श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक हमें एक ऐसे व्यक्ति की पहचान बताता है जिसका मन पूरी तरह से शांत और स्थिर है।
"दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः" का अर्थ है कि जिसे न तो दुखों ने विचलित किया हो और न ही सुखों की कोई लालसा रह गई हो। जो राग, डर और गुस्से से ऊपर उठ चुका है, वही सच्चा मुनि है। इस आध्यात्मिक सत्य को समझने के लिए पानी का स्वभाव सबसे सटीक उदाहरण है। प्रकृति ने पानी को जानबूझकर बेस्वाद बनाया है ताकि वह हमें जीवन का सबसे बड़ा संतुलन सिखा सके।
जब हम अपनी मनपसंद कोई चीज़ खाते हैं, तो हमारी जीभ को सुख मिलता है। लेकिन इस सुख के साथ ही एक सूक्ष्म 'बंधन' शुरू हो जाता है। हमें उस स्वाद की आदत लग जाती है और हमारा मन उसे बार-बार पाने की ज़िद करने लगता है। अगर वह चीज़ हमें दोबारा न मिले, तो हमें बाकी सब कुछ बेकार लगने लगता है और हमारे भीतर झुंझलाहट या गुस्सा पैदा होता है। ठीक इसी तरह, जब हम कोई ऐसी चीज़ खाते हैं जो हमें पसंद नहीं, तो हमारे मन में तुरंत कड़वाहट भर जाती है। हमारा मूड खराब हो जाता है और हम अशांत हो जाते हैं। यानी हमारा सुख और दुख पूरी तरह से उस 'स्वाद' के गुलाम बन जाते हैं। यही कारण है कि पानी का अपना कोई स्वाद नहीं होता। पानी का बेस्वाद होना उसकी सबसे बड़ी खूबी है। आप चाहे कितनी भी मीठी चीज़ खाएं या कितनी भी तीखी, पानी की एक घूँट उस हर स्वाद के प्रभाव को मिटा देती है। वह आपके मुँह को फिर से वैसा ही कर देता है जैसे वह पहले था। पानी हमें यह संदेश देता है कि असली तृप्ति किसी स्वाद को पकड़ने में नहीं, बल्कि उसे छोड़ देने में है। एक सिद्ध पुरुष का मन भी पानी की तरह ही होता है—वह दुनिया के हर सुख और दुख को चखता तो है, लेकिन उनमें डूबता नहीं है। वह पानी की तरह हर अनुभव के बाद फिर से अपनी सहज और शांत अवस्था में लौट आता है।
स्वादहीन होने के साथ-साथ पानी का एक और महान गुण है उसकी शीतलता। जीवन में जब क्रोध की अग्नि जलती है या दुखों की तपिश बढ़ती है, तब पानी अपनी शीतलता से उसे शांत कर देता है। एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति भी समाज में पानी की तरह ही व्यवहार करता है। वह खुद तो शांत रहता ही है, अपने संपर्क में आने वाले अशांत लोगों को भी अपनी उपस्थिति से ठंडा और स्थिर कर देता है। जैसे पानी आग को बुझा देता है, वैसे ही एक सिद्ध पुरुष का धैर्य दूसरों के क्रोध और अहंकार को शांत करने की क्षमता रखता है।
पानी की पारदर्शिता भी हमें जीवन का एक बड़ा पाठ पढ़ाती है। पानी के भीतर कुछ भी छुपा हुआ नहीं होता, वह जैसा बाहर है वैसा ही भीतर। एक मुनि या सिद्ध पुरुष का मन भी इसी तरह पारदर्शी होता है; उसके भीतर न कोई कपट होता है और न ही कोई डर। जिसमें राग और द्वेष नहीं होता, उसका चरित्र पानी की तरह साफ़ दिखने लगता है। यदि पानी गंदा या रंगीन हो जाए, तो उसके आर-पार नहीं देखा जा सकता। उसी तरह, यदि हमारा मन इच्छाओं और गुस्से के रंगों में रंग जाए, तो हम सत्य को नहीं देख पाते।
अंत में, पानी का स्वभाव हमें यह सिखाता है कि जीवन में सबसे श्रेष्ठ अवस्था वह है जहाँ हम किसी चीज़ के मोह में न फँसें। जिस तरह पानी हर बर्तन में समा जाता है लेकिन अपना मूल स्वभाव नहीं बदलता, वैसे ही हमें भी हर परिस्थिति में रहते हुए अपनी आंतरिक शांति को बनाए रखना चाहिए। पानी का बेस्वाद होना दरअसल 'पूर्णता' का प्रतीक है, जहाँ अब और कुछ भी पाने की इच्छा शेष नहीं रह गई है। पानी हमें बताता है कि जीवन को रंगीन बनाने की दौड़ में हम अपनी सहज स्वच्छता और शांति न खो दें। इसलिए, अगली बार जब आप पानी पिएं, तो उसे केवल प्यास बुझाने का ज़रिया न समझें। याद रखें कि वह पानी आपको 'स्थितप्रज्ञ' बनने की प्रेरणा दे रहा है। जैसे पानी हर स्वाद को मिटाकर आपको अपनी मूल अवस्था में ले आता है, वैसे ही आप भी अपने जीवन के सुख-दुख, राग और द्वेष को पानी की तरह शांत करना सीखें। जीवन का असली आनंद किसी स्वाद के गुलाम बनने में नहीं, बल्कि पानी की तरह साफ़, शीतल और तटस्थ रहने में है।