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कभी कागज़ के कुछ टुकड़ों में,
ख्वाईश के फूल छुपाते हैं,
मन उपवन के वीराने में,
खुशियों के पुष्प खिलाते हैं
मोहक खुशबू, अहसासों से,
हम मन ही मन मुस्कुराते हैं,
निर्जीव ये कागज़ के टुकड़े,
तब हम को बहुत सुहाते हैं!
कभी कागज़ बहुत सुहाते हैं!
कभी कागज़ बहुत रुलाते हैं!!
जब प्रेम पत्र बन कर आते,
बीते दिन याद दिलाते हैं,
सूखे फूलों के बीच छिपे,
अरमान पुनः मुस्काते हैं,
"सिर्फ तुम्हारी", शब्द पढ़े,
तो आँखें भर भर जातीं हैं,
वक्त भले वह दूर गया,
पर यादें कब मर पातीं हैं!
कुछ कागज़ के टुकड़ों में,
सदियों के दर्द समाते हैं!
कभी कागज़ बहुत सुहाते हैं!
कभी कागज़ बहुत रुलाते हैं!!
कभी परीक्षा परिणाम बने,
किस्मत द्वारे दस्तक देते,
जिस में वर्षों की मेहनत के,
परिणाम सभी लिक्खे होते,
कुछ को जीवन की खुशियां तो,
कुछ के सारे सपने टूटे,
कुछ के परिवारी गले मिले,
कुछ के हताश, कुछ के रूठे!
कुछ को कागज गर्वित करते,
कुछ को अभिशप्त बनाते हैं!
कभी कागज़ बहुत सुहाते हैं!
कभी कागज़ बहुत रुलाते हैं!!
कुछ अपने ही बीमारों की,
जब रिपोर्ट हाथ में पाते हैं,
आशंकित, अनहोने डर से,
हम पल पल घबराते हैं,
"कुछ दिन के मेहमान हैं ये",
जब डॉक्टर हमें बताते हैं,
तटबन्ध पलक के तोड़ अश्रु,
वहीँ अश्रु सिन्धु बन जाते हैं!
कभी कागज़ के ये टुकड़े ही,
सेहत के राज बताते हैं!
कभी कागज़ बहुत सुहाते हैं!
कभी कागज़ बहुत रुलाते हैं!!
कभी फटा पोस्टकार्ड का कोना,
कभी किसी का अंतिम पत्र,
कभी वसीहत बन कहता है,
अब अधिकार तुम्हारा एक छत्र,
कभी जॉब जाने का नोटिस,
कभी कोर्ट बेदखली आर्डर,
कभी किसी अपने की खबरें,
अख़बार बताये हुआ मर्डर!
बस एक कागज़ के टुकड़े से,
सपनों के महल ढह जाते हैं!
कभी कागज़ बहुत सुहाते हैं!
कभी कागज़ बहुत रुलाते हैं!!
ये दुख के ही पर्याय नहीं,
कभी खुशियां भी संग लाते हैं,
कुछ स्वप्न हमारी आँखों के,
यही कागज सच कर जाते हैं,
बेटे का पहला नियुक्ति-पत्र,
माँ की आंखें चमकाता है,
कभी बेटी का विवाह पत्र,
घर आँगन को महकाता है,
कुछ भावविव्हल करके हमसे,
प्रभु का अभिषेक कराते हैं!
कभी कागज़ बहुत सुहाते हैं!
कभी कागज़ बहुत रुलाते हैं!!
कागज़ पर ही इतिहास लिखा,
कागज़ पर ही संसार खड़ा,
इस पर युद्धों की कथा लिखी,
इस पर ही प्रेम का गीत गढ़ा,
इस पर ही संविधान लिखा,
जिससे हमको अधिकार मिले,
कहीं इसके अंकित शब्दों में,
बहु शिकवे, गिले लिखे मिले!
शब्दों की सूखी स्याही में,
बस भाव सिन्धु लहराते हैं!
कभी कागज़ बहुत सुहाते हैं!
कभी कागज़ बहुत रुलाते हैं!!
जीवन के अनगिनत पृष्ठों में,
कुछ पृष्ठ तो ऐसे होते हैं,
जो रिश्तों संबंधों से ऊपर,
हमको हम से मिलवाते हैं,
कुछ पन्ने फाड़ भी दें लेकिन,
अवशेष अमिट रह जाते हैं,
कुछ दर्द, सुखद अनुभव अपने,
सच का दर्पण दिखलाते हैं।
स्याही सूखे, बह जाए मगर,
कभी भाव सूख ना पाते हैं।
कभी कागज़ बहुत सुहाते हैं!
कभी कागज़ बहुत रुलाते हैं!!