वो शहर की चकाचौंध से दूर रहते हैं,
वो सुविधा नहीं, बस संघर्ष को चुनते हैं।
जिनके बस्ते में फटी हुई कुछ किताबें हैं,
वही सुनहरे भविष्य के ख़्वाब बुनते हैं।
तपती दुपहरिया में, खेतों की उस मेड़ पर,
लालटेन की मद्धम रोशनी के उस मोड़ पर,
वो किताबों के पन्नों में दुनिया ढूँढ लेते हैं,
वो अपनी मेहनत से सोई किस्मत जगा लेते हैं।
गाँव की वो धूल, माथे का चंदन बन जाती है,
जब अभावों की कोख से, कोई प्रतिभा मुस्काती है।
नहीं हैं महँगे ट्यूशन, न ही एसी (AC) वाले कमरे,
मगर हौसलों के दम पर, वो आसमां को घेरते हैं।
पापा के फटे जूतों का कर्ज चुकाना है,
माँ की सूनी आँखों में, खुशियों को सजाना है।
कलेक्टर बने कोई, तो कोई अफ़सर बड़ा,
गाँव का वो लड़का देखो, जीत की ज़िद पे अड़ा।
आज हिंदुस्तान की हर परीक्षा गवाह है,
कि सफलता की असली मंजिल, गाँवों की ही राह है।