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वहीँ खड़ी हूँ, वहीँ खड़ी हूँ,
चीख-चीख कर मंजिल को पुकार रही हूँ|
कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं दिख रहा,
ना जाने मंजिल से कितनी दूर खड़ी हूँ?
मायावी कोलाहल सुन रही हूँ,
ना जाने दिशाहीन क्यों हो रही हूँ?
वहीँ खड़ी हूँ, वहीँ खड़ी हूँ,
चीख-चीख कर मंजिल को पुकार रही हूँ|
अपने दिख रहे, सपने बुन रहे हैं,
ना जाने मंजिल की ओर क्यों नहीं चल रहे हैं?
रुके हुए हैं कदम मेरे पदचिह्न ना जो मुझे दिखे,
किस ओर चलूँ इस उलझन में हूँ क्यूँ कदम ना बड़े मेरे?
वहीँ खड़ी हूँ, वहीँ खड़ी हूँ,
चीख-चीख कर मंजिल को पुकार रही हूँ|
आईने में खुद को निहार रही हूँ,
परछाई ना जाने किसकी ढूंढ रही हूँ?
धुंधला सा दिख रहा हैं सब,
श्रृंगार की परते दर परतों में खुद को क्या ढूंड रही हूँ बस?
वहीँ खड़ी हूँ, वहीँ खड़ी हूँ,
चीख-चीख कर मंजिल को पुकार रही हूँ|
लहरों में बस खेल रही,
किनारे का कुछ होश क्यूँ नहीं?
क्षितिज पर सूरज दिख रहा हैं,
पर ढल रहा है या उग रहा है, ये समझ आया क्यों नहीं?
वहीँ खड़ी हूँ, वहीँ खड़ी हूँ,
चीख-चीख कर मंजिल को पुकार रही हूँ|
मन ही मन बैचैन खड़ी हूँ,
विश्राम करूं कहाँ ये भी ना जाने क्यूँ नहीं सोच रही हूँ?
खाली तस्वीर लिए बस युहीं खड़ी हूँ,
ना जाने उस पर लिखने का क्यों सोच रही हूँ?
वहीँ खड़ी हूँ, वहीँ खड़ी हूँ,
चीख-चीख कर मंजिल को पुकार रही हूँ|
बारिश की बूंदे मुझपर बिखर रही हैं,
ना जाने मैं उसमें क्यों खुद को भिगो रही हूँ?
एक चींटी भी मुझसे ज्यादा मेहनत कर रही हैं,
ना जाने क्यूँ मैं बस क्यूँ में उसको निहार रही हूँ|
वहीँ खड़ी हूँ, वहीँ खड़ी हूँ,
चीख-चीख कर मंजिल को पुकार रही हूँ|