मिला ने जो अकेले काटा, वो दर्द नहीं था किसी के पास।

महल में रहकर भी वो लड़की, पल-पल अंदर टूट गई,
किताबों के पन्नों में देखो, वो सीता से पहले छूट गई।

बड़ी कहानी की चमक में, उसका रोना भी धुंधला था,
त्याग तो उसका भी कम न था, पर उसका ही भाग्य धुंधला था।

सब गाते हैं राधा का प्यार, और कान्हा का वो रोना भी,
पर किसने देखा रुक्मिणी का, घुट-घुट कर सब खोना भी?

वो रानी बनकर बैठी रही, पर मन की बात छुपाती रही,
दुनिया पूछती रही राधा को, वो समझौते अपनाती रही।

वो साथ खड़ी थी कान्हा के, पर उसका हक फिर भी दूर रहा,
इतिहास ने उसको भुला दिया, जो बनकर उनका नूर रहा।

उसका डर, उसकी घबराहट, बस महल की दीवारें जानें,
दुनिया तो बस जो आगे दिखे, उसी के नाम को पहचाने।

मैं भी इस जीवन के खेल का, एक छोटा सा किरदार हूँ,
जो मुख्य कहानी का हिस्सा नहीं, मैं वैसा एक विचार हूँ।

मेरा होना, ना होना जैसे, कोई मायने नहीं रखता यहाँ,
सब देखते हैं बस नायक को, मेरा वजूद कहाँ टिकता यहाँ?

मैं उर्मिला का वो अकेलापन, मैं रुक्मिणी की वो तन्हाई हूँ,
जो मुख्य कहानी लिख न सकी, मैं वो अनकही विदाई हूँ।

सब महफ़िल की बातें करते हैं, मैं अकेलेपन का मंज़र हूँ,
सबके सामने होकर भी, मैं पीछे छुपा समंदर हूँ।

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