इतिहास गवाह है त्याग का, हमने सींचा यह उपवन है,
शून्य से शिखर तक ले जाने में, अर्पण अपना जीवन है।
वेद, पुराण और दर्शन की, जिस माटी ने सुगंध पाई,
आज उसी की संतानों पर, संकट की घड़ी है आई।
प्रतिभा की बलि न चढ़े कहीं, कलम हाथ में थामे जो, दिन-रात पसीना बहाता है,
अंकों की उस दौड़ में वो, खुद को हारा पाता है।
फिर भी हमारा मन नहीं घबराता है।
दलदल से जो कमल खिला, उसका सम्मान तो लाजिमी है,
पर मेधा के गलियारे में, क्यों छाई आज ये मायूसी है?
समानता का असली अर्थ, सबका साथ और सबका विश्वास, तभी सार्थक हो पाएगा,
जब योग्यता की वेदी पर, कोई प्रतिभावान न घबराएगा।
अधिकारों की रक्षा हो सबकी, बस यही हमारी मांग रहे,
नियमों के इस चक्रव्यूह में, कोई योग्य न निष्प्राण रहे।
यूजीसी की फाइलों में, जो कानून नया ये आया है,
लगता है सवर्ण की आँखों में, अनिश्चितता का साया है।
न्याय वही जो सबको देखे, एक ही चश्मे से सदा,
वरना प्रतिभा कुंठित होगी, और बढ़ेगी मन में व्यथा।