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जिन पेड़ों पर लदे हों फल, वे पहले झुक जाते हैं,
अपनी ऊँचाई भूलकर, धरती के करीब आते हैं।
अहंकार की अकड़ नहीं, उनमें करुणा का वास है,
सच्ची गरिमा वही है, जिसमें समर्पण का अहसास है।
वे शीश नहीं झुकते कभी, जो भीतर से खाली होते हैं,
सूखे ठूँठ की मानिंद, बस व्यर्थ गर्व में जीते हैं।
पर रस से भरा जो अंतस है, वह झुकने में सम्मान पा गया,
परहित में जिसने सर को नवाया, वह जग में महान कहा गया।
सहकर कंकड़, सहकर पत्थर, वे छाया दान देते हैं,
बदले में लेने की चाह नहीं, वे बस सम्मान देते हैं।
सीख यही है जीवन की, जितना तुम पा जाओगे,
झुककर ही तुम दुनिया में और भी गहरे समाओगे।
शाखाएँ जितनी झुकती हैं, जड़ें उतनी गहरी होती हैं,
विनम्रता की भाषा ही सबसे मीठी और सुनहरी होती है।
मत करना अभिमान कभी, अपनी ऊँची टहनी पर,
फलदार वही है जो झुका रहे हैं, अपनी इस पावन धरती पर।

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