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फादर कामिल बुल्के ईसाई धर्म का प्रचार करने हेतु एक मिशनरी बनकर भारत आए थे, परन्तु यहाँ आकर उन्होंने हिंदी साहित्य में न सिर्फ पढ़ाई की, अपितु हिंदी भाषा को सम्पूर्ण राष्ट्र में पहचान और मान दिलाने के लिए हर मंच पर अपनी आवाज़ भी बुलंद की। कामिल बुल्के का भारतीय भाषाओं के प्रति लगाव और हिंदी साहित्य में दिए गए उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है।

कामिल बुल्के का जन्म वेस्ट फ्लैंडर्स के बेल्जियम प्रांत में नॉकके-हेइस्ट नगरपालिका के एक गाँव रामस्कापेल में 1 सितंबर 1909 को हुआ था। उनके पिता का नाम अडोल्फ और माता का नाम मारिया बुल्के था। बुल्के की शिक्षा को सहयोग देने के लिए परिवार आर्थिक रूप से सक्षम नहीं था, मगर फिर भी अपने ही देश में संघर्ष करते हुए उन्होंने पहले ल्यूवेन विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियरिंग में बीएससी की डिग्री हासिल की। फिर 1932 में नीदरलैंड के वल्कनबर्ग में अपना दार्शनिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद, जब वह अपने धर्म गुरु के पास सन्यास लेने पहुँचे तो उन्होंने उनसे भारत जाने की इच्छा ज़ाहिर की। और इस तरह वर्ष 1935 में वह पहले भारत के मुंबई शहर पहुँचे और फिर वहाँ से दार्जिलिंग आ गए। दार्जिलिंग के कुर्सेओंग शहर में बने जेसुइट संघ में पादरियों के बीच रहकर दो साल तक धर्माचार की पढ़ाई की। इसके बाद झारखंड के गुमला ज़िले में पाँच साल तक गणित पढ़ाते रहे। और वहीं हजारीबाग में सन् 1938 में पंडित बदरीदत्त शास्त्री से हिंदी, ब्रजभाषा एवं अवधी सीखी। फिर 1940 में कोलकाता विश्वविद्यालय से बी.ए. और संस्कृत में एम.ए. किया। सन् 1949 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ‘रामकथा’ पर एम.फिल. करने के बाद हिंदी साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि सन् 1950 में प्राप्त की। पीएचडी में इन्होंने "राम कथा की उत्पत्ति और विकास" विषय पर शोध किया। उनके ये शोध भारत सहित पूरे विश्व में प्रकाशित हुए और इस प्रकाशन के बाद सारी दुनिया कामिल बुल्के के नाम से परिचित हो गई।

फ़ादर के इस शोध का परिणाम यह हुआ कि हिंदी भाषा की प्रगति का मार्ग प्रशस्त हुआ और नए छात्रों को हिंदी साहित्य में शोध करने का प्रोत्साहन मिला। साथ ही इलाहाबाद की एक साहित्यिक संस्था 'परिमल' में युवा साहित्यकारों को प्रेरणा देने के उद्देश्य से उनके द्वारा रचित 'रामकथा: उत्पत्ति और विकास' के अध्याय पढ़कर सुनाए जाने लगे। उनके हिंदी प्रेम की पराकाष्ठा तब देखने को मिली, जब फादर ने मेटरलिंक के प्रसिद्ध अंग्रेज़ी नाटक ब्लू बर्ड का रूपांतर हिंदी में 'नीलपंछी' नाम से किया और ईसाइयों की धार्मिक पुस्तक बाइबिल का अनुवाद भी हिंदी में किया। इसके अलावा उन्होंने अपना प्रसिद्ध अंग्रेज़ी-हिंदी कोश भी तैयार किया।

आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी हिंदी भाषा की उन्नति को ही देश की उन्नति माना था और अपना सारा जीवन हिंदी साहित्य की सेवा में समर्पित कर दिया था। उसी तरह कामिल बुल्के ने भी हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की चिंता की थी। वह इस बात से अत्यंत दुःखी होता कि हिंदी भाषा वाले ही हिंदी की उपेक्षा कर रहे हैं। वह हर मंच पर हिंदी भाषा को अपनाने के लिए ऐसे तर्क देते थे, जिसका कोई विरोध नहीं कर पाता था।

दरअसल कामिल बुल्के अपने देश बेल्जियम के ऐसे इलाके में रहते थे, जहाँ के कुछ हिस्सों में फ्रेंच का बोलबाला था। यहाँ तक कि शासक वर्ग भी फ्रेंच ही बोलते थे। ऐसे में अपनी भाषा डच (फ्लेमिश) और संस्कृति के सम्मान के लिए कामिल बुल्के कई लड़ाइयाँ लड़ चुके थे। और जब उन्होंने भारत में भी वही स्थिति देखी कि अधिकतम लोग अपनी बोली और भाषा को बोलने के बजाय अंग्रेज़ी बोलने में अधिक गर्व महसूस करते हैं और अपनी ही परंपराओं से परिचित नहीं हैं, तो उन्होंने लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़ने के लिए और हिंदी को समृद्ध तथा राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के लिए भरसक सहयोग दिया। और डॉ. कामिल बुल्के की मेहनत और संघर्ष के फलस्वरूप हिंदी भाषा को 14 सितम्बर 1949 को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया।

फादर कामिल बुल्के ने स्वयं को हमेशा भारतीय माना और भारत को अपनी कर्मभूमि समझा। यही कारण था कि सरकार ने उन्हें बड़े गर्व से वर्ष 1951 में भारत की नागरिकता प्रदान की। वह बिहार राष्ट्र भाषा परिषद् की कार्यकारिणी सभा के सदस्य नियुक्त हुए और राँची के सेंट जेवियर्स कॉलेज में हिंदी तथा संस्कृत विभाग के अध्यक्ष भी बने। भारत सरकार ने हिंदी में उनके योगदान को देखते हुए 1974 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। जहरबाद (गैंगरीन) से ग्रस्त होने के कारण उनकी मृत्यु 17 अगस्त 1982 को दिल्ली में हुई। पर वर्ष 2018 में उनके अवशेषों को दिल्ली के निकोलसन कब्रिस्तान से लाकर राँची के सेंट जेवियर्स कॉलेज के परिसर में फिर से दफना दिया गया। देश के लोगों का कहना है कि 35 साल बाद उनकी घर वापसी हुई है। आखिरकार भारत में उनका घर झारखंड ही माना जाता है।

हिंदी साहित्य और भारतीय दर्शन का गहन अध्ययन करने वाले डॉ. बुल्के ने रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण के राम को इतिहास पुरुष माना है। उनका कहना था कि रामकथा एक अंतर्राष्ट्रीय कथा है, जो वियतनाम से लेकर इंडोनेशिया तक देखी जा सकती है। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से यह भी साबित किया कि 'रामायण' सिर्फ धार्मिक साहित्य ही नहीं है, बल्कि मानव जीवन की समस्याओं को हल करने और उनका मार्गदर्शन करने में पूर्णतः समर्थ है।

वास्तव में कामिल बुल्के ने अपने सम्पूर्ण जीवन में ईसा, हिंदी और तुलसीदास की साधना की। अगर देखा जाए तो एक विदेशी मिशनरी द्वारा हिंदी भाषा और भारतीय धार्मिक साहित्य के लिए जो किया गया, वह विश्वविख्यात हमारी महान भारतीय संस्कृति को परिभाषित तो करता ही है, परन्तु हमें यह भी एहसास दिलाता है कि भारतीय हिंदी प्रेमी होने के नाते हमारा अपनी भाषा और साहित्य के प्रति लगाव बौना साबित हुआ है। आज भी हमें हिंदी बोलने और लिखने में शर्म महसूस होती है। वहीं फादर कामिल बुल्के ने बड़े गर्व के साथ देश-विदेश के हर मंच पर हिंदी को महारानी, अंग्रेज़ी को नौकरानी और संस्कृत को माँ का दर्जा दिया।

आज हिंदी की आधुनिक तकनीकी शब्दावली का जो रूप हम देखते हैं, वह कामिल बुल्के की ही देन है। हम यह कह सकते हैं कि जब तक हिंदी भाषा और रामायण रहेंगे, तब तक फादर कामिल बुल्के को याद किया जाएगा।

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