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कहते हैं, आईना कभी झूठ नही बोलता। जो है, जैसा है उसे उसी तरह आपके समक्ष पेश करता है। आज के समय में, अपने आस -पास समाज में जो भी गतिविधियाँ हो रही हैं, उससे शायद ऐसा लगता है कि मानो, हर एक व्यक्ति को, जिससे होकर ही समाज बनता है, खुद को तथा कर्मों को आईने में देखने की जरुरत है।
मानव अपनी सोचने – समझने की शक्ति तथा अपने मानवीय गुणों के चलते अन्य सभी प्रजातियों में सर्वोच्च माना जाता है। लेकिन समय में समय का पासा उल्टा पडने लगा है। लेकिन ये मानव, अपनी मानवता से ही हात धो बैठा है। कहते हैं, आप दुनिया का कोई भी पेशा अपनाकर एक कामयाब पेशेवर व्यक्ति बन सकते हैं। लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि, दुनिया का सबसे कठिन पेशा है, एक अच्छा और जिम्मेदार व्यक्ति बनना। मानवीय जीवन में, इसकी नींव विद्यार्थी काल से डाले जाने की प्रथा अनंत काल से चली आ रही थी। लेकिन आज के Gen Z वाले जमाने में तो मानो मानवीय मूल्यों को तिलांजली ही दे दी है।
लेकिन आज के आधुनिक विद्यार्थी की कथा ही निराली..। एक जमाना था जब लोगों के पास पैसा कम हुआ करता था और हर कोई व्यक्ति कड़े संघर्षो और मेहनत से होकर गुजरता था। छोटी से छोटी चीज़ भी हैसियत से बड़ी लगने लगती थी। आज जब वही पीढ़ी, माता -पिता बन चुके हैं, उनका यही उद्देश्य रहा कि मैं जिन हालातों से होकर उनको गुजरना पड़ा है, उन हालातों से कभी भी उनके बच्चों को ना गुजरना पड़े। जीवन की थपेडों से उनको हमेशा दूर रखे। बच्चों की सारी जरूरतें, उनकी ख्वाहिशें किसी भी हालात में पूरी की जाए। शायद यही से आज की पीढ़ी के बर्ताव में, ऐसा बदलाव देखा गया है कि ऐसा लगता है मानो हमने खुद अपने हाथों से अपनी कब्र खोद ली हो।
यह ईश्वरीय देन है कि आज के बच्चे तकनीकी क्षेत्र में अव्वल हैं। लेकिन वही दूसरी ओर यही बच्चे, दया, करूणा, बड़ों का आदर करना, बातचीत में विनम्रता, मेहनत करना, चीजों की कद्र करना, किसी बात की जिम्मेदारी उठाना, अपनी गलती मानना आदि सभी बातों से ये लोग वंचित है। इतना ही नहीं, कयोंकि इनको सब चीजें आसानी से मिल गई हैं, उन चीजों का उनकी जिंदगी में कोई एहमियत नहीं है। चाहे वो छोटी-सी पेंसिल हो या फिर बड़ी-सी गाड़ी। ये लोग इस बात से वाकिफ़ हैं कि यदि ये गई तो, अगले ही पल दूसरी भी आ जाएगी। शायद शिक्षकी पेशे में होने के कारण मैंने इन मानवीय मूल्यों की टूटने की आहट एक भयंकर शोर में तब्दील होते हुए नजदीक से महसूस किया है। घर पर इनको बड़े ही नाजो से पाला जाता है। घर पर तो ये शहजादे होते ही हैं लेकिन साथ ही, इनको यह भी तालीम दी जाती है कि, पूरी दुनिया उनके पैरों में है। कहा जाता है कि, घर ही पहला स्कूल होता है, जहाँ माता – पिता तथा परिवार एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं लेकिन, क्या ही हो, जब यही लोग, अपने बच्चे की गलतियों को नज़रअंदाज करते हुए, चूप बैठने लगे तो, यही गलतियाँ कब अपराध का रूप धारण कर बैठे, यह पता भी नहीं चलेगा। हाल ही में, 3 फरवरी को दिल्ली में, हुई कार दुर्घटना में, कार चलानेवाला महज 16 साल का नाबालिक लड़का था, जिसके गैर जिम्मेदाराना हरकतों के चलते 25 साल के युवक को अपनी जान गवानी पड़ी। इतना ही नहीं, सामने आए फूटेज से यह बात भी देखने को मिली कि, परिवारवालों ने ना ही सिर्फ, अपने बेटे का समर्थन किया बल्कि दसवी की बोर्ड की परिक्षा का बहाना देकर, उसको जमानत भी दिलवाई। यही क्यों, सन् 2012 का कुख्यात निर्भया कांड में शामिल दोषियों में से एक नाबालिक ही तो था। आपके आस-पास भी कई ऐसी घटनाएँ होगी, जिसका केंद्र एक नाबालिक हो, लेकिन उसकी गलती चाहे कितनी भी बड़ी क्यों ना हो, उसकी आँखों में कोई खौफ या अफसोस नहीं होता।
सोच के भी डर लग रहा है कि, यही मानसिकता यदि आज के युवाओं में पनपती रही, तो हमारे समाज का ह्रास होना निश्चित है। शायद अब पानी नाक के ऊपर पहुँच चुका है, और अभी कुछ नहीं किया गया तो, इस समाज का दम घुटने में देर नहीं लगेगी। हाँ कुछ लोगों का यह भी कहना होगा कि बच्चों को स्कूल इसीलिए तो भेजा जाता है। शिक्षक का काम यही तो है। लेकिन कई बार इन बच्चों को सुधारने की बहुत बड़ी कीमत शिक्षकों को भुगतनी पड़ती है। जहाँ इन्हीं बच्चों के माता – पिता व्दारा, उनपर गलत आरोप लगाने के साथ – साथ पुलिस की भी धमकी दी जाती है। अब इसे अभिभावकों का अपने बच्चों के प्रति अंधा प्रेम कहे या अहंकार। एक समय था, जब गुरुओं को भगवान का दर्जा दिया जाता था, लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि, वह सिर्फ एक कतपुतली हैं। यह बात भी देखी गई है कि, बच्चा अक्सर अपने घर के वातावरण में, अपने परिवार के बर्ताव के अनुरूप खुद को ढालने लगता है। अब ऐसे में यदि शिक्षक किसी गलत आदत को सुधारने की कोशिश करता है तो ये अभिभावकों का भी कर्तव्य हो जाता है कि वे भी इसमें सहायता करें। क्योंकि आगे चलकर, यही बच्चे समाज का अविभाज्य घटक बन जाते हैं। समाज में उनका बर्ताव, कहीं ना कहीं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समाज को प्रभावित करता हैं।
अब शायद वक्त आ गया है कि, समाज के हर एक व्यक्ति को, इस आईने का सामना करना जरूरी है। तब ही शायद, इस पीढ़ी की मानसिकता में बदलाव लाया जा सकता है। यह किसी भी समाज के एक तख्ते को निशाना बनाने के लिए नहीं बल्कि, यह तो सिर्फ एक अवलोकन है। शायद मेरी ओर से एक कोशिश, कि आपको भी अपने आईने में एक झलक दिख जाए।