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आज स्वदेशी और स्वावलंबन को अपनाकर अपने देश को 2047 तक एक विकसित भारत के सपने को आगे बढ़ाया जा सकता है। स्वदेशी का मूल भाव स्थानीय उत्पादों का प्रयोग एवं प्रोत्साहन करना ही है। प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी स्वदेशी उत्पादों और स्वावलंबन को प्रोत्साहन देने पर जोर दिया और आत्मनिर्भर भारत के लिए इसे प्रगति के मूल मंत्र के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि देश की समृद्धि आर्थिक समृद्धि पर निर्भर है तथा स्वदेशी अपनाकर भारत की कला, संस्कृति और सभ्यता को जीवित रखा जा सकता है। स्वदेशी और स्वावलंबन के अभियान का उद्देश्य स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के प्रति जागरूकता और प्रतिबद्धता जगाना है, लेकिन वर्तमान में एक समस्या यह आ रही है कि लोग इसके प्रति जागरूक नहीं हैं। इसका प्रमुख कारण यही है कि लोग इसे व्यवहार में नहीं अपना रहे हैं।

स्वदेशी और स्वावलंबन को समझने के लिए सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि उनका वास्तविक अर्थ क्या है। भागवत में स्वदेशी के अपने विचार को नेहरूवादी समाजवाद से जोड़ते हुए स्पष्ट किया है कि जब वे स्वदेशी की बात करते हैं, तो ऐसा लगता है कि विदेश के साथ कोई व्यापक संबंध नहीं होंगे, लेकिन ऐसा नहीं है। आत्मनिर्भर होने का मतलब बाकी लोगों को बाहर करना नहीं है। आत्मनिर्भर होना आवश्यक है, लेकिन दुनिया परस्पर निर्भरता पर चलती है। Mahatma Gandhi के शब्दों में स्वदेशी की भावना का अर्थ है हमारी वह भावना, जो हमें दूर का छोड़कर अपने समीपवर्ती परिवेश का ही उपयोग और सेवा करना सिखाती है। स्वदेशी से मेरा मतलब भारत के कारखानों में बनी वस्तुओं से नहीं है। स्वदेशी से मेरा मतलब भारत के बेरोजगार लोगों के हाथ की बनी वस्तुओं से है। शुरू में यदि इन वस्तुओं में कोई कमी भी रहती है, तो भी हमें इन्हीं वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए तथा प्रेमपूर्वक उत्पादन करने वालों से उसमें सुधार करवाना चाहिए। ऐसा करने से बिना किसी प्रकार का समय और श्रम खर्च किए देश और देश के लोगों की सच्ची सेवा हो सकेगी। उदाहरण के लिए, इस परिभाषा के अनुसार धर्म के संबंध में यह कहा जाएगा कि मुझे अपने पूर्वजों से प्राप्त धर्म का पालन करना चाहिए। यदि मैं उसमें दोष पाऊँ, तो मुझे उन दोषों को दूर करके अपने धर्म की सेवा करनी चाहिए। अर्थ के क्षेत्र में मुझे अपने पड़ोसियों द्वारा बनाई गई वस्तुओं का ही उपयोग करना चाहिए तथा उद्योगों की कमियों को दूर करके उन्हें अधिक सक्षम बनाकर उनकी सेवा करनी चाहिए। आज यदि देखा जाए, तो कोई देश आर्थिक, सामाजिक व तकनीकी रूप से विकसित होना चाहे, तो उसे स्वदेशी को अपनाना होगा। इसका उदाहरण हमारे समक्ष कई देशों में देखा जा सकता है। अमेरिका कई वर्षों तक गुलाम रहा, लेकिन जब George W. Bush ने स्वदेशी के मार्ग को अपनाया, तो आज महाशक्ति के रूप में उभरकर आया। उसी तरह यदि देखा जाए, तो 100 वर्ष पहले तक जापान की दुनिया में कोई पहचान नहीं थी, लेकिन स्वदेशी के जज़्बे के कारण वह पिछले 60 वर्षों में फिर से खड़ा हो गया। एक समय था जब अंग्रेजों ने चीन के लोगों को अफीम के नशे में डुबो दिया था। सन् 1949 तक चीन एक भिखारी देश बन गया था। वह विदेशी कर्ज में डूबा था। बाद में वहाँ इस स्वदेशी के क्रांतिकारी नेता Mao Zedong ने पूरे देश की तस्वीर ही बदल दी। आज चीन उस ऊँचे पायदान पर खड़ा है, जिससे अमेरिका भी घबराता है। इधर मलेशिया भी 25 वर्षों में स्वदेशी के कारण ही फिर से खड़ा हो गया। अंग्रेजों के आने से पहले हमारा भारत हर क्षेत्र में विकसित और महाशक्ति था। Thomas Babington Macaulay ने भारत की गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया। पढ़ाई जाने वाली इतिहास की किताबों में भारत के गौरवपूर्ण इतिहास में फेरबदल कर दिया गया। भारत को गरीबों का देश और हर तरह से बदहाल देश के रूप में बताया गया, जबकि इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के ही करीब 200 इतिहासकारों ने अपनी इतिहास की किताबों में भारत को सर्वसंपन्न देश, ऋषियों का देश और सोने की चिड़िया का देश बताया है। यदि सरकार के स्तर पर यह मान भी लिया जाए कि विदेशी कंपनियों के आने से पूंजी आती है, तो इसका मतलब यह है कि हमारी गरीबी कम होनी चाहिए, लेकिन आँकड़ों को देखने से पता चलता है कि गरीबी और बढ़ रही है। सन् 1840 में जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था, तब एक विदेशी कंपनी ईस्ट इंडिया कंपनी थी। उस समय भारत का निर्यात विदेश में 33 प्रतिशत था। भारत के कुल निर्यात में ईस्ट इंडिया कंपनी केवल 36 प्रतिशत निर्यात करती थी। सन् 1949 में सरकार ने 126 विदेशी कंपनियों को बुलाया, तब भारत में गरीबों की संख्या करीब साढ़े चार करोड़ थी। आज भारत में पाँच हजार विदेशी कंपनियाँ आ चुकी हैं, तो सरकार के तर्क के अनुसार इसका सीधा सा मतलब है कि गरीबी लगभग समाप्त हो गई है। पर आज भारत सरकार के ही आँकड़े बताते हैं कि भारत में आज गरीबों की संख्या 84 करोड़ से भी अधिक है। अर्थात यह संख्या करीब 21 गुना बढ़ी है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि विदेशी कंपनियाँ पूंजी लाती नहीं हैं, बल्कि पूंजी ले जाती हैं, वह भी बहुत अधिक मात्रा में।

आइए जानते हैं कि स्वदेशी और स्वावलंबन को कैसे अपनाया जा सकता है। आज यदि देखा जाए, तो सारी समस्याओं की जड़ मनुष्य के अंदर ही छिपी रहती है। दरअसल, इसे समझने की आवश्यकता होती है। अर्थात इसके लिए हमें अपने व्यवहार को बदलने की आवश्यकता है। भागवत जी ने अपने एक भाषण में स्पष्ट किया है कि आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक दृष्टि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और जीवन मूल्यों से भी जुड़ी है। उन्होंने विविधता को भारत की विशेषता बताया और समाज में विभाजन की प्रवृत्तियों पर चेताया। उन्होंने पंच परिवर्तन की संकल्पना भी प्रस्तुत की, जिसमें आत्म-जागरूकता, पारिवारिक मूल्य, नागरिक अनुशासन और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता को जोड़ा गया। उन्होंने कहा कि हमें स्थानीय उद्योगों और कृषि को बढ़ावा देना होगा, तभी रोजगार का सृजन होगा और आर्थिक आत्मसम्मान मजबूत होगा। स्वदेशी पर बल देने से विदेशी निर्भरता घटेगी और देश की सुरक्षा तथा नीति-संबंधी स्वतंत्रता बढ़ेगी। यदि समाज के स्तर पर भी इस सोच को अपनाया जाए, तो उपभोक्तावाद के स्थान पर संवेदनशीलता और सेवा भाव विकसित होगा। प्रधानमंत्री Narendra Modi जिस आत्मनिर्भर भारत का आह्वान कर रहे हैं, उसका मूल उद्देश्य केवल आर्थिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है। यह संदेश देश की घरेलू क्षमताओं को सशक्त बनाने, आयात पर निर्भरता घटाने और स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ विकास की दिशा को व्यापक सामाजिक सरोकारों से भी जोड़ता है, जिसमें Mahatma Gandhi की स्वदेशी की भावना और Deendayal Upadhyaya की अंत्योदय की परिकल्पना स्पष्ट रूप से समाहित है। इस प्रकार स्वदेशी और स्वावलंबन की राह पर चलकर ही नया भारत, सशक्त भारत का निर्माण किया जा सकता है। अंततः हम कह सकते हैं कि स्वदेशी भारत में बहुत ही प्राचीन समय से चला आ रहा है। अंग्रेजों के समय इसका नारा अपनी बुलंदी पर था। उस समय हम विकसित भारत के रूप में थे। इसकी प्राप्ति हमें ‘हम’ की भावना से ही मिल सकती है। भले ही इसे हम हर काल में अलग-अलग रूपों में देखें, लेकिन इसका उद्देश्य आत्मनिर्भरता लाना ही रहा है। इससे न केवल हम स्वावलंबी बनेंगे, बल्कि हर क्षेत्र में निखरकर सामने आएँगे। मोदी जी ने भी अपने भाषणों में इसी का आह्वान किया है। यदि हम अपने जीवन में इसे अपनाते हैं, तो निश्चित ही हमारा भारत विकसित भारत के सपने को पूरा करने में समर्थ होगा। आज भारत में निर्मित वस्तुओं की कोई कमी नहीं है, विशेषकर रोजमर्रा के जीवन में। हमें इच्छा से देशी (अपने आसपास के जिलों में बना हुआ), आवश्यकता से स्वदेशी (देश में कहीं भी बना) और मजबूरी में विदेशी—जिसे शीघ्रता से कम करते जाने की नीति पर चलना होगा।

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