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उन सवालों के जवाब लाऊँ कहाँ से,
जो जवाब में से ही एक मालूम पड़ता है।
उन सवालों को भूल जाऊँ कैसे,
जो अब तक मैंने किसी से किए नहीं हैं।
उन सवालों में उलझी हुई एक पहेली हूँ मैं,
जिन जवाबों की जवाबदेही किसी ने ली नहीं है।
उन सवालों की गुफ्तगू तो देखो,
मेरे होने के अस्तित्व को और उलझा देते हैं वो।
उन सवालों की हिमाकत तो देखो,
मेरे ध्यान न देने पर कुलबुला जाते हैं वो।
उन जवाबों का भी कहना है क्या,
जो मुझमें खोए हुए इस कदर हैं कि मुझमें ही लापता हैं।
उन सवालों को भी चैन नहीं,
मुझे करते क्यों बेचैन है।
कह दो उनसे जवाब को ढूंढते रहना,
सिर्फ मेरा काम तो नहीं है ?
सवालों की गहराई तो देखो,
समुद्र की गहराई को भी देती चीर है।
सवालों की ऊँचाई को भी सोचो,
नवग्रहों की दूरी को भी खुद में समेट लेती हैं।
सवालों की माया हैं कभी कान्हा कभी राम कभी त्रिदेव,
के रूप में हमको उलझा देती हैं।
हर नारी को देवी बना देती हैं,
सवालों के तीर नारी को छलनी कर देती हैं।
आदमी भी करे क्या,
सवालों के बोझ तले हर रिश्ते को सुलझा पाये क्या ?
सूरज चांद तो मानो नियति हैं,
इनकी अठखेली ने अनेक सवालों को रोशन किया है।
मैं इन सब में हूँ,
पर कहीं भी नहीं।
ये सवालों की श्रृंखला हैं,
जो आज तक किसी ने समझी ही नहीं।