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तो ये कुछ साल पुरानी बात है। मैं मेरे भाई-बहन के साथ एक खेल खेल रही थी। खेल में मेरा छोटा भाई हार गया। तो नियम के अनुसार मुझे उसे कोई काम देना था। तो मैंने उसे कहा कि जाओ और हमारे घर में जितने लोग तुमसे बड़े हैं, उन सबके पैर छू के आओ। 

क्योंकि उस दिन घर में एक कार्यक्रम था तो कई लोग आये हुए थे। मेरा भाई गया और सबके पैर छुआ। हंसी खुशी में कार्यक्रम सफल हो गया। 

ओह हाँ, ये मेरे चाचा-चाची का बेटा है। दूसरे ही दिन मेरी चाची जी का फोन आया, और उन्होंने माँ को बहुत सुनाया। पूछने पर बोली, "मैं आयुषी से बहुत नाराज़ हूँ कि उसने मेरे बेटे का मज़ाक बना दिया लोगों के सामने। हम ब्राह्मण लोग हैं, और आयुषी ने नीचे जाति के लोगो का पैर छुआया मेरे बेटे से, हमें पाप पड़ेगा।"

मैं ये सुन के स्तब्ध रह गई। आखिर बड़ों का पैर छूने से पर कैसे लग सकता है, मैंने तो सुना है कि आशीर्वाद मिलता है।  मेरी माँ और पिता ने मुझे बहुत समझाया कि हम सबकी सोच नहीं बदल सकते, पर ये मेरे सहन शक्ति के बाहर था। उस रात मुझे नींद ही नहीं आई। अपने ही घर वालों कि इस मंसिकता को देखना मेरे लिए बहुत दुखद था।

उसी रात मैंने कलम उठाया और अपनी भावनाएं एक काग़ज़ के पन्ने पर लिख दिया। 

यह कोई कविता नहीं है, बस मेरे मन की एक भावना और कुछ प्रश्न है। तो ये कुछ इस प्रकार है:

हाँ, मैं एक दलित हूँ, 
लेकिन मेरी भी एक पहचान है। 
हाँ, मैं एक दलित हूँ, 
लेकिन मेरी भी एक शान है। 
ऊपर वाले ने तुम्हें बनाया, 
तो उसने ही मुझे भी बनाया,
फिर क्यों हर मोड़ पर
करते हो तुम मुझे पराया? 
खून जो लाल तुम्हारा है, 
तो खून लाल ही मेरा है, 
फिर आखिर क्या है, 
जो तुम्हें मुझसे अलग करता है? 
जो इंसान तुम हो, 
तो इंसान ही मैं भी हूँ, 
फिर आखिर क्यों
मैं तुम्हारे जैसा नहीं हूँ? 
जो जन्म तुमने धरती पर लिया, 
तो जन्म मैंने भी धरती पर ही लिया, 
फिर तुमने आखिर कैसे
मुझे खुद से अलग किया? 
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, 
हिंदू मुस्लिम, सिख, ईसाई, 
न जाने ऐसे और कितने 
जाति-धर्म तुमने है बनाई। 
जो पूछा मैंने एक सैनिक से, 
तो उसने कुछ यूँ कह डाला, 
"न जाति न धर्म देखता हूँ, 
मैं तो भारत का बेटा हूँ, 
हर शख्स में भारत माँ को देखता हूँ।"
जो तुम करते हो ये भेद-भाव, 
इंसानियत से इंसानियत का नाता छूट जाता। 
यकीन मानो, जो वो करने लगे यही भेद-भाव, 
इंसानियत के साथ-साथ सारा भारत ही टूट जाता। 
आओ मिलकर आवाज़ उठाऐ, 
'सब बराबर हैं' के नारे लगाएं, 
हिंदू-मुस्लिम, ब्राह्मण-शुद्र नहीं, 
हम भारतीय हैं, ये पूरी दुनिया को बताएँ। 

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